करवा चौथ की जो कथा सबसे ज़्यादा घरों में सुनाई जाती है, वह वीरावती की है — एक नई-नवेली बहू, जिसके सात भाई उसे भूखा-प्यासा न देख सके और उन्होंने उसे नकली चाँद दिखाकर व्रत खुलवा दिया। बहुत-से परिवार इसके साथ करवा की कथा भी कहते हैं, जिसके साहस से उसके पति के प्राण बचे। दोनों कथाएँ शाम की पूजा में, चाँद निकलने से पहले सुनी जाती हैं।
व्रत का दिन, आपके शहर में चंद्रोदय का समय और तिथि तय होने का नियम करवा चौथ की तिथि वाले पृष्ठ पर है, और शहरवार चाँद निकलने का समय चंद्रोदय पृष्ठ पर। यह पृष्ठ केवल कथा का है, हमारे अपने शब्दों में।
वीरावती की कथा
एक समृद्ध नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे थे और एक बेटी, वीरावती। वह सबसे छोटी थी और सातों भाई उस पर जान छिड़कते थे। बड़ी होने पर उसका विवाह एक अच्छे घर में हुआ, और विवाह के बाद की पहली करवा चौथ उसने मायके में ही रखी।
उस दिन वह भोर से पहले उठी, थोड़ा-सा खाया और घर की बाकी स्त्रियों के साथ व्रत शुरू किया — न अन्न, न जल। दोपहर तक कार्तिक की धूप ने उसे थका दिया, और शाम होते-होते वह इतनी निढाल हो गई कि ठीक से बैठ भी नहीं पा रही थी। भाई काम से लौटे तो देखा कि बहन चुपचाप लेटी चाँद की राह देख रही है।
भाइयों से यह देखा न गया। उन्होंने उससे कुछ खा लेने को कहा, पर वीरावती बोली कि जब तक चाँद को देखकर अर्घ्य न दे दूँ, तब तक कुछ नहीं खाऊँगी। तब सबसे छोटे भाई को एक उपाय सूझा। वह नगर के किनारे एक ऊँचे पीपल पर दीया लेकर चढ़ गया और उसे छलनी की ओट में रख दिया, ताकि जाली से छनकर आती रोशनी पत्तों के पीछे उगते चाँद जैसी लगे। बाकी भाइयों ने बहन को पुकारा — चाँद निकल आया, आकर देख लो।
भाभियाँ जानती थीं कि भाइयों ने क्या किया है, और उन्होंने धीरे से वीरावती को सावधान भी किया, पर वह थकी हुई थी और भाइयों पर उसे पूरा भरोसा था। वह छत पर गई, पेड़ में टिमटिमाती रोशनी देखी, उसे जल चढ़ाया और भोजन करने बैठ गई।
पहले कौर में बाल निकला। दूसरे कौर पर छींक आई। तीसरा कौर उठाया ही था कि ससुराल से संदेशवाहक आया — उसका पति बहुत बीमार है। कई घरों की कथा में यह समाचार और भी कठोर है, कि पति के प्राण चले गए।
वीरावती उसी समय पति के पास चल पड़ी। रास्ते में, या कुछ कथाओं के अनुसार ससुराल में ही, उसे इंद्राणी मिलीं (किसी-किसी कथा में स्वयं माता पार्वती), जो त्योहार के दिन धरती पर आई थीं। वीरावती उनके चरणों में गिर पड़ी और पूछा कि उससे क्या भूल हुई। इंद्राणी ने स्नेह से बताया कि जिसे उसने चाँद समझकर पूजा, वह पेड़ पर रखा दीया था, और असली चाँद निकलने से पहले ही व्रत टूट गया था।
वीरावती ने न बहस की, न भाइयों को दोष दिया। वह पूरे साल पति के पास बैठी रही, उनकी सेवा करती रही, और हर महीने कृष्ण पक्ष की चौथ का व्रत रखती रही। अगली करवा चौथ आई तो उसने पूरे मन से व्रत किया, असली चाँद की प्रतीक्षा की और उसे अर्घ्य दिया। कथा कहती है कि उसके पति ने आँखें खोलीं और फिर से स्वस्थ हो गए।
कथा को शांत मन से समझें
यह एक लोककथा है, और बहुत-सी लोककथाओं की तरह यह भी अचानक आई विपदा से अपनी बात कहती है। इसका अर्थ यह नहीं कि पति का स्वास्थ्य इस पर टिका है कि पत्नी ने क्या खाया-पिया; लंबे, थका देने वाले दिन में पानी पी लेने से किसी पर कोई आँच नहीं आती। आज कथा सुनाने वाली बड़ी-बूढ़ी भी अक्सर यही कहती हैं कि कथा असल में भाइयों के प्रेम की है — जो सच्चा था, भले ही राह भटक गया — और वीरावती के धीरज की, जिसने एक भूल को साल भर की सेवा में बदल दिया। गर्भवती, बीमार या बुज़ुर्ग महिलाएँ हल्का व्रत रखती आई हैं, और परंपरा ने इसकी छूट हमेशा दी है।
करवा की कथा
एक और कथा इस पर्व के नाम से जुड़ी है। करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी किनारे रहती थी। एक दिन पति नदी में नहाने गए तो एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया और उन्हें गहरे पानी की ओर खींचने लगा। उन्होंने करवा को पुकारा।
करवा दौड़कर किनारे पहुँची और हाथ में और कुछ न होने पर कच्चे सूत के धागे से ही मगरमच्छ को बाँध दिया, धागा लपेटते हुए वह भगवान का स्मरण करती रही। धागा टिका रहा। फिर वह यमराज के पास गई और कहा कि मेरे पति के बदले इस मगरमच्छ को ले जाइए। यमराज हिचकिचाए, क्योंकि मगरमच्छ की आयु अभी शेष थी। पर करवा अडिग रही, और उसका संकल्प इतना दृढ़ था कि यमराज को मानना पड़ा — मगरमच्छ यमलोक गया और करवा के पति को जीवनदान मिला।
कई घरों में इसी कथा से समझाया जाता है कि पूजा के बीच में टोंटी वाला मिट्टी का करवा क्यों रखा जाता है, और इस दिन करवा माता का स्मरण क्यों होता है।
कथा के और रूप
- शिव-पार्वती का प्रसंग। एक रूप में द्रौपदी, अर्जुन के नीलगिरि पर्वत पर तपस्या के लिए चले जाने पर, श्रीकृष्ण से पांडवों की रक्षा का उपाय पूछती हैं, और श्रीकृष्ण बताते हैं कि यही प्रश्न कभी पार्वती जी ने शिव जी से पूछा था, जिस पर शिव जी ने यह व्रत और वीरावती की कथा सुनाई। महाभारत में यह प्रसंग नहीं मिलता; यह व्रत कथा पुस्तकों में जोड़ी गई भूमिका है।
- चौथ माता। राजस्थान में यह दिन चौथ माता का है, जो देवी का ही एक रूप हैं, और कथा प्रायः उन्हीं के नाम से कही जाती है।
- पहले गणेश जी। बहुत-से परिवार गणेश जी की एक छोटी कथा से शुरुआत करते हैं, क्योंकि चतुर्थी गणेश जी की तिथि है और हर पूजा में पहले उन्हीं का पूजन होता है।
कथा कैसे सुनी जाती है
शाम को घर या गली की महिलाएँ अपनी-अपनी थाली और करवा लेकर घेरे में बैठती हैं। कथा शुरू होने से पहले सब हाथ में गेहूँ या चावल के कुछ दाने ले लेती हैं। घर की कोई बड़ी, अक्सर सास, कथा कहती हैं और बाकी महिलाएँ जानी-पहचानी पंक्तियों पर हुंकारा भरती हैं। पंजाब में इसके बाद थालियाँ सात बार घेरे में घुमाई जाती हैं और फेरी का गीत गाया जाता है; उत्तर प्रदेश में मिट्टी की गौरी बनाकर पूजी जाती हैं और करवे आपस में बदले जाते हैं। कथा के दाने अलग रख लिए जाते हैं और चाँद निकलने पर अर्घ्य के जल के साथ चढ़ाए जाते हैं।
पूजा का पूरा क्रम, सामग्री की सूची, और बादल हों तो क्या करें — यह सब करवा चौथ पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आज यह कथा क्या कहती है
बहुत-सी महिलाओं के लिए यह कथा उस दिन का हिस्सा है जो सहेलियों और परिवार की स्त्रियों के साथ बीतता है — सजी-धजी, मेहंदी रचे हाथ, सबकी आँखें आसमान पर। किसी के लिए यह लंबे साथ की एक शांत प्रार्थना है। अब बहुत-से पति भी पत्नी के साथ व्रत रखते हैं, और कथा दोनों मिलकर सुनते हैं। व्रत अपना चुनाव है; जो महिला यह व्रत नहीं रख पाती, उसका प्रेम किसी से कम नहीं।
उत्तर भारत में इसके चार दिन बाद माताएँ अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं, और हर महीने की चौथ का व्रत संकष्टी चतुर्थी कहलाता है। दिन की योजना बनानी हो तो शाम की पूजा के लिए अपने शहर का चौघड़िया और व्रत खोलने के लिए चंद्रोदय का समय देख लें।