शास्त्रीय अर्थ में राजयोग तब बनता है जब कुंडली में किसी केंद्र (पहले, चौथे, सातवें या दसवें भाव) का स्वामी किसी त्रिकोण (पहले, पाँचवें या नौवें भाव) के स्वामी से जुड़ जाए। यह जुड़ाव एक ही राशि में बैठने से, एक-दूसरे को देखने से, या राशि बदलने (परिवर्तन) से होता है — यही नियम बृहत् पाराशर होरा शास्त्र देता है।
"आपकी कुंडली में राजयोग है" — यह वाक्य जितना सुनाया जाता है, उतना शायद ही कोई और। पर सच यह है कि कोई न कोई केंद्र–त्रिकोण संबंध बहुत सी कुंडलियों में मिल जाता है, इसलिए केवल यह नाम सुन लेने से कुछ तय नहीं होता। इस लेख में हम ठीक-ठीक नियम देखेंगे, योगकारक ग्रह समझेंगे, यह जानेंगे कि हमारी मुफ़्त कुंडली क्या दिखाती है और क्या नहीं, और अपनी कुंडली में इसे ख़ुद जाँचने का आसान तरीक़ा सीखेंगे।
नियम, ठीक-ठीक
पाराशरी ज्योतिष में भावों के समूह हैं। केंद्र (1, 4, 7, 10) कुंडली के खंभे हैं — स्वयं, घर-सुख, जीवनसाथी, कर्म। त्रिकोण (1, 5, 9) पुण्य और भाग्य के भाव हैं — स्वयं, बुद्धि और पूर्व पुण्य, धर्म और भाग्य। पहला भाव (लग्न) दोनों समूहों में आता है।
पाराशर कहते हैं कि केंद्रेश और त्रिकोणेश का संबंध हो तो वे अपनी दशा में पद और प्रतिष्ठा देते हैं। संबंध तीन प्रकार के माने गए हैं:
- युति: दोनों स्वामी एक ही राशि में।
- परस्पर दृष्टि: दोनों एक-दूसरे की राशि को देखते हों। हर ग्रह अपने से सातवीं राशि को देखता है; मंगल चौथी और आठवीं को भी, गुरु पाँचवीं और नौवीं को भी, और शनि तीसरी और दसवीं को भी।
- राशि परिवर्तन: दोनों एक-दूसरे की राशि में बैठे हों।
इनमें सबसे ऊँचा स्थान नवमेश और दशमेश के संबंध को दिया गया है — भाग्य और कर्म का मेल, जिसे धर्म-कर्माधिपति योग भी कहते हैं।
योगकारक ग्रह
कुछ लग्नों में एक ही ग्रह केंद्र और त्रिकोण दोनों का स्वामी होता है। उसे योगकारक कहते हैं और उसे अपने आप में राजयोग देने वाला माना जाता है, ख़ासकर उसकी अपनी दशा में।
| लग्न | योगकारक | किन भावों का स्वामी |
|---|---|---|
| वृषभ | शनि | 9 और 10 |
| तुला | शनि | 4 और 5 |
| कर्क | मंगल | 5 और 10 |
| सिंह | मंगल | 4 और 9 |
| मकर | शुक्र | 5 और 10 |
| कुंभ | शुक्र | 4 और 9 |
बाक़ी छह लग्नों में कोई अकेला योगकारक नहीं; वहाँ राजयोग दो अलग स्वामियों के मिलने से ही बनता है। आपका लग्न क्या है, यह लग्न कैलकुलेटर या कुंडली सबसे पहले बता देती है।
केवल "राजयोग" से राजगद्दी क्यों नहीं मिलती
गिनकर देखिए। हर कुंडली में चार तक केंद्रेश और तीन त्रिकोणेश होते हैं, और हर जोड़ी के जुड़ने के तीन रास्ते। बुध और शुक्र सूर्य से कभी ज़्यादा दूर नहीं जाते, इसलिए उनसे जुड़े भावेश अक्सर साथ बैठ जाते हैं। नतीजा यह कि कोई न कोई केंद्र–त्रिकोण संबंध बड़ी संख्या में कुंडलियों में होता है। अगर हर ऐसा संबंध राजा बनाता, तो दुनिया राजाओं से भरी होती।
शास्त्र ख़ुद केवल नाम नहीं पढ़ते। पाराशर, फलदीपिका और सारावली राजयोग को इन बातों से तौलते हैं:
- ग्रह की गरिमा: स्वराशि या उच्च का स्वामी बहुत अधिक देता है, नीच या शत्रु राशि का बहुत कम।
- योग किस भाव में बना: केंद्र या त्रिकोण में बना संबंध बलवान; वही संबंध 6, 8 या 12वें भाव में कमज़ोर।
- दूसरे भावों का स्वामित्व: जो ग्रह केंद्र या त्रिकोण के साथ 6, 8 या 12वें भाव का भी स्वामी हो, उसके फल मिले-जुले रहते हैं।
- अस्त होना और दृष्टि: सूर्य के पास अस्त स्वामी, या पाप ग्रहों से पीड़ित स्वामी, कम फल देता है।
- समय: राजयोग मुख्यतः उसे बनाने वाले ग्रहों की महादशा या अंतर्दशा में फल देता है। वह दशा जीवन में आए ही नहीं, या बचपन में निकल जाए, तो योग शांत रहता है। विंशोत्तरी दशा वाला लेख बताता है कि आपके जीवन में कौन सी दशाएँ आएँगी।
और आज "राज" का अर्थ अपने क्षेत्र में उन्नति और सम्मान है, सचमुच की गद्दी नहीं। एक शिक्षक, बाबू या किसान की कुंडली में भी मज़बूत राजयोग हो सकता है, जो आदर, ज़िम्मेदारी और लगातार बढ़त के रूप में दिखे।
हमारी कुंडली क्या दिखाती है, क्या नहीं
हमारी मुफ़्त कुंडली में "योग" टैब है। उसमें केवल वही योग आते हैं जो आपकी कुंडली में सच में बनते हैं, हर एक के नियम सहित। सामान्य केंद्र–त्रिकोण राजयोग उसमें अलग से नहीं गिनाया जाता, क्योंकि इस ढीले रूप में वह इतनी कुंडलियों में होगा कि उसकी सूची का कोई ख़ास अर्थ नहीं रहेगा।
उसकी जगह टैब विशेष, नाम वाले योग दिखाता है, जिनमें से कई परंपरा में राजयोगों में ही गिने जाते हैं:
- नीचभंग राजयोग: नीच ग्रह जिसकी राशि का स्वामी या उच्च राशि का स्वामी लग्न या चंद्र से केंद्र में हो। विस्तार नीचभंग राजयोग वाले लेख में।
- विपरीत राजयोग: हर्ष (छठे भाव का स्वामी 6, 8 या 12वें में), सरल (आठवें का स्वामी 6, 8 या 12वें में), विमल (बारहवें का स्वामी 6, 8 या 12वें में)। देखें विपरीत राजयोग।
- लक्ष्मी योग: नवमेश स्वराशि या उच्च राशि में केंद्र या त्रिकोण में, तथा लग्नेश केंद्र या त्रिकोण में और नीच नहीं।
- पंच महापुरुष योग: मंगल, बुध, गुरु, शुक्र या शनि स्वराशि या उच्च राशि में और लग्न से केंद्र में।
- गजकेसरी: गुरु चंद्र से केंद्र में। विस्तार गजकेसरी योग में।
- धन योग: दूसरे या ग्यारहवें भाव का स्वामी पाँचवें या नौवें के स्वामी से जुड़ा हो।
सामान्य राजयोग ख़ुद कैसे जाँचें
आपको बस कुंडली और राशि-स्वामियों की सूची चाहिए: मेष और वृश्चिक का मंगल, वृषभ और तुला का शुक्र, मिथुन और कन्या का बुध, कर्क का चंद्र, सिंह का सूर्य, धनु और मीन का गुरु, मकर और कुंभ का शनि। हमारी कुंडली संपूर्ण राशि भाव पद्धति पर है, यानी हर भाव ठीक एक राशि है।
- हर भाव की राशि पहचानिए। "कुंडली" टैब में पहले भाव में लग्न राशि है; उसके बाद की राशि दूसरा भाव, और आगे इसी तरह।
- भाव 1, 4, 7, 10 और 1, 5, 9 के स्वामी लिखिए।
- देखिए हर स्वामी कहाँ बैठा है। "ग्रह" टैब हर ग्रह की राशि और भाव बताता है।
- संबंध खोजिए। कोई केंद्रेश किसी त्रिकोणेश के साथ एक राशि में है? दोनों एक-दूसरे को देखते हैं ("दृष्टि व मैत्री" टैब मदद करेगा)? दोनों एक-दूसरे की राशि में हैं?
- फिर तौलिए। हर स्वामी की गरिमा, मिलने का भाव, और उनकी दशा कब चलेगी।
एक उदाहरण
यह एक काल्पनिक कुंडली है, केवल तरीक़ा समझाने के लिए।
मान लीजिए लग्न वृषभ है। तब भाव ऐसे चलेंगे: 1 वृषभ (शुक्र), 4 सिंह (सूर्य), 5 कन्या (बुध), 7 वृश्चिक (मंगल), 9 मकर (शनि), 10 कुंभ (शनि)।
- शनि नौवें और दसवें दोनों का स्वामी है। वह इस लग्न का योगकारक है, और नवमेश–दशमेश का मेल वही है जिसे पाराशर सबसे ऊँचा मानते हैं।
- मान लीजिए शनि कुंभ में, यानी दसवें भाव में बैठा है। वह स्वराशि में केंद्र में है, इसलिए हमारा इंजन इस कुंडली के लिए शश योग (पंच महापुरुष योगों में से एक) भी दिखाएगा।
- मान लीजिए सूर्य और बुध साथ-साथ सिंह में, यानी चौथे भाव में हैं। सूर्य चौथे (केंद्र) का और बुध पाँचवें (त्रिकोण) का स्वामी है, तो यह केंद्र में बना केंद्र–त्रिकोण योग है। वृषभ लग्न में सूर्य–बुध की हर युति ऐसा ही संबंध है — इससे दिखता है कि सामान्य राजयोग कितना साधारण हो सकता है।
- अब तौलिए: स्वराशि का शनि बलवान है, सिंह का सूर्य भी स्वराशि में है। बुध सूर्य के बहुत पास हो तो अस्त हो सकता है — यह "ग्रह" टैब में दिखता है। और योग मुख्यतः शनि, सूर्य या बुध की दशा में बोलेगा।
बस इतना ही तरीक़ा है। कुछ मिनट लगते हैं और कोई ख़र्च नहीं।
"राजयोग जगाइए" वाली बिक्री पर एक बात
"आपकी कुंडली में बड़ा राजयोग है, पूजा करवाकर इसे जगाइए" या "पैसे दीजिए, राजयोग खुल जाएगा" — ऐसी बातें ज्योतिष नहीं, बिक्री हैं। योग जन्म के समय ग्रहों की स्थिति का एक तथ्य है; उसे न खोलना पड़ता है, न जगाना, और कोई भुगतान उसे नहीं बदलता। ईमानदार परामर्श बस इतना जोड़ सकता है: योग कितना बलवान है, उसके विरुद्ध क्या खिंचाव हैं, और उसकी दशा कब आएगी।
हम कोई अनुष्ठान, रत्न या "जागरण" नहीं बेचते। प्रार्थना या दान से मन को शांति मिले तो वह आपकी अपनी इच्छा है, कुंडली की शर्त नहीं। डर से किसी को पैसे देने की ज़रूरत नहीं।
ख़ुद देखें
मुफ़्त कुंडली बनाइए, "योग" टैब में देखिए कि कौन से नाम वाले योग बनते हैं, और "कुंडली" व "ग्रह" टैब से ऊपर बताए तरीक़े से केंद्र–त्रिकोण संबंध ख़ुद जाँचिए। पूरी कुंडली को गरिमा और दशा के साथ एक साथ तौलना हो, तो विस्तृत कुंडली रिपोर्ट यही करती है, या आप अपना एक सवाल पूछ सकते हैं।