प्रदोष व्रत की कथा उस ग़रीब ब्राह्मणी की है, जिसने विदर्भ के अनाथ राजकुमार धर्मगुप्त को अपने बेटे के साथ पाला-पोसा, और कैसे प्रदोष का व्रत रखने से राजकुमार को गंधर्व राजकन्या अंशुमती मिली और पिता का सिंहासन वापस मिला। इसके साथ वह पुरानी बात भी कही जाती है कि सांझ की यह बेला पवित्र क्यों है: समुद्र मंथन से निकला विष शिव जी ने पिया, और त्रयोदशी की सांझ उनकी हो गई।
प्रदोष महीने में दो बार, दोनों पक्षों की त्रयोदशी को आता है। तिथियाँ और आपके शहर का प्रदोष काल प्रदोष व्रत की तिथियों वाले पृष्ठ पर हैं, और उस दिन की तिथि और सूर्यास्त पंचांग में भी देखे जा सकते हैं। यह पृष्ठ केवल कथा का है, हमारे अपने शब्दों में।
सांझ की बेला क्यों पवित्र है
देवताओं और असुरों ने अमृत पाने के लिए क्षीरसागर को मथा, तो गहराई से सबसे पहले अमृत नहीं, हलाहल विष निकला। वह काले धुएँ की तरह फैलने लगा और तीनों लोकों का दम घुटने लगा। न देवता उसे छू सके, न असुर। सब भागकर शिव जी की शरण में पहुँचे।
शिव जी ने अंजुली में विष लिया और पी गए। पार्वती जी ने उनका कंठ दबा दिया ताकि विष नीचे न उतरे; वह वहीं ठहर गया और उनका गला नीला पड़ गया। इसी से वे नीलकंठ कहलाए।
कहने वाले बताते हैं कि यह सब त्रयोदशी के दिन, दिन ढलते-ढलते हुआ, और जब लोक सुरक्षित हो गए तो शिव जी ने गोधूलि में कैलास पर नृत्य किया और देवताओं ने उनकी स्तुति गाई। इसीलिए त्रयोदशी को सूर्यास्त के बाद की घड़ी, प्रदोष काल, वह समय मानी जाती है जब शिव जी सबसे प्रसन्न और सबसे सहज सुलभ होते हैं, और व्रत की पूजा इसी समय होती है।
धर्मगुप्त की कथा
विदर्भ नगर में कभी सत्यरथ नाम के एक धर्मात्मा राजा राज करते थे। शत्रु राजाओं ने मिलकर उन पर चढ़ाई की; युद्ध में राजा मारे गए और नगर शत्रुओं के हाथ चला गया। रानी उस समय गर्भवती थीं। वे अकेली जंगल की ओर निकल गईं, और वहीं उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया। कुछ ही समय बाद वे पानी पीने एक सरोवर में उतरीं और उसी जल में उनके प्राण चले गए। नन्हा राजकुमार किनारे अकेला रह गया।
उसी सुबह एक ग़रीब ब्राह्मणी अपने छोटे बेटे शुचिव्रत को साथ लिए उस राह से गुज़री। वह घर-घर से भिक्षा माँगकर गुज़ारा करती थी, और दो पेट भरना भी उसके लिए भारी था। पेड़ के नीचे रोते बच्चे को देखकर वह ठिठकी — न जाने किसका बच्चा है, मैं इसे खिलाऊँगी कैसे? तभी एक बूढ़े संन्यासी आए, जिन्हें बहुत-सी कथाएँ वेश बदले स्वयं शिव जी बताती हैं, और बोले, इसे ले जाओ और अपना बेटा मानकर पालो, यह राजवंश का है। ब्राह्मणी ने और कुछ नहीं पूछा। बच्चे को गोद में उठा लिया और उसका नाम धर्मगुप्त रखा।
दोनों बच्चे उसी झोंपड़ी में साथ बड़े हुए, जो रूखा-सूखा मिलता, बाँटकर खाते। जब वे कुछ बड़े हुए, ब्राह्मणी उन्हें एक मंदिर में ले गई जहाँ शांडिल्य ऋषि ठहरे थे। ऋषि ने राजकुमार को देखते ही पहचान लिया और ब्राह्मणी को बताया कि यह राजा सत्यरथ का पुत्र है, जिनका राज छिन गया था। उन्होंने कहा कि पिछले जन्म में उस राजा ने प्रदोष के दिन शिव पूजा की उपेक्षा की थी। फिर ऋषि ने ब्राह्मणी और दोनों बालकों को प्रदोष व्रत की विधि सिखाई: हर त्रयोदशी को दिन भर उपवास और सांझ को शिव पूजन।
तीनों ने पूरी श्रद्धा से व्रत रखा। कुछ महीनों बाद शुचिव्रत नदी में नहाने गया तो किनारे की मिट्टी में आधा दबा एक घड़ा दिखा, सोने से भरा हुआ। वह उसे घर ले आया, और ब्राह्मणी ने ज़ोर देकर कहा कि दोनों भाई इसे बराबर बाँटें।
कुछ समय बाद धर्मगुप्त घूमते-घूमते एक वन में पहुँचा, जहाँ एक झरने के पास कुछ गंधर्व कन्याएँ खेल रही थीं। उनमें गंधर्व राज की बेटी अंशुमती भी थी। उसने राजकुमार को देखा, उससे बात की, और दोनों को एक-दूसरे का साथ भा गया। अंशुमती ने कहा, कुछ दिन बाद फिर आना। जब धर्मगुप्त लौटा तो वहाँ उसके पिता गंधर्व राज प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने बताया कि शिव जी ने सपने में आकर कहा है कि अंशुमती का विवाह सत्यरथ के इसी बेटे से करो।
धर्मगुप्त और अंशुमती का विवाह हुआ। गंधर्व राज और उनकी सेना की सहायता से राजकुमार विदर्भ लौटा, जिन्होंने राज छीना था उन्हें हराया और पिता की गद्दी पर बैठा। उसने ब्राह्मणी को महल में लाकर माँ का आदर दिया, और शुचिव्रत जीवन भर उसके भाई की तरह साथ रहा। कथा कहती है कि यह सब प्रदोष के व्रत को श्रद्धा से निभाने का फल था।
कथा को शांत मन से समझें
कथा दो मौतों और एक छिने हुए राज्य से शुरू होती है, और उस हानि को पिछले जन्म की भूल से जोड़ती है। पुरानी कथाएँ भाग्य के पलटने की ज़मीन ऐसे ही तैयार करती हैं; इसका मतलब यह नहीं कि किसी परिवार का दुख किसी सज़ा का फल है। कथा का दिल वह ब्राह्मणी है, जिसके पास कुछ नहीं था, फिर भी उसने बिना पूछे कि किसका है, एक रोते बच्चे को उठा लिया। उसकी दया व्रत से पहले आती है, और कथा में जो कुछ अच्छा होता है, वह उसी से उपजता है।
वार के अनुसार प्रदोष की कथाएँ
हर प्रदोष अपने वार के नाम से जाना जाता है, और व्रत की पुस्तकें हर एक की छोटी अलग कथा देती हैं। सोमवार का सोम प्रदोष शिव जी को विशेष प्रिय माना जाता है; मंगलवार का भौम प्रदोष सेहत और क़र्ज़ से छुटकारे से जुड़ा है; शनिवार का शनि प्रदोष संतान की कामना वाले दंपती ख़ास तौर पर रखते हैं। बहुत-से घर मुख्य कथा के बाद उस वार की कथा पढ़ते हैं। आने वाले हर प्रदोष का वार प्रदोष पृष्ठ पर दिखाया गया है।
कथा के दूसरे रूप
- ब्राह्मणी का नाम घरों में कही जाने वाली ज़्यादातर कथाओं में नहीं आता; वह बस ब्राह्मण माँ है। उसके बेटे के नाम की वर्तनी भी किताब-किताब में थोड़ी बदल जाती है।
- वेश बदले संन्यासी कुछ ही रूपों में आते हैं; बाक़ी में ब्राह्मणी अपने मन से बच्चे को उठा लेती है।
- विष की कथा कुछ घरों में मुख्य कथा की तरह कही जाती है, और धर्मगुप्त की कथा सोम या शनि प्रदोष जैसे बड़े प्रदोषों के लिए रखी जाती है।
कथा कैसे सुनी जाती है
प्रदोष प्रायः घर पर ही रखा जाता है। गोधूलि में शिवलिंग के अभिषेक और बेलपत्र चढ़ाने के बाद कोई सदस्य ज़ोर से कथा पढ़ता है, बाक़ी हाथ जोड़कर सुनते हैं, और शाम "ॐ जय शिव ओंकारा" आरती से पूरी होती है। शाम की पूजा का पूरा क्रम प्रदोष पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आज यह कथा क्या कहती है
प्रदोष कोई बड़ा त्योहार नहीं, एक शांत, नियमित साधना है: महीने में दो उपवास और सांझ को एक दीया। कथा भी ऐसी ही है। इसमें शुरू में कोई बलवान नहीं; एक विधवा, दो बालक और एक व्रत ही काफ़ी हैं। साल में शिव जी की सबसे बड़ी रात महाशिवरात्रि है, और जो सोमवार शिव जी के लिए रखते हैं, वे सोलह सोमवार की कथा भी जानते होंगे। शाम की पूजा अच्छे समय में शुरू करनी हो तो चौघड़िया देख लें।