संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा गणेश जी की कथा है, और सबसे ज़्यादा वह सुनाई जाती है जिसमें वे दुनिया का चक्कर लगाने के बजाय माता-पिता की परिक्रमा करके सब देवताओं से पहले पूजे जाने के अधिकारी बने। बहुत-से घरों में इसके बाद एक छोटी लोककथा कही जाती है; यहाँ हम उस ग़रीब, अंधी बुढ़िया की कथा दे रहे हैं जिसने बड़ी चतुराई से एक ही वरदान में अपनी हर ज़रूरत माँग ली।
संकष्टी हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आती है। इसकी तिथियाँ, उस महीने का गणेश-रूप और व्रत खोलने के लिए चंद्रोदय संकष्टी चतुर्थी की तिथियों वाले पृष्ठ पर हैं, और आपके शहर में चाँद ठीक कब निकलेगा, यह चंद्रोदय पृष्ठ पर।
गणेश जी प्रथम पूज्य कैसे बने
एक बार कैलास पर सब देवता इकट्ठे हुए। उनके मन में एक सवाल अटका था: पूजा शुरू हो तो सबसे पहले किसका नाम लिया जाए? हर कोई यह मान चाहता था। तब शिव जी ने एक होड़ रखी — जो पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाकर सबसे पहले लौटेगा, वही सबसे पहले पूजा जाएगा।
बड़े बेटे कार्तिकेय तो पिता की बात पूरी होने से पहले ही अपने मोर पर सवार थे। मोर तेज़ उड़ता है; वे समुद्र, पहाड़ और देश-देशांतर पार करते चले गए, मन में पक्का भरोसा लिए कि जीत उन्हीं की है। दूसरे देवता भी अपने-अपने वाहन पर निकल पड़े।
गणेश जी ने अपने वाहन को देखा — एक नन्हा-सा मूषक — और फिर अपने गोल-मटोल पेट को, और बैठकर सोचने लगे। फिर उठे, माता-पिता को प्रणाम किया और उनसे कहा कि आप दोनों साथ बैठ जाइए। फिर उन्होंने धीरे-धीरे उनकी परिक्रमा की — कुछ कथाओं में सात बार — और फिर सिर झुकाया।
कार्तिकेय थके-माँदे पर ख़ुश लौटे, तो देखा कि छोटा भाई पहले से माता-पिता के चरणों में बैठा है। शिव जी ने गणेश से पूछा, तुम गए क्यों नहीं? गणेश जी बोले, शास्त्र कहते हैं कि जो संतान श्रद्धा से माता-पिता की परिक्रमा कर ले, उसने पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कर ली, क्योंकि उसके लिए वही सारा संसार हैं। शिव-पार्वती गद्गद हो गए। गणेश जी प्रथम पूज्य और गणों के अधिपति घोषित हुए, और तब से हर घर की हर पूजा उन्हीं के नाम से शुरू होती है।
कुछ कथाओं में कार्तिकेय को यह बात चुभ गई और वे दक्षिण जाकर अकेले रहने लगे; इसीलिए तमिल देश में वे इतने प्यारे हैं। कथा किसी चालाकी की नहीं, उस समझ की है जो पास की चीज़ का मोल पहचान ले।
चंद्रमा की हँसी
संकष्टी में चाँद की ख़ास जगह है, और उसके पीछे भी एक कथा है। अपने जन्मदिन पर भक्तों के चढ़ाए ढेर सारे मोदक खाकर गणेश जी रात में मूषक पर बैठे घर लौट रहे थे। रास्ते में साँप देखकर मूषक बिदका, गणेश जी गिर पड़े और उनके पेट से मोदक बिखर गए। ऊपर से चंद्रमा यह देख रहा था, और ठहाका मारकर हँस पड़ा।
चोट और झेंप से भरे गणेश जी ने श्राप दे दिया: आज के दिन कोई तुम्हें न देखे, और जो देखे उस पर झूठा कलंक लगे। अपनी सुंदरता पर इतराने वाला चंद्रमा अचानक सबकी नज़र से गिर गया। वह पछताता हुआ गणेश जी के पास आया और क्षमा माँगी। गणेश जी का मन पसीज गया। उन्होंने श्राप को हल्का कर दिया: यह केवल भादों की शुक्ल चतुर्थी, उनके अपने उत्सव के दिन रहेगा; बाक़ी चतुर्थियों पर लोग चाव से चाँद की राह देखेंगे और उसे अर्घ्य देंगे। अपने एक रूप में तो वे माथे पर चंद्रमा धारण करते हैं और भालचंद्र कहलाते हैं।
इसीलिए गणेश चतुर्थी पर चाँद से नज़र बचाई जाती है, और संकष्टी पर उसी की प्रतीक्षा होती है, क्योंकि व्रत चाँद निकलने पर ही खुलता है।
बुढ़िया का एक वरदान
यह लोककथा संकष्टी पर बहुत घरों में कही जाती है। एक ग़रीब, अंधी बुढ़िया अपने बेटे और बहू के साथ रहती थी। हर महीने वह चौथ का व्रत रखती, और घर में जो थोड़ा-बहुत होता, उसमें से दो-चार दाने गणेश जी को चढ़ा देती।
उसकी लगन से गणेश जी प्रसन्न हुए और एक दिन प्रकट होकर बोले, माई, एक चीज़ माँग लो। बुढ़िया उलझन में पड़ गई — ज़रूरतें तो इतनी थीं! उसने कहा, बेटे-बहू से पूछकर बताती हूँ। बेटे ने कहा, धन माँग लो। बहू ने कहा, पोता माँग लो। और बुढ़िया का अपना मन चाहता था कि आँखों की रोशनी लौट आए।
वह गणेश जी के पास लौटी और सँभल-सँभलकर बोली, "मैं अपने पोते को सोने के कटोरे में खाते हुए देखूँ।" गणेश जी हँस पड़े। एक ही वाक्य में उसने आँखें भी माँग लीं, पोता भी और घर की बरकत भी। उन्होंने तीनों दे दिए। कहने वाली मुस्कराकर जोड़ती हैं कि गणेश जी ठगे नहीं गए; वे तो उस भक्त पर रीझ गए जिसने एक साथ सबका ध्यान रखा।
कथा के दूसरे रूप
- तेरह रूप। हर महीने की संकष्टी पर गणेश जी के एक अलग रूप की पूजा होती है — भालचंद्र से द्विजप्रिय तक, और अधिक मास में विभुवन पालक — और व्रत की पुस्तकों में हर रूप की अलग छोटी कथा है। पूरी सूची संकष्टी पृष्ठ पर है।
- अंगारकी। चतुर्थी मंगलवार को पड़े तो अंगारकी संकष्टी कहलाती है। महाराष्ट्र में कही जाने वाली कथा में पृथ्वी के पुत्र अंगारक, यानी मंगल ग्रह, ने लंबे समय तक गणेश जी की तपस्या की, और गणेश जी ने वर दिया कि उनके दिन की चतुर्थी उन्हीं के नाम से जानी जाएगी।
- सकट चौथ। माघ में उत्तर भारत की माताएँ यह दिन सकट चौथ के रूप में रखती हैं और अक्सर दूसरी लोककथा कहती हैं: कुम्हार का आवाँ जो पक नहीं रहा था, और उसमें बिठाया गया एक बुढ़िया का इकलौता बेटा, जो अगली सुबह बर्तनों के बीच सही-सलामत खेलता मिला, क्योंकि माँ ने व्रत रखा था।
कथा को शांत मन से समझें
सकट की कथा, गाँव की बहुत-सी कहानियों की तरह, बच्चे को संकट में डालती है ताकि रक्षा दिखाई जा सके। यह आस्था और माँ के धीरज की कहानी है, किसी घटना का वर्णन नहीं, और बच्चा अंत में सकुशल है। चंद्रमा का श्राप भी ज़्यादातर घरों में हल्के-फुल्के ढंग से कहा जाता है; झूठे कलंक की बात कृष्ण की एक अलग कथा का विषय है, उन लोगों के लिए चेतावनी नहीं जिनकी नज़र अनजाने आसमान पर पड़ जाए।
कथा कैसे सुनी जाती है
संकष्टी प्रायः मंडली का नहीं, घर-परिवार का व्रत है। शाम को दूब और मोदक से गणेश पूजा के बाद घर का कोई सदस्य कथा पढ़ता या कहता है और बाक़ी हाथ जोड़कर सुनते हैं। फिर सब चाँद का इंतज़ार करते हैं। पूजा का पूरा क्रम संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आज यह कथा क्या कहती है
गणेश जी की कथाएँ भारतीय घर में बच्चे की सुनी पहली कहानियों में होती हैं, और संकष्टी उन्हें हर महीने ताज़ा रखती है। ये कथाएँ मज़ेदार हैं, स्नेह भरी हैं, थोड़ी नटखट भी, और इनकी सीख सीधी है: पास वाले का मोल समझो, माँगने से पहले सोचो, और माफ़ करना सीखो। कार्तिक की संकष्टी करवा चौथ के दिन ही पड़ती है, और उत्तर भारत के बहुत-से घरों में उस शाम दोनों कथाएँ कही जाती हैं। पूजा का समय तय करना हो तो कुछ परिवार चौघड़िया भी देख लेते हैं।