प्रचलित मान्यता है कि उल्टा पड़ा जूता या चप्पल अशुभ होता है — कहा जाता है कि इससे घर में कलह, बीमारी या तंगी आती है, इसलिए बड़े-बुज़ुर्ग उसे देखते ही सीधा करवा देते हैं। यह एक पुरानी घरेलू मान्यता है, भविष्यवाणी नहीं; उल्टी चप्पल से किसी का भाग्य नहीं बदलता, हाँ, किसी का पैर ज़रूर फिसल सकता है।
परंपरा क्या कहती है
शायद ही कोई भारतीय घर हो जहाँ किसी ने कभी न कहा हो, "चप्पल सीधी करो!" इस छोटी-सी आदत के पीछे की मान्यताएँ:
| स्थिति | प्रचलित मान्यता |
|---|---|
| घर में उल्टा जूता-चप्पल पड़ा हो | कलह या झगड़े का संकेत; तुरंत सीधा करने की सलाह |
| तलवा आसमान या भगवान की ओर | अनादर माना जाता है |
| दरवाज़े पर जूतों का ढेर, उल्टे-सीधे | कुछ घरों में बरकत रुकने की मान्यता |
| एक के ऊपर एक चढ़े जूते | कुछ जगह यात्रा का संकेत, कहीं झगड़े का |
| जूते पहनकर रसोई या पूजा-घर में जाना | अशुभ और अपवित्र माना जाता है |
| बिस्तर या मेज़ पर जूते रखना | अशुभ; घर के बड़े इसे बिलकुल पसंद नहीं करते |
दिलचस्प यह है कि "जूते एक के ऊपर एक चढ़ जाएँ तो सफ़र होगा" वाली बात कई घरों में मज़े-मज़े में कही जाती है, जबकि उल्टे जूते वाली बात गंभीरता से। इलाक़े और परिवार के हिसाब से ये मान्यताएँ बदलती रहती हैं।
यह मान्यता कहाँ से आई
भारतीय संस्कृति में जूता पवित्रता की सीमा पर खड़ा है। मंदिर, रसोई और पूजा-घर में जूते नहीं जाते; बड़ों के सामने पैर या तलवा करना अशिष्टता है; और किसी को जूता दिखाना या मारना सबसे बड़ा अपमान माना जाता है। रामायण में भरत का राम की खड़ाऊँ सिंहासन पर रखना उलटी दिशा का उदाहरण है — वहाँ पादुका सम्मान का प्रतीक बन गई। इसी सोच में तलवे का ऊपर की ओर, यानी आकाश या देवताओं की ओर होना अनादर लगा।
यह सोच केवल भारत में नहीं। पश्चिम एशिया और अरब देशों में किसी की ओर जूते का तलवा करना गहरा अपमान है, और कई घरों में उल्टा जूता देखते ही उसे सीधा कर दिया जाता है, इस मान्यता के साथ कि तलवा ऊपर की ओर नहीं होना चाहिए। इंग्लैंड की लोक-परंपरा में नए जूते मेज़ पर रखना अपशकुन माना जाता है। अलग-अलग देश, पर एक ही भावना: जूता ज़मीन का है, ऊपर का नहीं।
सीधी-सादी बात
उल्टी चप्पल का तलवा ऊपर होता है, और उस पर लगी सड़क की धूल, कीचड़ और कीटाणु फ़र्श और हाथों तक पहुँचते हैं। वह पैर के नीचे अटककर फिसलने या गिरने की वजह भी बनती है, ख़ासकर अंधेरे में या बुज़ुर्गों के लिए। बिखरे जूते घर को अस्त-व्यस्त भी दिखाते हैं। तो "कलह" वाली मान्यता शायद साफ़-सफ़ाई और सलीक़े की सीख को याद रखने का एक आसान तरीक़ा थी।
गाँवों और गर्म इलाक़ों में एक और काम की बात: रात भर पड़े जूते में बिच्छू, मकड़ी या कीड़े घुस सकते हैं। इसलिए पहनने से पहले जूता झाड़ लेना अच्छी आदत है।
उल्टा जूता दिखे तो
उसे सीधा कर दीजिए और जूतों के लिए दरवाज़े के पास एक तय जगह बना लीजिए। बच्चों को यह आदत सिखाना अच्छा है — डर से नहीं, साफ़-सफ़ाई के लिए। किसी पूजा या टोटके की ज़रूरत नहीं।
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