संतोषी माता का व्रत संतोष की देवी के लिए शुक्रवार का उपवास है, जो सादी पूजा, गुड़ और भुने चने के भोग और कथा सुनकर रखा जाता है, प्रायः लगातार सोलह शुक्रवार तक। संक्षेप में: पहले शुक्रवार को कितने शुक्रवार रखने हैं इसका संकल्प लें, हर शुक्रवार कलश और माता का चित्र रखकर गुड़-चने का भोग लगाएँ, कथा सुनें, आरती गाएँ, दिन भर खट्टा न खाएँ, और आखिरी शुक्रवार के बाद आठ बालकों को भोजन कराकर उद्यापन करें।
इस व्रत की अपनी कोई त्योहार-तिथि नहीं, क्योंकि यह किसी भी शुक्रवार से शुरू हो सकता है; इसे रखने वाली बहुत-सी महिलाएँ शारदीय नवरात्रि भी रखती हैं, और साल के बाकी त्योहार त्योहारों के कैलेंडर में हैं। हर शुक्रवार पढ़ी जाने वाली कथा संतोषी माता व्रत कथा पृष्ठ पर है।
पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें
- संतोषी माता का चित्र या छोटी मूर्ति
- चौकी और उस पर लाल कपड़ा
- जल भरा कलश या लोटा, और उसके मुँह पर रखने को एक छोटी कटोरी
- गुड़ और चना: थोड़ा गुड़ और भुने चने, जो कलश के ऊपर वाली कटोरी में रखे जाते हैं
- रोली, हल्दी, अक्षत, लाल फूल, छोटी माला
- घी का दीया और धूप-अगरबत्ती
- कथा की पुस्तिका
- उद्यापन के लिए: पूरी, चने की सूखी सब्ज़ी, खीर या हलवे का सामान, और आठ बालकों के लिए छोटे उपहार; भोजन में खट्टा कुछ नहीं
बस इतना ही। यह व्रत ऐसी पूजा के रूप में शुरू हुआ था जिसे कोई भी दो-चार सिक्कों में कर ले, और आज भी इससे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए।
हर शुक्रवार की पूजा का क्रम
- स्नान और संकल्प। पहले शुक्रवार सुबह जल्दी नहाकर चित्र के सामने बैठें, दाएँ हाथ में जल और अक्षत लेकर अपने शब्दों में कहें कि कितने शुक्रवार व्रत रखेंगी, और मन में कोई कामना हो तो वह भी। बाद के शुक्रवारों को छोटी-सी प्रार्थना काफ़ी है।
- पूजा सजाएँ। चौकी पर चित्र रखें। कलश में जल भरें, मुँह पर कटोरी रखें और कटोरी में गुड़-चना रखें।
- माता का पूजन। रोली, हल्दी, अक्षत और फूल चढ़ाएँ। दीया और धूप जलाएँ।
- कथा सुनें। हाथ में गुड़ और चने के कुछ दाने लेकर कथा पढ़ें या सुनें। बहुत-से घरों में सब मिलकर, बच्चों के साथ, कथा पढ़ते हैं।
- आरती। जय संतोषी माता आरती गाएँ, फिर हाथ के दाने माता को अर्पित कर दें।
- जल और प्रसाद। बहुत-सी महिलाएँ कलश का जल घर में छिड़कती हैं और बाकी तुलसी की जड़ में डाल देती हैं। गुड़-चना प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है, और थोड़ा गाय को भी दिया जाता है।
- दिन भर। दिन में एक बार सादा भोजन या फल लें, खट्टा कुछ न खाएँ, और उस दिन अपने हाथ से किसी को खट्टी चीज़ न दें।
उद्यापन
मन्नत का आखिरी शुक्रवार पूरा होने के बाद, अगले शुक्रवार उद्यापन होता है:
- रोज़ की तरह पूजा करें और कथा सुनें।
- पूरी, चना और खीर या हलवा बनाएँ; किसी पकवान में खटाई न हो — दही या नींबू भी नहीं।
- घर या पड़ोस के आठ बालकों को बुलाएँ और प्रेम से भोजन कराएँ।
- चाहें तो हर बालक को पैसे की जगह कोई फल, मिठाई या छोटा उपहार दें; कथा की याद में बहुत-से परिवार नकद नहीं देते।
- माता को धन्यवाद दें और प्रसाद बाँटें।
समय कैसे देखें
शुक्रवार की पूजा प्रायः सुबह नहाने के बाद होती है, और इसका कोई तय मुहूर्त नहीं। जो परिवार राहु काल से बचना पसंद करते हैं, वे अपने शहर का शुक्रवार का राहु काल देखते हैं, जो ज़्यादातर जगह शुक्रवार को दोपहर से कुछ पहले पड़ता है, और उससे पहले या बाद में पूजा शुरू करते हैं। अच्छी घड़ी में शुरुआत चाहें तो चौघड़िया देख लें। पहले शुक्रवार या उद्यापन के लिए कुछ परिवार पंचांग भी देखते हैं, ताकि दिन अमावस्या या घर के किसी और व्रत-त्योहार से न टकराए।
परिवारों के रीति-रिवाज
ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; आपके घर की अपनी रीति सबसे पहले है।
- व्रत के दिन खट्टा नहीं: इमली, नींबू, दही, अचार, कच्चा आम या कोई खटाई वाली चीज़ नहीं। कुछ घरों में यह पूरे परिवार के लिए होता है, कुछ में केवल व्रत रखने वाली के लिए।
- यात्रा, बीमारी या मासिक धर्म के कारण कोई शुक्रवार छूट जाए, तो बहुत-सी महिलाएँ अगले हफ़्ते से फिर रख लेती हैं और वह शुक्रवार बाद में जोड़ लेती हैं।
- बहुत-से घरों में उद्यापन के बालकों को पैसे नहीं, फल या खिलौना दिया जाता है।
- कुछ महिलाएँ व्रत के शुक्रवारों को लाल या नारंगी कपड़े पहनती हैं।
- यह व्रत जान-बूझकर हल्का रखा गया है। गर्भवती, बीमार या बुज़ुर्ग महिलाएँ बिना उपवास के केवल पूजा और कथा कर सकती हैं; परंपरा इसकी छूट देती है।
प्रांतों के अपने ढंग
- उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश: सबसे प्रचलित रूप, कलश पर गुड़-चने की कटोरी और छोटी छपी पुस्तिका से कथा।
- राजस्थान: यह व्रत बहुत लोकप्रिय है, और कई कस्बों में संतोषी माता के मंदिर हैं जहाँ शुक्रवार सुबह महिलाएँ इकट्ठी होती हैं।
- गुजरात और महाराष्ट्र: बहुत-से घरों में यही ढंग चलता है; उद्यापन का भोजन स्थानीय रुचि का हो सकता है, पर खटाई के बिना।
- कुछ परिवारों में अपनी रीति के अनुसार उद्यापन आठ की जगह सात या ग्यारह बच्चों के साथ होता है।
पूजा के बाद
गुड़-चना घर में सबको बाँटें और चित्र को अगले शुक्रवार के लिए उसकी जगह पर रहने दें। इसी भाव की और कथाएँ हैं — सत्यनारायण व्रत कथा और सोलह हफ़्तों तक रखे जाने वाले सोमवार व्रत की सोलह सोमवार कथा।