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त्योहार · 2026

अक्षय नवमी (आंवला नवमी) 2026 — बुधवार, 18 नवंबर 2026

अक्षय नवमी, कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी, वह दिन है जब परिवार आंवले के पेड़ की पूजा करते हैं और उसकी छाया में बैठकर साथ भोजन करते हैं।

2026 में

बुधवार, 18 नवंबर 2026

तिथि
शुक्ल नवमी: 18 नवंबर, 06:05 – 19 नवंबर, 07:06
चांद्र मास
कार्तिक
सूर्योदय / सूर्यास्त
06:45 / 17:26
मुहूर्त और काल
पूजा मुहूर्त06:45 – 12:06
पूर्वाह्न (सूर्योदय से मध्य दिन)06:45 – 12:06

नियम: कार्तिक शुक्ल नवमी जो पूर्वाह्न में हो; दोनों दिन हो तो जिस दिन अधिक व्याप्त।

2027 में

रविवार, 7 नवंबर 2027

तिथि
शुक्ल नवमी: 7 नवंबर, 02:50 – 8 नवंबर, 05:24
चांद्र मास
कार्तिक
सूर्योदय / सूर्यास्त
06:37 / 17:32
मुहूर्त और काल
पूजा मुहूर्त06:37 – 12:04
पूर्वाह्न (सूर्योदय से मध्य दिन)06:37 – 12:04

नियम: कार्तिक शुक्ल नवमी जो पूर्वाह्न में हो; दोनों दिन हो तो जिस दिन अधिक व्याप्त।

समय नई दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त से। दूसरे शहरों में मुहूर्त कुछ मिनट खिसकते हैं, और कभी-कभी तिथि एक दिन। पूरा त्योहार कैलेंडर

अक्षय नवमी (आंवला नवमी) क्या है

अक्षय नवमी कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी को आती है, दीवाली के एक सप्ताह बाद और देवउठनी एकादशी से दो दिन पहले। अक्षय का अर्थ है जिसका क्षय न हो, और इस दिन से यह मान्यता जुड़ी है कि इस दिन किए गए शुभ कर्म, पूजा और दान का पुण्य कभी समाप्त नहीं होता, जैसे वैशाख की अक्षय तृतीया के बारे में माना जाता है। कुछ परंपराएं इसे युगादि तिथियों में भी गिनती हैं, यानी वे दिन जिन पर संसार के किसी महान युग का आरंभ माना जाता है।

उत्तर और मध्य भारत में इसका अधिक परिचित नाम आंवला नवमी है, क्योंकि यह दिन आंवले के पेड़ को समर्पित है, जिसे संस्कृत में धात्री कहते हैं। आंवला भगवान विष्णु को प्रिय माना जाता है, और कार्तिक विष्णु उपासना का मास है। एक लोकप्रिय कथा के अनुसार एक बार मां लक्ष्मी ने विष्णु और शिव की एक साथ पूजा करनी चाही। आंवले में विष्णु की प्रिय तुलसी और शिव के प्रिय बेल, दोनों के गुण माने गए, इसलिए उन्होंने आंवले के पेड़ को दोनों का रूप मानकर पूजा और फिर उसी के नीचे दोनों को भोजन कराया। परिवार आज भी यही करते हैं।

पूजा सरल है। महिलाएं, और प्रायः पूरा परिवार, बाग़, मंदिर या खेत में किसी आंवले के पेड़ के पास जाती हैं, उसकी जड़ में जल और दूध चढ़ाती हैं, हल्दी और रोली लगाती हैं, दीपक जलाती हैं, और परिक्रमा करते हुए तने पर कच्चा सूत लपेटती हैं। फिर घर से बनाकर लाया गया भोजन पेड़ के नीचे बैठकर खाया जाता है, और मौसम का फल, स्वयं आंवला, चढ़ाया और बांटा जाता है। इसका व्यावहारिक पक्ष भी साफ़ है: इन्हीं सप्ताहों में आंवला पकता है, और बारिश के बाद के सुहाने मौसम में यह दिन लोगों को घर से बाहर प्रकृति के पास बुलाता है।

दान इस दिन का केंद्र है। ज़रूरतमंदों को भोजन, गर्म कपड़े, अनाज और आंवले दिए जाते हैं, और कुछ घरों में खोखले किए गए कद्दू या पेठे के भीतर छोटा दान रखकर दिया जाता है — इसी रीति से कूष्मांड नवमी नाम आया है। ब्रज में बहुत से श्रद्धालु इस दिन मथुरा या वृंदावन की परिक्रमा करते हैं।

कैसे मनाया जाता है

  • परिवार आंवले के पेड़ के पास जाकर उसकी जड़ में जल और दूध चढ़ाते हैं, और हल्दी, रोली और फूल अर्पित करते हैं।
  • दीपक जलाया जाता है और पेड़ की परिक्रमा करते हुए तने पर कच्चा सूत लपेटा जाता है, प्रायः सात या उससे अधिक बार।
  • घर के बड़े लक्ष्मी जी द्वारा आंवले की पूजा की कथा पढ़ते या सुनाते हैं।
  • घर पर बना भोजन पेड़ के नीचे बैठकर खाया जाता है, और आंवला चढ़ाकर प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
  • भोजन, अनाज, गर्म कपड़े और आंवले दान किए जाते हैं; कुछ परिवार भीतर छोटा दान रखकर कद्दू या पेठा देते हैं।
  • मथुरा और वृंदावन में बहुत से श्रद्धालु पैदल पवित्र नगरी की परिक्रमा करते हैं।

तिथि कैसे तय होती है

अक्षय नवमी कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी है; शुक्ल पक्ष में होने के कारण अमांत और पूर्णिमांत दोनों पंचांगों में मास का नाम एक ही रहता है। पूजा सुबह की है, इसलिए वह दिन लिया जाता है जिस दिन पूर्वाह्न में, यानी सूर्योदय से दोपहर तक के भाग में, नवमी मौजूद हो। यदि दो दिन पूर्वाह्न में नवमी हो, तो वह दिन लिया जाता है जिस दिन पूर्वाह्न का अधिक भाग नवमी में हो।

क्षेत्रीय अंतर

उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में यह दिन अधिकतर आंवला नवमी के नाम से जाना जाता है और इसका केंद्र पेड़ की पूजा और खुले में भोजन है। ब्रज में मथुरा और वृंदावन की परिक्रमा में बड़ी भीड़ होती है। ओडिशा में यह अंला नवमी है, और पुरी के पास साक्षीगोपाल मंदिर में श्रद्धालु राधा जी के चरणों के दर्शन के लिए आते हैं, जो केवल इसी दिन कराए जाते हैं। बंगाल में यह कूष्मांड नवमी है, और यही जगद्धात्री पूजा का दिन भी है — संसार को धारण करने वाली देवी की आराधना, जो चंदननगर और कृष्णनगर में बड़े धूमधाम से होती है। दक्षिण में यह तिथि कम मनाई जाती है, यद्यपि पूरे कार्तिक में विष्णु मंदिरों में आंवला चढ़ाया जाता है।

तिथियाँ और समय हमारा अपना इंजन गणना करता है (सूर्योदय, तिथि और काल नई दिल्ली के लिए, लाहिड़ी अयनांश)। दूसरे शहर में, या किसी दूसरी परंपरा के पंचांग में, तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने कुल पुरोहित की परंपरा मानें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अक्षय नवमी पर आंवले के पेड़ की पूजा क्यों होती है?

आंवला भगवान विष्णु को प्रिय माना जाता है, और एक लोकप्रिय कथा कहती है कि मां लक्ष्मी ने इसे विष्णु और शिव दोनों का रूप मानकर पूजा था। इन्हीं सप्ताहों में पेड़ पर फल भी आते हैं, इसलिए यह पूजा भक्ति को मौसम से जोड़ती है।

क्या अक्षय नवमी और आंवला नवमी एक ही हैं?

हां। अक्षय नवमी नाम अक्षय पुण्य की बात करता है और आंवला नवमी नाम पेड़ की। बंगाल में इसी दिन को कूष्मांड नवमी कहते हैं।

यदि पास में आंवले का पेड़ न हो तो क्या करें?

बहुत से परिवार गमले में लगे आंवले के पौधे, उसकी एक डाल, या घर पर केवल आंवले के फल की पूजा करते हैं, और आंवला व भोजन दान करते हैं। स्थान से अधिक भावना और दान का महत्व है।

क्या अक्षय नवमी पर व्रत रखा जाता है?

कुछ महिलाएं पूजा पूरी होने तक व्रत रखती हैं और फिर पेड़ के नीचे भोजन करती हैं। यह एक रीति है, कठोर नियम नहीं, और बहुत से परिवार केवल पूजा करके साथ भोजन करते हैं।