संतोषी माता की व्रत कथा एक नई बहू की कहानी है, जिसका पति कमाने के लिए दूर परदेस चला गया, और जिसने कठिन दिनों में गुड़-चने के भोग वाला शुक्रवार का व्रत रखकर अपना रास्ता पाया। यह कथा व्रत के हर शुक्रवार को पढ़ी जाती है, और सोलह शुक्रवार पूरे होने पर उद्यापन के दिन भी।
संतोषी माता के व्रत की कोई तय तिथि नहीं; यह साधारण शुक्रवारों को रखा जाता है, और इसे रखने वाली बहुत-सी महिलाएँ देवी के नौ दिन यानी शारदीय नवरात्रि भी रखती हैं। साल भर के त्योहार त्योहारों के कैलेंडर में देखें, और शुक्रवार की पूजा कैसे होती है, यह संतोषी माता पूजा विधि पृष्ठ पर है।
संतोषी माता कौन हैं
संतोषी माता संतोष की देवी हैं। लोक-मान्यता में वे गणेश जी की बेटी हैं: रक्षाबंधन के दिन गणेश जी के बेटों शुभ और लाभ ने बहन की ज़िद की, तब रिद्धि और सिद्धि के तेज से एक ज्योति निकली और कन्या बन गई। इनकी पूजा ज़्यादातर मुँह-ज़बानी और छोटी छपी व्रत पुस्तिकाओं से फैली, और बीसवीं सदी में पूरे देश में जानी गई, जिसमें जय संतोषी माँ फ़िल्म का बहुत बड़ा योगदान रहा। नीचे की कथा वही है जो इन पुस्तिकाओं और फ़िल्म दोनों में मिलती है।
बहू की कथा
एक बुढ़िया के सात बेटे थे। छह कमाते थे, सबसे छोटा कुछ नहीं करता था। माँ छहों को ताज़ा खाना परोसती और उनकी थालियों में बची जूठन छोटे को दे देती। छोटे की पत्नी ने यह देखा और पति को बताया। बात उसके मन में चुभ गई और उसने तय किया कि अब परदेस जाकर अपनी कमाई करूँगा। जाते समय उसने पत्नी से कोई निशानी माँगी; पत्नी के हाथ आटे में सने थे, उसने वही हाथ पति की कमीज़ पर छाप दिया।
वह दूर एक नगर में पहुँचा और एक सेठ के यहाँ नौकरी कर ली। ईमानदार और फुर्तीला था, सो कुछ समय में सेठ ने उसे हिस्सेदार बना लिया। कारोबार में ऐसा रमा कि धीरे-धीरे घर की सुध ही भूल गया।
इधर बहू भरे घर में जेठानियों के बीच अकेली रह गई। उसे सबसे भारी काम दिए जाते — जंगल से लकड़ी लाना, चक्की पीसना, पानी भरना। खाने को भूसी की रोटी और पीने को टूटे नारियल की खोपड़ी में पानी मिलता। वह चुपचाप सब सहती रही।
एक दिन जंगल से लौटते हुए उसने मंदिर में कुछ स्त्रियों को पूजा करते देखा। पूछा, यह किसकी पूजा है और कैसे होती है। स्त्रियों ने बताया कि यह संतोषी माता का व्रत है: शुक्रवार को, जितना बन पड़े उतने में, गुड़ और भुने चने का भोग लगाओ, कथा सुनो, और उस दिन खट्टा मत खाओ। तय गिनती के शुक्रवार, प्रायः सोलह, पूरे होने पर उद्यापन करो और आठ बालकों को भोजन कराओ।
बहू ने लकड़ी का गट्ठर बेचकर कुछ पैसे पाए, गुड़-चना लिया और व्रत शुरू कर दिया। अगले शुक्रवारों में खबर आने लगी — पहले पति की चिट्ठी, फिर पैसे। जेठानियों के ताने और तीखे हो गए, पर वह व्रत करती रही। एक शुक्रवार वह मंदिर में रो पड़ी और माता से पूछा कि पति के दर्शन कब होंगे।
उसी रात संतोषी माता ने पति के सपने में आकर उसे पत्नी और घर की याद दिलाई। वह बेचैन होकर उठा। कथा कहती है कि उसका हिसाब उलझा पड़ा था और माल बिका नहीं था, पर एक ही दिन में सब सुलझ गया, उसका हिस्सा उसे मिल गया, और वह सबके लिए उपहार लेकर घर की ओर चल पड़ा।
जब वह गाँव पहुँचा, बहू सिर पर लकड़ी का गट्ठर लिए जंगल से लौट रही थी। रोज़ की तरह वह पहले मंदिर गई, और माता ने उसे बताया कि तेरा पति लौट आया है। वह घर पहुँची। पति ने अपनी आँखों से देखा कि घर में उसके साथ कैसा बर्ताव होता है, और उसके साथ अलग घर बसा लिया। दोनों सुख से रहने लगे।
उद्यापन और खटाई
जब मन्नत के शुक्रवार पूरे हुए, बहू ने उद्यापन की तैयारी की और आठ बालकों को न्योता दिया, जिनमें जेठानियों के बच्चे भी थे। जलन में जेठानियों ने बच्चों को सिखा दिया कि खाने के बाद पैसे माँगना और खटाई की ज़िद करना। बच्चों ने मीठा भोजन खाया, फिर पैसे माँगे, और उन पैसों से इमली लेकर खा ली।
कथा कहती है कि माता अप्रसन्न हुईं। कुछ ही समय बाद राजा के सिपाही आए और पति को यह कहकर ले गए कि उसकी कमाई ईमानदारी की नहीं है। बहू दुखी मन से मंदिर गई और पूछा कि मुझसे क्या भूल हुई। उसे बताया गया कि उद्यापन का नियम टूट गया था। उसने फिर से, पूरे ध्यान से उद्यापन करने का संकल्प लिया। पति छूट गया, उसकी कमाई सच्ची साबित हुई और वह घर लौट आया।
आगे चलकर उनके घर बेटा हुआ। एक दिन संतोषी माता एक डरावनी बुढ़िया का रूप धरकर उनके घर आईं। घर के लोग डरकर भाग गए, पर बहू ने उन्हें पहचान लिया और खुशी से उनका स्वागत किया। माता ने पूरे परिवार को आशीर्वाद दिया, और जेठानियाँ भी यह व्रत रखने लगीं।
कथा को शांत मन से समझें
यह एक लोककथा है, और बहुत-सी लोककथाओं की तरह यह भी अचानक आए उलटफेर से सीख देती है। इसका अर्थ यह नहीं कि खट्टे का एक कौर किसी परिवार पर संकट ला देगा। बच्चों का कुछ चटपटा माँगना तो सबसे स्वाभाविक बात है; कथा में असली भूल उन बड़ों की है जिन्होंने जलन को योजना बना लिया। बहू बस धीरज से, बिना किसी को दोष दिए, फिर से शुरुआत करती है — आज कथा सुनाने वाली माँ-दादी इसी बात पर ज़ोर देती हैं। माता का आखिरी रूप, जिसे देखकर सब भाग जाते हैं, भी यही कहता है कि भलाई को पहचानने वाली आँख हर रूप के पीछे देख लेती है।
कथा के और रूप
- कुछ कथाओं में पति की निशानी आटे वाले हाथ की छाप नहीं, एक अँगूठी है।
- कुछ पुस्तिकाएँ सेठ के नगर का नाम देती हैं, कुछ नहीं; पति के पकड़े जाने का कारण कहीं बकाया कर बताया जाता है, कहीं झूठा आरोप।
- शुक्रवारों की गिनती घर-घर अलग है। सोलह सबसे आम है; कुछ महिलाएँ मनोकामना पूरी होने तक व्रत रखती हैं और फिर उद्यापन करती हैं।
कथा कैसे सुनी जाती है
व्रत के हर शुक्रवार पूजा के बाद कथा ज़ोर से पढ़ी जाती है, और सुनने वाले हाथ में गुड़ और चने के कुछ दाने लिए बैठते हैं। अंत में ये दाने माता को चढ़ाए जाते हैं, जय संतोषी माता आरती गाई जाती है, और गुड़-चना सबमें बँटता है। बहुत-से बच्चों ने यह कथा पहली बार ऐसे ही, किसी शांत शुक्रवार की सुबह, माँ या दादी के मुँह से सुनी है।
आज यह कथा क्या कहती है
संतोषी माता का व्रत साल के सबसे सहज व्रतों में है। इसमें बस मुट्ठी भर गुड़ और भुने चने चाहिए, जो लगभग हर घर में होते हैं, और इसकी नायिका वह स्त्री है जिसके पास कुछ नहीं था, फिर भी उसने अपनी आस्था और अपनी भलमनसाहत नहीं छोड़ी। बहुत-सी महिलाओं के लिए यह उनका अपना व्रत रहा — न पंडित की ज़रूरत, न खर्च की।
इसी भाव की दो और कथाएँ हैं — घर पर कोई भी कर सके ऐसी सत्यनारायण व्रत कथा, और सोलह हफ़्तों तक चलने वाला दूसरा व्रत, सोलह सोमवार की कथा। जो परिवार शुक्रवार की पूजा अच्छे समय में शुरू करना पसंद करते हैं, वे चौघड़िया देखते हैं और शुक्रवार का राहु काल छोड़ देते हैं।