महाशिवरात्रि की जो कथा ज़्यादातर घरों में सुनाई जाती है, वह एक शिकारी की है, जिसने पूरी रात बेल के पेड़ पर छिपकर बिताई, अनजाने में नीचे के शिवलिंग पर बेलपत्र और जल गिराता रहा, और हिरणों के एक परिवार को इसलिए छोड़ दिया क्योंकि उन्होंने लौट आने का वचन दिया था। इसके साथ कई परिवार उस रात को भी याद करते हैं जब शिव आदि-अंत रहित ज्योति के स्तंभ के रूप में प्रकट हुए, और कुछ इसे शिव-पार्वती के विवाह की रात मानते हैं।
व्रत की रात, आपके शहर का निशीथ काल और तिथि तय करने का नियम महाशिवरात्रि की तिथि वाले पृष्ठ पर है। हर महीने यही रात छोटे रूप में मासिक शिवरात्रि बनकर लौटती है। यहाँ केवल कथा है, अपने शब्दों में।
बेल के पेड़ वाला शिकारी
किसी राज्य की सीमा पर एक घना जंगल था, और उसके किनारे एक शिकारी रहता था। व्रत की किताबों में उसका नाम गुरुद्रुह मिलता है, कहीं-कहीं कोई और नाम भी। जानवर पकड़कर बेचना ही उसकी रोज़ी थी, और गाँव के एक साहूकार का कर्ज़ उस पर चढ़ा हुआ था।
फागुन की अँधेरी चौदस को साहूकार का धीरज टूट गया। उसने शिकारी को दिन भर के लिए शिव मंदिर के पास की एक कोठरी में बंद करवा दिया। सारा दिन शिकारी के कानों में भक्तों का "शिव, शिव" और आने वाली रात की बातें पड़ती रहीं। खाने को कुछ नहीं मिला। शाम को उसने कर्ज़ चुकाने का वादा किया, तब जाकर छूटा, और भूखे पेट सीधा जंगल की ओर चल दिया कि कुछ शिकार मिले तो बेचकर घर चले।
चलते-चलते उसे एक तालाब मिला, जहाँ रात को जानवर पानी पीने आते थे। किनारे एक बेल का पेड़ था। वह उस पर चढ़कर बैठ गया। सामने साफ़ दिखे, इसलिए वह बीच-बीच में पतली टहनियाँ तोड़ता रहा, और तीन पत्तियों वाले बेलपत्र नीचे गिरते रहे। उसके पास तूँबी में थोड़ा पानी था, जो हिलने-डुलने पर छलक जाता। उसे पता ही नहीं था कि पेड़ के नीचे घास में छिपा एक पुराना शिवलिंग है। पत्ते भी उसी पर गिरे, पानी भी।
रात के पहले पहर में एक हिरनी पानी पीने आई। शिकारी ने धनुष ताना, और उसके हिलने से फिर कुछ पत्ते और बूँदें शिवलिंग पर जा गिरीं। हिरनी ने उसे देख लिया और बोली, "मैं गर्भ से हूँ। मुझे घर जाकर बच्चे को जन्म दे लेने दो, फिर मैं ख़ुद लौट आऊँगी।" शिकारी पल भर रुका, और फिर उसे जाने दिया।
दूसरे पहर में एक और हिरनी आई, जो अपने साथी को ढूँढ़ रही थी। फिर धनुष उठा, फिर पत्ते और पानी गिरे, और उसने भी थोड़ी मोहलत माँगी कि साथी से एक बार मिल ले। शिकारी ने उसे भी जाने दिया। तीसरे पहर में तीसरी हिरनी अपने छौनों के साथ आई और बोली कि बच्चों को उनके पिता के पास सुरक्षित छोड़ आऊँ, फिर आती हूँ। भूख से बेहाल शिकारी ने उसे भी छोड़ दिया।
भोर से पहले एक हिरन तालाब पर आया। धनुष तना तो उसने पूछा, "क्या इधर से तीन हिरनियाँ गई हैं? अगर तुमने उन्हें छोड़ा है तो मुझे भी एक बार उनसे मिल आने दो। फिर हम सब साथ लौट आएँगे।" शिकारी मान गया।
इस तरह, बिना जाने, उसने पूरी रात उपवास किया, जागरण किया, और हर पहर में शिव पर बेलपत्र और जल चढ़ाया। सुबह की पहली रोशनी में हिरन का पूरा परिवार, जैसा कहा था, वैसा ही लौट आया। शिकारी ने उन्हें सामने खड़ा देखा, वचन निभाने को तैयार, और उसका कठोर मन पिघल गया। उसने धनुष नीचे रख दिया और कहा, "जाओ।"
कथा में उसी क्षण भगवान शिव प्रकट हुए। शिकारी को उनकी कृपा मिली, और बहुत-सी कथाओं में उसे नया नाम और भूख-कर्ज़ से मुक्त नया जीवन मिला। हिरनों का परिवार अपनी सच्चाई के कारण आकाश में स्थान पा गया।
कथा को सहज मन से पढ़ें
इस कथा में धनुष-बाण है, मौत के सामने खड़े जानवर हैं, कर्ज़ और कोठरी की बात है। इसका अर्थ यह नहीं कि अनजाने की पूजा से कोई इनाम पक्का मिल जाता है, न ही यह कि कोई विधि छूट जाए तो डरने की बात है। घर की बड़ी-बूढ़ियाँ इसे सुनाते हुए आख़िरी मोड़ पर ज़ोर देती हैं: भूखे, कठोर आदमी ने दया चुनी, और जानवरों ने भाग निकलने का आसान रास्ता छोड़कर अपना वचन निभाया। उपवास, जागरण और बेलपत्र उस चुनाव के चारों ओर का घेरा हैं, उसकी जगह नहीं।
दूसरी कथाएँ
- राजा जिसे पिछला जन्म याद था। एक रूप में यही शिकारी अगले जन्म में चित्रभानु नाम का राजा बनता है। उसे पिछला जन्म याद रहता है, और वह एक ऋषि को पूरी कथा सुनाकर बताता है कि वह शिवरात्रि का व्रत क्यों रखता है।
- ज्योतिर्लिंग। एक बार ब्रह्मा और विष्णु में बहस छिड़ी कि बड़ा कौन है। तभी दोनों के बीच आग का एक खंभा उठा, इतना ऊँचा और इतना गहरा कि कोई छोर न दिखे। विष्णु वराह बनकर नीचे खोदते गए, ब्रह्मा हंस बनकर ऊपर उड़ते गए; दोनों में से किसी को अंत नहीं मिला। तब उस स्तंभ से शिव प्रकट हुए। बहुत-से भक्तों के लिए यही इस रात का अर्थ है: बड़े-छोटे के झगड़े से परे कुछ है, जिसका कोई ओर-छोर नहीं।
- शिव-पार्वती विवाह। उत्तर भारत के बहुत-से घरों में माना जाता है कि पार्वती के लंबे तप के बाद इसी रात उनका शिव से विवाह हुआ। कई मंदिरों में इस दिन बाजे-गाजे और गणों के साथ शिव की बारात निकलती है।
- कश्मीर। कश्मीरी पंडित इस रात को हेरथ के रूप में मनाते हैं, जिसकी अपनी कथाएँ हैं और जिसकी रीतें कई दिन चलती हैं।
कथा कब और कैसे सुनी जाती है
यह कथा रात की है। बहुत-से घरों में पहले या दूसरे पहर की पूजा के बाद, जब शिवलिंग का अभिषेक हो चुका हो और बेलपत्र चढ़ चुके हों, परिवार साथ बैठकर इसे पढ़ता है। मंदिरों में जागरण के बीच, भजनों के दौर के बीच कोई पुजारी या बुज़ुर्ग कथा सुनाते हैं, और उसके बाद "ॐ जय शिव ओंकारा" वाली आरती गाई जाती है। कुछ लोग इसे दो बार पढ़ते हैं, एक बार साँझ को और एक बार भोर से पहले, ताकि नींद भी न आए और रात का बीतना भी महसूस हो।
रात की पूजा का पूरा क्रम, सामग्री और चारों पहर की बात महाशिवरात्रि पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आज यह कथा क्या कहती है
बहुतों को शिवरात्रि की कथाओं में यही शिकारी सबसे अपना लगता है। वह न पढ़ा-लिखा है, न धर्मात्मा, न कुछ करने की कोशिश में। वह थका है, कर्ज़ में डूबा है, और वही काम कर रहा है जो उसे आता है; फिर भी वह रात उसे वहीं आकर मिलती है जहाँ वह खड़ा है। कथा सुनने वाले को भरोसा देती है कि सच्चे मन का छोटा-सा काम भी गिना जाता है, और डरे हुए जानवर का निभाया वचन भी भरी झोली से बड़ा है।
यह रात शिव के छोटे व्रतों के बीच आती है। हर शिवरात्रि से एक दिन पहले त्रयोदशी की साँझ को प्रदोष व्रत रखा जाता है, और बहुत-से लोग साल भर सोलह सोमवार का व्रत करते हैं। रात की पूजा का समय देखने के लिए अपने शहर का पंचांग तिथि बताता है, और जो परिवार शाम की पूजा अच्छे समय में शुरू करना चाहते हैं, वे चौघड़िया देख सकते हैं।