मुख्य सामग्री पर जाएँ
सतमार्ग ज्योतिषSatmarg Astro

पूजा विधि · संकष्टी चतुर्थी

संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि: व्रत, गणेश पूजा और चंद्र अर्घ्य

संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि घर पर: दिन भर का व्रत, शाम को दूब और मोदक से गणेश पूजा, कथा, और चाँद निकलने पर अर्घ्य देकर व्रत खोलना।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
  • अद्यतन
  • 5 मिनट में पढ़ें

यह घर पर पूजा करने का आम तरीका है। आपके परिवार की रीति सबसे पहले है: क्षेत्र के हिसाब से क्रम, सामग्री और शब्द बदलते हैं, और मन से की गई सादी पूजा भी पूरी है। इसके लिए किसी से कुछ खरीदने की ज़रूरत नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

संकष्टी चतुर्थी सूर्योदय से चंद्रोदय तक का व्रत है, जिसमें शाम को गणेश जी की पूजा होती है और निकलते चाँद को जल चढ़ाकर व्रत खोला जाता है। संक्षेप में: सुबह नहाकर संकल्प लें, दिन भर व्रत रखें, सांझ को दूब, लाल फूल और मोदक से गणेश जी को पूजें, कथा सुनें, फिर चाँद की राह देखें, उसे अर्घ्य दें और भोजन करें।

इस महीने की संकष्टी, उस दिन पूजा जाने वाला गणेश-रूप और आपके शहर का चंद्रोदय संकष्टी चतुर्थी की तिथियों वाले पृष्ठ पर है। एक शहर से दूसरे शहर में चाँद कई मिनट आगे-पीछे निकलता है, इसलिए किसी और जगह के लिए छपी सूची के बजाय अपना समय चंद्रोदय पृष्ठ पर देखें।

पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें

  • गणेश जी की छोटी मूर्ति या चित्र, या घर पर मिट्टी या हल्दी से बनाए गणेश
  • चौकी, और उस पर बिछाने को लाल या पीला कपड़ा
  • धुली हुई दूब, छोटी-छोटी गड्डियों में बँधी
  • लाल फूल, मिल जाए तो गुड़हल; थोड़े गेंदे के फूल
  • रोली या कुमकुम, सिंदूर, हल्दी, अक्षत, चंदन
  • घी का दीया और धूप
  • भोग के लिए मोदक या लड्डू; माघ की सकट चौथ पर तिल-गुड़ के लड्डू या तिलकुट
  • केला या कोई मौसमी फल, और बहुत-से घरों में पान का पत्ता और साबुत सुपारी
  • चंद्रमा के अर्घ्य के लिए जल भरा लोटा, जिसमें थोड़ा दूध, चावल और एक फूल डाला जाए
  • कथा की किताब, या घर का कोई सदस्य जिसे कथा याद हो

यह सब घटाया भी जा सकता है। कथाएँ ख़ुद कहती हैं कि गणेश जी जल्दी रीझते हैं; दूब की एक गड्डी और थोड़ा-सा गुड़ भी पूरा भोग है।

पूजा का क्रम

  1. सुबह का संकल्प। नहाकर पूर्व की ओर मुँह करके बैठें, दाएँ हाथ में थोड़ा जल लें और अपने शब्दों में कहें कि आप गणेश जी के लिए संकष्टी का व्रत रख रहे हैं; चाहें तो मन की कामना भी कह दें। जल धरती पर छोड़ दें।
  2. दिन भर। व्रत वैसे रखें जैसे घर में चलता है: केवल पानी, या फलाहार — फल, दूध, साबूदाने की खिचड़ी, मूँगफली। अन्न और नमक प्रायः चाँद निकलने तक नहीं लिया जाता।
  3. पूजा की जगह। सूरज ढलने से पहले पूजा का कोना साफ़ करें, चौकी पर कपड़ा बिछाकर गणेश जी को पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बिठाएँ। पास में दीया, दूब, फूल और भोग रख लें।
  4. शाम की पूजा। दोबारा नहा लें या हाथ-मुँह धो लें। दीया जलाएँ। गणेश जी को पहले जल, फिर रोली, अक्षत, सिंदूर और चंदन चढ़ाएँ। दूब की गड्डियाँ एक-एक करके अर्पित करें, लाल फूल चढ़ाएँ, और मोदक या तिल-गुड़ सामने रखें।
  5. उस महीने का रूप। हर महीने गणेश जी के एक नाम वाले रूप की पूजा होती है — वक्रतुंड, लंबोदर, भालचंद्र और बाक़ी — और बहुत-से घरों में हाथ जोड़कर बस वही नाम ले लिया जाता है। "ॐ गं गणपतये नमः" जैसा छोटा नाम-मंत्र काफ़ी है।
  6. कथा। संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा पढ़ें या सुनें। फिर बहुत-से घरों में "जय गणेश देवा" आरती गाई जाती है।
  7. चाँद की प्रतीक्षा। चंद्रोदय का समय पास आए तो छत या खिड़की पर चले जाएँ।
  8. चंद्रमा को अर्घ्य। लोटे में दूध, चावल और फूल डालें, और चाँद की ओर पतली धार में धीरे-धीरे जल चढ़ाएँ, मन ही मन प्रार्थना करते हुए। कुछ घर साथ में दीया भी दिखाते हैं, या पहले लोटे के किनारे पर रोली लगाते हैं।
  9. व्रत खोलें। पहले प्रसाद लें — मोदक या तिल-गुड़ का टुकड़ा — फिर भोजन करें। बहुत-से घरों में पहला कौर सादा और मीठा होता है।

समय कैसे देखें

असल में एक ही समय मायने रखता है: व्रत वाली शाम का चंद्रोदय। आपके शहर के लिए यह शहरवार चंद्रोदय पर मिलेगा, और संकष्टी पृष्ठ पर हर तिथि के साथ भी दिया है। कृष्ण चतुर्थी का चाँद अँधेरा होने के काफ़ी देर बाद निकलता है, इसलिए सुबह ही समय जान लें और बच्चों व बुज़ुर्गों का खाना अलग से तय कर लें। जो परिवार शाम की पूजा अच्छे समय में शुरू करना चाहते हैं, वे चौघड़िया देख सकते हैं।

परिवारों के रीति-रिवाज

ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; हर घर की अपनी रीत पहले है।

  • इक्कीस दूब और इक्कीस मोदक की गिनती बहुत पसंद की जाती है, पर प्रेम से चढ़ाई कोई भी गिनती उतनी ही अच्छी है।
  • ज़्यादातर घरों में गणेश जी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती; इसके पीछे एक कथा है जिसमें उन्होंने तुलसी से विवाह का प्रस्ताव ठुकरा दिया था।
  • मंगलवार वाली अंगारकी संकष्टी बहुत-से लोग बाक़ी से ज़्यादा नियम से रखते हैं, और कुछ लोग हर महीने का व्रत किसी अंगारकी से ही शुरू करते हैं।
  • कुछ लोग साल भर की संकष्टियाँ एक संकल्प के रूप में रखते हैं और आख़िरी पर विशेष पूजा करके उसे पूरा करते हैं।
  • बच्चे और बड़े-बूढ़े प्रायः पहले खा लेते हैं; जो अस्वस्थ है, उसे चाँद के लिए रुकने की कोई ज़रूरत नहीं।

इलाक़ों के अपने ढंग

  • महाराष्ट्र: संकष्टी घर का व्रत भी है और मंदिर का उत्सव भी; अष्टविनायक मंदिरों और मुंबई के सिद्धिविनायक में, ख़ासकर अंगारकी पर, लंबी कतारें लगती हैं।
  • कर्नाटक और तमिलनाडु: इसे अक्सर संकटहर चतुर्थी कहते हैं, और शाम को गणेश मंदिरों में अभिषेक होता है।
  • उत्तर भारत: माघ की संकष्टी सकट चौथ है, जिसे माताएँ तिल-गुड़ और शकरकंद के साथ रखती हैं; और कार्तिक की संकष्टी करवा चौथ वाले दिन ही पड़ती है।
  • गुजरात: अमांत गणना के कारण वहाँ यही संकष्टी पिछले महीने के नाम से जानी जा सकती है।

पूजा के बाद

मोदक या तिल-गुड़ प्रसाद के रूप में बाँटें। गणेश जी का बड़ा वार्षिक उत्सव भादों की गणेश चतुर्थी है, और कार्तिक में उत्तर भारत की महिलाएँ चाँद देखकर जो व्रत खोलती हैं, वह करवा चौथ है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संकष्टी के व्रत में क्या खा सकते हैं?

हर घर का अपना नियम है। बहुत-से लोग दिन में फल, दूध, साबूदाना, मूँगफली या शकरकंद लेकर फलाहार करते हैं और पूरा भोजन चाँद निकलने के बाद; कुछ केवल पानी लेते हैं। गर्भवती, बीमार और बुज़ुर्ग हल्का व्रत रखें; डॉक्टर की सलाह पहले।

बादल हों और चाँद न दिखे तो क्या करें?

ज़्यादातर परिवार अपने शहर का चंद्रोदय का समय निकल जाने तक रुकते हैं, फिर उस दिशा की ओर मुँह करके अर्घ्य देते हैं जहाँ चाँद होना चाहिए, और व्रत खोल लेते हैं। परंपरा में इसे अधूरा व्रत नहीं माना जाता।

गणेश जी को दूब क्यों चढ़ाते हैं?

दूब गणेश जी को बहुत प्रिय मानी जाती है। एक लोकप्रिय कथा के अनुसार अनलासुर नाम के आग जैसे दैत्य को निगलने के बाद दूब से ही उनके पेट की जलन शांत हुई थी। दूब छोटी-छोटी गड्डियों में चढ़ाई जाती है, अक्सर इक्कीस की गिनती में।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और उत्तर भारत के घरों की रीति
  • संकष्टी व्रत पुस्तिकाएँ, शाम की पूजा के क्रम के लिए

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति