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व्रत कथा · छठ पूजा

छठ पूजा की कथा: छठी मैया और सूर्य देव

छठ पूजा की कथा अपनी बोली-बानी में: राजा प्रियव्रत और षष्ठी देवी, द्रौपदी का व्रत, कर्ण का अर्घ्य, मुंगेर में सीता जी, और डूबते सूरज को पहले अर्घ्य क्यों।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यहाँ कथा हमारे अपने शब्दों में है, जैसे परिवारों में पूजा के समय सुनाई जाती है। क्षेत्र और घर के हिसाब से कथा के रूप बदलते हैं; कथा में कहीं चेतावनी आए तो वह कहानी का हिस्सा है, पढ़ने वाले के लिए डर की बात नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

छठ पूजा की कथा कोई एक कहानी नहीं, कई कहानियाँ हैं, और सबके केंद्र में हैं सूरज देव और छठी मैया: राजा प्रियव्रत, जिनकी संतान को षष्ठी देवी ने जीवन लौटाया; द्रौपदी, जिन्होंने पांडवों के सब कुछ हार जाने पर यह व्रत किया; कर्ण, जो रोज़ नदी में खड़े होकर पिता सूर्य को अर्घ्य देते थे; और सीता जी, जिन्होंने कुछ कथाओं के अनुसार मुंगेर में गंगा किनारे छठ किया। ये कथाएँ किताब से कम पढ़ी जाती हैं, घर-आँगन और घाट पर ज़्यादा गाई जाती हैं।

नहाय-खाय से भोर के अर्घ्य तक छठ के चारों दिन छठ पूजा की तिथि वाले पृष्ठ पर हैं, और वसंत वाला छठ चैती छठ के पृष्ठ पर। यहाँ केवल कथाएँ हैं, हमारे अपने शब्दों में।

राजा प्रियव्रत और षष्ठी देवी

बहुत पुराने समय में स्वायंभुव मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत थे और उनकी रानी मालिनी। दोनों प्रजा का भला चाहने वाले राजा-रानी थे, पर उनकी गोद सूनी थी, और यह कमी पूरे महल में खलती थी। महर्षि कश्यप ने उनके लिए यज्ञ किया और रानी को खाने के लिए खीर का प्रसाद दिया।

समय आने पर रानी ने पुत्र को जन्म दिया, पर बालक में साँस नहीं थी। पूरा राज्य शोक में डूब गया। राजा अपने बेटे को गोद में लेकर श्मशान गए, और दुख में इतने टूट गए कि उन्होंने ठान लिया कि अब वे भी नहीं जिएँगे।

तभी आकाश में एक तेजस्वी देवी चमकते रथ पर प्रकट हुईं। उन्होंने कहा — राजन, मैं देवसेना हूँ, आदि माता का अंश, प्रकृति के छठे अंश से जन्मी, इसलिए षष्ठी कहलाती हूँ। मैं बच्चों की रखवाली करती हूँ और जिनकी गोद सूनी है, उन्हें संतान देती हूँ। यह कहकर देवी ने बालक को राजा की गोद से उठाया, और उनके छूते ही बच्चा साँस लेने और रोने लगा। उन्होंने बालक को पिता को लौटा दिया और बस इतना कहा कि मेरी पूजा का प्रचार करो, ताकि हर माँ-बाप मुझे याद रखे।

राजा प्रियव्रत जीवित पुत्र को लेकर नगर लौटे और घोषणा की कि शुक्ल पक्ष की षष्ठी को देवी की पूजा होगी। बिहार और पूरब के इलाक़ों में छठे दिन की यही देवी छठी मैया के नाम से पूजी जाती हैं। इसीलिए छठ का मुख्य दिन षष्ठी है, और इसीलिए बहुत-सी व्रती माँएँ यह व्रत बाल-बच्चों की कुशलता के लिए करती हैं।

कथा को शांत मन से समझें

यह कथा एक ऐसे बच्चे से शुरू होती है जो साँस लिए बिना जन्मा, और एक पिता के शोक से — जैसे माता की बहुत-सी पुरानी कथाएँ शुरू होती हैं। यह देवी की ममता दिखाने के लिए कही जाती है; इसका अर्थ यह नहीं कि किसी घर के बच्चों की कुशलता व्रत पर टिकी है। जिन दंपतियों ने संतान का दुख झेला है या लंबी प्रतीक्षा की है, उन्हें यह कथा ढाढ़स देती है; इसमें किसी का दोष नहीं ठहराया जाता। गर्भवती, बीमार या बुज़ुर्ग स्त्रियाँ हल्का व्रत रखती हैं, और डॉक्टर की सलाह सबसे पहले है।

द्रौपदी और पांडव

जब पांडव जुए में राज-पाट हारकर वन चले गए, तब भूख और अपमान के उन दिनों में घर को द्रौपदी ने सँभाला। बिहार की कथाओं में कहा जाता है कि एक ऋषि ने — कुछ कथाओं में पुरोहित धौम्य ने, कुछ में स्वयं श्रीकृष्ण ने — उन्हें कार्तिक की षष्ठी को सूर्य का व्रत करने की सलाह दी। द्रौपदी ने स्नान किया, निर्जल उपवास रखा, और साँझ और भोर दोनों बेला पानी में खड़े होकर अर्घ्य दिया। सूरज देव प्रसन्न हुए, और समय के साथ पांडवों को अपना बल और राज्य वापस मिला। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि वन में सूर्य ने युधिष्ठिर को जो अक्षय पात्र दिया था, जिससे हर अतिथि का पेट भरता था, वह भी इसी कृपा का हिस्सा था।

कर्ण का अर्घ्य

कुंती और सूर्य के पुत्र कर्ण सूर्य के सबसे बड़े उपासक थे। हर सुबह वे कमर तक नदी में उतरते और उगते सूरज की ओर मुँह करके घंटों खड़े रहते, जल चढ़ाते और प्रार्थना करते; उस पूजा के बाद जो भी उनसे कुछ माँगता, वे मना नहीं करते थे। बिहार और बंगाल में बहुत-से लोग मानते हैं कि छठ कर्ण से ही शुरू हुआ, जिनका अंग देश भागलपुर और मुंगेर के आसपास था, और व्रती जो कमर तक पानी में खड़े होते हैं, वह कर्ण की ही राह है।

मुंगेर में सीता जी

कुछ कथाओं में कहा जाता है कि लंका से लौटने के बाद राम और सीता ने कार्तिक की षष्ठी को सूर्य का व्रत किया, और राज्याभिषेक के समय दोनों ने साथ सूर्य की उपासना की। मुंगेर की कथा में सीता जी ने वहीं गंगा किनारे मुद्गल ऋषि के आश्रम में छठ व्रत किया, और नदी में एक चट्टान को वह जगह बताया जाता है जहाँ वे खड़ी हुईं और जहाँ उनके चरण-चिह्न आज भी हैं। मुंगेर के लोग इस कथा को बड़े प्रेम से सहेजते हैं, और यह भी एक कारण है कि वहाँ के घाटों पर इतने व्रती आते हैं।

कथाएँ कैसे सुनी जाती हैं

छठ में पुरोहित के साथ बैठकर कथा सुनने की रीत नहीं है। कथाएँ गीतों में चलती हैं: अर्घ्य से पहले की शामों में घर की औरतें एक साथ बैठकर छठी मैया के गीत गाती हैं, सूरज देव के, उस सुगा के जो अर्घ्य के केले पर चोंच मारता है, उस बाँस की बहँगी के जो दउरा के बोझ से लचक जाती है। "काँच ही बाँस के बहँगिया" और "उगी हे सुरुज देव" जैसे गीत लगभग हर घर में गाए जाते हैं। ठेकुआ के साँचे पर आटा दबाते-दबाते दादी बच्चों को द्रौपदी और कर्ण की कहानी सुना देती हैं।

चारों दिन का क्रम, सामग्री और अर्घ्य की विधि छठ पूजा विधि पृष्ठ पर है।

आज ये कथाएँ क्या कहती हैं

हर कथा किसी कठिन घड़ी से गुज़रती है — साँस न लेता बच्चा, हारा हुआ राज, वनवास। और हर कथा धीरज पर, और रोज़ दिखने वाले सूरज पर पूरी होती है। छठ में पहले डूबते सूरज को अर्घ्य दिया जाता है, जिसे बहुत-से लोग एक शांत सीख की तरह पढ़ते हैं: दिन का ढलना, और जीवन का कठिन हिस्सा भी, उतने ही धन्यवाद के योग्य है जितनी भोर। सारा टोला मिलकर काम करता है, और जो व्रत नहीं रख पाते, वे व्रतियों की सेवा करते हैं।

बिहार में संतान के लिए रखा जाने वाला दूसरा व्रत जितिया है, और छठ के कुछ दिन बाद देवउठनी एकादशी आती है। अपने शहर में सूर्योदय और सूर्यास्त के लिए पंचांग देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

छठी मैया कौन हैं?

छठी मैया छठ पर्व की माता हैं, जिनकी पूजा सूर्य देव के साथ होती है। बहुत-से लोग उन्हें पुराणों की षष्ठी देवी मानते हैं, जो संतान की रक्षा करती हैं। लोकगीतों में उन्हें सूर्य की बहन कहा जाता है, और कुछ कथाओं में सूर्य की पत्नी उषा या प्रत्यूषा।

छठ की शुरुआत की कौन-सी कथा कही जाती है?

कोई एक कथा नहीं है। घरों में राजा प्रियव्रत और षष्ठी देवी की कथा, पांडवों के कठिन दिनों में द्रौपदी के व्रत की कथा, रोज़ पिता सूर्य को जल देने वाले कर्ण की कथा, और सीता जी के व्रत की कथा कही जाती है — कुछ कथाओं में मुंगेर में, कुछ में अयोध्या में।

क्या छठ में कथा-वाचन होता है?

वैसे नहीं जैसे सत्यनारायण या करवा चौथ की पूजा में। छठ में न पुरोहित होते हैं, न कोई तय पाठ; इसकी कथाएँ घर और घाट पर गाए जाने वाले गीतों में बसती हैं, और उन बातों में जो दादी-नानी ठेकुआ बनाते समय बच्चों को सुनाती हैं।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • ब्रह्मवैवर्त पुराण (षष्ठी देवी और राजा प्रियव्रत की कथा), यहाँ हमारे अपने शब्दों में
  • महाभारत परंपरा में कर्ण की नित्य सूर्य उपासना
  • बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई की लोक और गीत परंपरा

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति