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धन योग: कुंडली में कैसे बनता है और इसका सही अर्थ

कुंडली में धन योग कैसे बनता है: दूसरे-ग्यारहवें भाव के स्वामी का पाँचवें-नौवें के स्वामी से संबंध, लक्ष्मी योग, इन भावों का अर्थ और दशा का महत्व।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
  • प्रकाशित
  • 6 मिनट में पढ़ें
इस लेख में

कुंडली में धन योग तब बनता है जब धन के भाव (दूसरे या ग्यारहवें) का स्वामी भाग्य के भाव (पाँचवें या नौवें) के स्वामी से जुड़ जाए। हमारा इंजन इसे तब गिनता है जब दोनों स्वामी एक ही राशि में हों, एक-दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हों, या एक-दूसरे की राशि में बैठे हों।

यह सहायक योग है, बैंक का खाता नहीं। शास्त्र कहते हैं कि धन योग उसे बनाने वाले ग्रहों की दशा में फल देते हैं, और उतना ही जितना वे ग्रह बलवान हों। इस लेख में ठीक-ठीक नियम, उससे जुड़ा लक्ष्मी योग, हर भाव का अर्थ, और इसे शांति से पढ़ने का ढंग है। यहाँ लिखी कोई बात निवेश या पैसे की सलाह नहीं है।

नियम, जैसा हमारा इंजन लगाता है

हमारी मुफ़्त कुंडली के "योग" टैब में धन योग तब आता है जब:

दूसरे या ग्यारहवें भाव का स्वामी पाँचवें या नौवें भाव के स्वामी से जुड़ा हो: एक राशि में, परस्पर पूर्ण दृष्टि, या राशि परिवर्तन।

इसे खोलकर देखें:

  • दो पक्ष। एक ग्रह दूसरे या ग्यारहवें भाव का स्वामी हो; दूसरा ग्रह पाँचवें या नौवें का। कुंडली संपूर्ण राशि भाव पद्धति पर है, इसलिए हर भाव एक राशि है और उसका एक स्वामी।
  • एक राशि में। दोनों स्वामी एक ही राशि में बैठे हों।
  • राशि परिवर्तन। दोनों एक-दूसरे की राशि में बैठे हों।
  • परस्पर पूर्ण दृष्टि। दोनों एक-दूसरे की राशि को देखें। हर ग्रह अपने से सातवीं राशि को पूर्ण दृष्टि से देखता है; मंगल चौथी और आठवीं को भी, गुरु पाँचवीं और नौवीं को भी, शनि तीसरी और दसवीं को भी। दृष्टि दोनों ओर से होनी चाहिए।

योग बनने पर टैब दोनों ग्रहों के नाम, वे किन भावों के स्वामी हैं, और तीनों में से कौन सा जुड़ाव है — यह सब दिखाता है।

एक स्थिति जिसे इंजन जोड़ी नहीं मानता

चार लग्नों में एक ही ग्रह दोनों पक्षों का स्वामी होता है:

लग्नग्रहकिन भावों का स्वामी
वृषभबुध2 और 5
कन्याशुक्र2 और 9
वृश्चिकगुरु2 और 5
मीनमंगल2 और 9

कोई ग्रह अपने आप से "जुड़" नहीं सकता, इसलिए इंजन उस अकेले ग्रह के लिए धन योग नहीं दिखाता। फिर भी बहुत से ज्योतिषी ऐसे ग्रह को उस लग्न के लिए स्वाभाविक रूप से धन-सहायक मानते हैं। आपका लग्न इन चार में से है, तो उस ग्रह की राशि, भाव और दशा ज़रूर देखिए।

लक्ष्मी योग

इंजन एक और जुड़ा हुआ योग भी जाँचता है — लक्ष्मी योग:

नवमेश स्वराशि या उच्च राशि में केंद्र या त्रिकोण में, तथा लग्नेश केंद्र या त्रिकोण में और नीच नहीं।

केंद्र हैं 1, 4, 7, 10वें भाव; त्रिकोण 1, 5, 9वें। भाव सीधा है: भाग्य का स्वामी बलवान और अच्छी जगह है, और स्वयं का स्वामी उसे ग्रहण करने की अच्छी स्थिति में। लक्ष्मी योग धन योग से कम मिलता है, क्योंकि नवमेश को केवल जुड़ना नहीं, स्वराशि या उच्च में होना पड़ता है।

चारों भावों का अर्थ

भावमुख्य कारकत्वधन से संबंध
दूसराकुटुंब, संचित धन, वाणी, भोजनजो आप रखते और बचाते हैं; देखें दूसरा भाव
ग्यारहवाँलाभ, आय, संपर्क, इच्छा-पूर्तिजो आता है; देखें ग्यारहवाँ भाव
पाँचवाँबुद्धि, संतान, पूर्व पुण्यरचने और सही परखने की क्षमता
नौवाँभाग्य, धर्म, पिता, गुरुभाग्य और कृपा, पीछे से चलने वाली हवा

इस तरह पढ़ें तो धन योग कहता है: कमाने और सहेजने के भाव, पुण्य और भाग्य के भावों से जुड़े हैं। यह अवसर और योग्यता के मिलने की तस्वीर है, आसमान से पैसा गिरने की नहीं।

क्या बल बढ़ाता है, क्या घटाता है

शास्त्र धन योग को उसी तरह तौलते हैं जैसे राजयोग को:

  • दोनों स्वामियों की गरिमा। स्वराशि या उच्च में अधिक; नीच या शत्रु राशि में कम।
  • कहाँ मिलते हैं। केंद्र, त्रिकोण, दूसरे या ग्यारहवें भाव में बना संबंध बलवान। वही संबंध 6, 8 या 12वें भाव में हो, तो धन के साथ मेहनत, क़र्ज़ या ख़र्च जुड़ा रहता है।
  • मिला-जुला स्वामित्व। कोई स्वामी 6, 8 या 12वें भाव का भी मालिक हो, तो फल मिले-जुले।
  • अस्त और पीड़ा। सूर्य के बहुत पास अस्त, या पाप ग्रहों से घिरा स्वामी कम देता है।
  • समय। यही सबसे बड़ी बात है। धन योग मुख्यतः उसे बनाने वाले ग्रहों की महादशा या अंतर्दशा में फल देता है। वह दशा बुढ़ापे में आए या बचपन में निकल जाए, तो काम के वर्षों में योग कम दिखेगा। विंशोत्तरी दशा वाला लेख बताता है कि ये दशाएँ कब हैं।

किसी कुंडली में धन योग हो और साधन साधारण रहें, या कोई नाम वाला योग न हो और जीवन आराम से कटे — दोनों होता है। पूरी कुंडली और व्यक्ति का अपना परिश्रम, सूची की एक पंक्ति से कहीं ज़्यादा मायने रखते हैं। भावेशों से योग कैसे बनते हैं, इसकी बड़ी तस्वीर कुंडली में राजयोग वाले लेख में है।

एक उदाहरण

यह एक काल्पनिक कुंडली है, केवल तरीक़ा समझाने के लिए।

मान लीजिए लग्न सिंह है। तब दूसरा भाव कन्या और ग्यारहवाँ मिथुन है — दोनों का स्वामी बुध। पाँचवाँ भाव धनु है, स्वामी गुरु; नौवाँ मेष, स्वामी मंगल।

  • बुध और गुरु एक ही राशि में हों, तो इंजन धन योग दिखाएगा: बुध (दूसरे का स्वामी) और गुरु (पाँचवें का स्वामी) एक राशि में।
  • बुध मेष में और मंगल कन्या में हो, तो दोनों ने राशि बदल ली है — दूसरे और नौवें के स्वामियों के बीच एक और धन योग।
  • फिर तौलिए: गुरु स्वराशि में है या नीच? बुध अस्त तो नहीं? संबंध किस भाव में बना, और बुध, गुरु या मंगल की दशा कब आएगी?

"पैसे दीजिए, धन योग खुलेगा" क्यों ग़लत है

कुछ लोग कहते हैं, "आपकी कुंडली में बड़ा धन योग है, पर वह बंधा हुआ है," और उसे "खोलने" के लिए पूजा, रत्न या यंत्र बेचते हैं। योग केवल यह है कि जन्म के समय ग्रह कहाँ थे। उस पर कोई ताला नहीं, और कोई ख़रीद उसे नहीं खोलती। जो व्यक्ति पैसे को लेकर चिंतित है, उसे डर के नाम पर तो बिल्कुल ख़र्च नहीं करना चाहिए।

हम कोई उपाय नहीं बेचते। दान करना या बड़ों की सेवा आपको ठीक लगे, तो परंपरा इन्हें अपने आप में मूल्यवान मानती है — अपनी इच्छा से, किसी शर्त से नहीं। और पैसे के असली फ़ैसलों में किसी योग्य वित्तीय सलाहकार की बात पहले है, कुंडली बाद में।

ख़ुद देखें

मुफ़्त कुंडली बनाइए और "योग" टैब में देखिए कि धन या लक्ष्मी योग बनता है या नहीं, ग्रहों और भावों के साथ। दूसरे, पाँचवें, नौवें और ग्यारहवें भाव और उन्हें सक्रिय करने वाली दशाओं को पढ़वाना हो, तो धन रिपोर्ट ठीक यही देखती है। पूरी कुंडली के लिए विस्तृत कुंडली रिपोर्ट है, या आप अपना सवाल पूछ सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कुंडली में धन योग कैसे बनता है?

जब दूसरे या ग्यारहवें भाव का स्वामी पाँचवें या नौवें भाव के स्वामी से जुड़ा हो। हमारा इंजन तीन तरह का जुड़ाव गिनता है: दोनों एक ही राशि में, परस्पर पूर्ण दृष्टि, या राशि परिवर्तन।

क्या धन योग होने से मैं अमीर बनूँगा?

नहीं, यह कोई वादा नहीं। यह साधनों के लिए सहायक योग है, और शास्त्र कहते हैं कि यह मुख्यतः उसे बनाने वाले ग्रहों की दशा में फल देता है। कितना देगा, यह उनके बल पर है; असली धन मेहनत, निर्णय और परिस्थिति से आता है।

लक्ष्मी योग क्या है?

हमारे इंजन के नियम में: नवमेश स्वराशि या उच्च राशि में केंद्र या त्रिकोण में हो, और लग्नेश केंद्र या त्रिकोण में हो और नीच न हो। यह भाग्य (नौवाँ भाव) को स्वयं के बल (लग्नेश) से जोड़ता है।

मेरी कुंडली में धन योग नहीं दिखता, क्या यह बुरा है?

नहीं। इसका अर्थ बस इतना है कि वह विशेष संबंध नहीं बना, और यह बहुत सी अच्छी कुंडलियों में होता है। धन दूसरे और ग्यारहवें भाव, उनके स्वामियों की गरिमा और दशाओं से भी पढ़ा जाता है, जिनके लिए किसी नाम वाले योग की ज़रूरत नहीं।

स्वयं आज़माएँ

स्रोत

  • बृहत् पाराशर होरा शास्त्र — धन योग और भावों के कारकत्व वाले अध्याय
  • फलदीपिका और सारावली — धनदायक योग और द्वितीय, पंचम, नवम, एकादश भावेश
  • सतमार्ग ज्योतिष का अपना गणना इंजन (लाहिड़ी अयनांश, संपूर्ण राशि भाव) — धन और लक्ष्मी योग के नियम जैसे यहाँ उद्धृत हैं

यह लेख सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। तिथियाँ और अंश हमारे अपने इंजन से (लाहिड़ी अयनांश)। ज्योतिष विचार के लिए मार्गदर्शन है — चिकित्सकीय, विधिक या वित्तीय सलाह नहीं। हमारी पद्धति

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