त्योहार · 2026
छठ पूजा 2026 — रविवार, 15 नवंबर 2026
छठ पूजा सूर्य देव और छठी मैया का चार दिन का पर्व है, जो नदी-तालाब के घाटों पर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देकर पूरा होता है।
2026 में
रविवार, 15 नवंबर 2026
- तिथि
- शुक्ल षष्ठी (शुक्ल): 14 नवंबर, 23:24 – 16 नवंबर, 02:01
- चांद्र मास
- कार्तिक
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 06:43 / 17:27
- संध्या अर्घ्य (सूर्यास्त)
- 17:27
- उषा अर्घ्य (सूर्योदय)
- 16 नवंबर, 06:44
- नहाय खाय: 13 नवंबर 2026
- खरना: 14 नवंबर 2026
- उषा अर्घ्य (सूर्योदय): 16 नवंबर 2026
नियम: कार्तिक शुक्ल षष्ठी जो सूर्यास्त के समय हो — संध्या अर्घ्य का दिन; उषा अर्घ्य अगले सूर्योदय पर।
2027 में
गुरुवार, 4 नवंबर 2027
- तिथि
- शुक्ल षष्ठी (शुक्ल): 3 नवंबर, 19:32 – 4 नवंबर, 21:38
- चांद्र मास
- कार्तिक
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 06:34 / 17:34
- संध्या अर्घ्य (सूर्यास्त)
- 17:34
- उषा अर्घ्य (सूर्योदय)
- 5 नवंबर, 06:35
- नहाय खाय: 2 नवंबर 2027
- खरना: 3 नवंबर 2027
- उषा अर्घ्य (सूर्योदय): 5 नवंबर 2027
नियम: कार्तिक शुक्ल षष्ठी जो सूर्यास्त के समय हो — संध्या अर्घ्य का दिन; उषा अर्घ्य अगले सूर्योदय पर।
समय नई दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त से। दूसरे शहरों में मुहूर्त कुछ मिनट खिसकते हैं, और कभी-कभी तिथि एक दिन। पूरा त्योहार कैलेंडर
छठ पूजा क्या है
छठ पूजा सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है, जिन्हें सूर्य की बहन और संतान की रक्षा करने वाली माता के रूप में पूजा जाता है। मुख्य दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी है, दीपावली के छह दिन बाद। यह बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र का महापर्व है, और अब देश-विदेश में जहां भी इन क्षेत्रों के परिवार रहते हैं, वहां मनाया जाता है।
यह अनुष्ठान प्राचीन और सादा है: न मूर्ति की ज़रूरत, न पुरोहित की — बस व्रती, जल और सूर्य। परंपरा इसे सूर्यपुत्र कर्ण से जोड़ती है, जो प्रतिदिन जल में खड़े होकर अर्घ्य देते थे; द्रौपदी और पांडवों से भी, और माता सीता से भी, जिन्होंने अयोध्या लौटकर यह व्रत रखा बताया जाता है। श्रद्धालु मानते हैं कि यह व्रत परिवार का कल्याण करता है, और यह नई फसल के लिए धन्यवाद भी है।
छठ की विशेषता इसका अनुशासन और सामूहिकता है। व्रती, अधिकतर महिलाएं पर पुरुष भी, लगभग छत्तीस घंटे निर्जल व्रत रखते हैं। पूरा मोहल्ला मिलकर घाट साफ़ करता है, बांस की टोकरियों में प्रसाद ले जाता है और सांझ व भोर में छठ के लोकगीत गाता है। डूबते और उगते, दोनों सूर्य को अर्घ्य देना अपने आप में एक शांत सीख है: दिन के दोनों छोर धन्यवाद के योग्य हैं।
कैसे मनाया जाता है
- पहला दिन, नहाय-खाय: व्रती स्नान करते हैं, हो सके तो नदी में, और एक बार शुद्ध भोजन करते हैं — प्रायः चावल, चने की दाल और लौकी।
- दूसरा दिन, खरना: दिन भर उपवास, शाम को गुड़ की खीर और रोटी से पारण, जिसके बाद लंबा निर्जल व्रत शुरू होता है।
- तीसरा दिन, संध्या अर्घ्य: सूर्यास्त के समय जल में खड़े होकर व्रती ठेकुआ, फल और गन्ने से भरी टोकरियों के साथ डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
- चौथा दिन, उषा अर्घ्य: भोर में उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और फिर व्रत खोला जाता है।
- प्रसाद — ठेकुआ, कसार के लड्डू, केला, नारियल, गन्ना — बांस के सूप और दउरा में ले जाया जाता है।
- परिवार छठ गीत गाते हैं, पूरा समाज मिलकर घाट साफ़ करता और सजाता है, और जो व्रत नहीं रख पाते वे व्रतियों की सेवा करके इसमें शामिल होते हैं।
तिथि कैसे तय होती है
छठ पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी है। मुख्य अर्घ्य डूबते सूर्य को दिया जाता है, इसलिए हमारा पंचांग इसे उस दिन रखता है जिस दिन सूर्यास्त के समय षष्ठी हो — यही संध्या अर्घ्य का दिन है। उषा अर्घ्य अगली सुबह सूर्योदय पर होता है। नहाय-खाय संध्या अर्घ्य से दो दिन पहले और खरना एक दिन पहले होता है, इसलिए चारों दिन षष्ठी की तिथि से तय हो जाते हैं।
क्षेत्रीय अंतर
बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल का तराई क्षेत्र इसका मूल क्षेत्र है, और रीतियां परिवार-परिवार में बदलती हैं, जैसे खरना में क्या बनेगा। वसंत में चैत्र शुक्ल पक्ष में छोटा चैती छठ भी मनाया जाता है। इन क्षेत्रों से दूर रहने वाले परिवारों के लिए पार्कों के तालाब और कृत्रिम घाट प्रायः नदी का स्थान लेते हैं।
तिथियाँ और समय हमारा अपना इंजन गणना करता है (सूर्योदय, तिथि और काल नई दिल्ली के लिए, लाहिड़ी अयनांश)। दूसरे शहर में, या किसी दूसरी परंपरा के पंचांग में, तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने कुल पुरोहित की परंपरा मानें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
छठ पूजा के चार दिन कौन-से हैं?
नहाय-खाय, खरना, षष्ठी की शाम संध्या अर्घ्य और अगले सूर्योदय पर उषा अर्घ्य।
संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य में क्या अंतर है?
संध्या अर्घ्य षष्ठी को डूबते सूर्य को दिया जाता है; उषा अर्घ्य अगली सुबह उगते सूर्य को, जिसके बाद व्रत खुलता है।
क्या छठ का व्रत निर्जल होता है?
परंपरा से हां, खरना के बाद से उषा अर्घ्य तक, लगभग छत्तीस घंटे। जो व्रत नहीं रख पाते, वे व्रतियों की सेवा करके इसमें शामिल होते हैं।