सत्यनारायण व्रत कथा वह कथा है जो हर सत्यनारायण पूजा में पढ़ी जाती है — पाँच छोटे अध्याय, उन लोगों के बारे में जिन्होंने सत्य के रूप में भगवान विष्णु का एक सीधा-सादा व्रत रखा। कथा नारद जी के प्रश्न से शुरू होकर एक गरीब ब्राह्मण, एक लकड़हारे, एक बनिये और उसकी बेटी से होती हुई उस घमंडी राजा तक पहुँचती है जिसने आखिर में ग्वालों का प्रसाद आदर से लिया।
बहुत-से घरों में यह पूजा पूर्णिमा को होती है; साल भर की पूर्णिमा की तिथियाँ पूर्णिमा व्रत पृष्ठ पर हैं, और पूजा का पूरा क्रम सत्यनारायण पूजा विधि पृष्ठ पर। यहाँ केवल कथा है, हमारे अपने शब्दों में।
पहला अध्याय: नारद जी का प्रश्न
एक बार नैमिषारण्य के वन में ऋषि-मुनि सूत जी के पास इकट्ठे हुए और उनसे सीधी-सी बात पूछी — इस युग में लोग व्यस्त हैं, चिंता में डूबे हैं, उनके पास समय कम है; क्या कोई ऐसी पूजा है जो सरल भी हो और मन को शांति भी दे? सूत जी ने उत्तर में वह बात सुनाई जो कभी नारद जी ने भगवान विष्णु से पूछी थी।
नारद जी घूमते-घूमते मृत्युलोक में आए तो देखा कि लोग गरीबी, रोग, कलह और डर से कितने दुखी हैं। उनका मन भर आया। वे वैकुंठ गए और भगवान से पूछा कि क्या कोई ऐसा सहज मार्ग है जिससे साधारण लोगों का दुख कम हो। भगवान ने उन्हें सत्यनारायण व्रत के बारे में बताया — सत्य के रूप में नारायण की पूजा। इसके लिए न बहुत धन चाहिए, न कोई खास दिन। शाम को घर-परिवार और मित्रों के साथ, थोड़े-से आटे, घी, शक्कर, केले और दूध से भोग बनाकर, कथा सुनकर और सबको प्रसाद बाँटकर यह व्रत पूरा हो जाता है।
दूसरा अध्याय: गरीब ब्राह्मण और लकड़हारा
काशी नगरी में एक बहुत गरीब ब्राह्मण रहता था, जिसका नाम पुस्तकों में प्रायः शतानंद मिलता है। वह दिन भर घर-घर भिक्षा माँगता, फिर भी अक्सर भूखा सोता। उसका धीरज देखकर भगवान स्वयं एक बूढ़े ब्राह्मण का वेश धरकर उसके पास आए और पूछा कि तुम इतने थके-हारे क्यों हो। शतानंद ने अपना हाल सुनाया तो बूढ़े ब्राह्मण ने उसे सत्यनारायण व्रत की विधि बताई और अंतर्धान हो गए।
उस रात शतानंद को नींद नहीं आई। सुबह वह यह ठानकर निकला कि आज भिक्षा में जो मिलेगा, उसी से पूजा करूँगा। उस दिन उसे रोज़ से कहीं ज़्यादा मिला। शाम को उसने परिवार के साथ पूजा की, और उसके बाद उसके घर में कभी अभाव नहीं रहा। वह जीवन भर यह व्रत करता रहा।
एक दिन जब वह पूजा कर रहा था, तब एक लकड़हारा उधर से गुज़रा। प्यासा था, तो लकड़ी का गट्ठर उतारकर दरवाज़े पर खड़ा हो गया और पूछा कि यह क्या हो रहा है। ब्राह्मण ने बताया तो लकड़हारे ने मन में ठाना कि आज लकड़ी बेचकर जो मिलेगा, उससे मैं भी पूजा करूँगा। उस दिन लकड़ी के दाम दुगने मिले। उसने पूजा की सामग्री जुटाई, पड़ोसियों को बुलाया और कथा करवाई। धीरे-धीरे उसके जीवन में भी सुख आया।
तीसरा अध्याय: राजा उल्कामुख और बनिये का वचन
पुराने समय में उल्कामुख नाम के एक समझदार राजा थे, जो अपनी रानी के साथ नदी के किनारे सत्यनारायण व्रत करते थे। उधर से साधु नाम का एक बनिया नाव में माल लादे जा रहा था। पूजा देखकर उसने नाव रोकी और इसके बारे में पूछा। राजा ने बताया कि उन्होंने संतान की कामना से यह व्रत किया था और उनकी इच्छा पूरी हुई।
साधु बनिये के कोई संतान नहीं थी। उसने वहीं किनारे पर वचन दिया कि मुझे संतान हुई तो मैं सत्यनारायण की पूजा करूँगा। समय आने पर उसकी पत्नी लीलावती ने एक बेटी को जन्म दिया, जिसका नाम कलावती रखा गया। लीलावती ने पति को वचन याद दिलाया तो उसने कहा — बेटी के ब्याह पर कर लेंगे।
कलावती बड़ी हुई और साधु ने एक भले बनिये के बेटे से उसका ब्याह कर दिया। ब्याह की भागदौड़ में वचन फिर भूल गया। कुछ समय बाद साधु दामाद को साथ लेकर व्यापार के लिए दूर देश गया, जिसे कई पुस्तकें रत्नपुर कहती हैं, जहाँ राजा चंद्रकेतु का राज था।
वहाँ कुछ चोरों ने राजा का खज़ाना लूटा। सिपाही पीछा कर रहे थे, तो चोर चुराया माल वहीं फेंककर भाग गए जहाँ ससुर-दामाद ठहरे थे। सिपाहियों ने माल उनके पास पाया और दोनों को राजा के सामने ले गए। राजा ने उनकी बात सुने बिना उन्हें कारागार में डाल दिया और उनका सारा माल ज़ब्त कर लिया।
चौथा अध्याय: कलावती और प्रसाद
उधर घर पर लीलावती और कलावती के दिन कठिनाई में बीतने लगे। जमा-पूँजी खत्म हो गई और परदेस से कोई खबर न आई। एक शाम भूखी कलावती एक घर में जा पहुँची जहाँ सत्यनारायण की कथा हो रही थी। वह कथा में बैठी रही, प्रसाद लिया और देर से घर लौटी। माँ ने पूछा कहाँ थी, तो उसने सब बताया। सुनते ही लीलावती को पति का वचन याद आ गया। माँ-बेटी ने मिलकर पूजा की और परदेस गए दोनों के सकुशल लौटने की प्रार्थना की।
उसी रात राजा चंद्रकेतु को सपने में पता चला कि दोनों बनिये निर्दोष हैं। सुबह उन्होंने दोनों को छोड़ दिया, उनका माल लौटाया, ऊपर से भेंट दी और आदर के साथ विदा किया।
लौटते समय रास्ते में एक दंडी संन्यासी ने नाव रुकवाकर पूछा कि इसमें क्या है। साधु को लगा कि ये कुछ माँगेंगे, तो उसने कह दिया — इसमें तो बस लता-पत्ते हैं। संन्यासी बोले — ऐसा ही हो। साधु ने देखा तो सारा माल सचमुच पत्तों में बदल गया था। अपनी भूल समझकर वह संन्यासी के पीछे गया और क्षमा माँगी। संन्यासी ने याद दिलाया कि तुम दो बार अपना वचन टाल चुके हो, और नाव का माल फिर पहले जैसा हो गया।
नाव घर के पास पहुँची तो खबर कलावती तक आई, जो उस समय सत्यनारायण की कथा में बैठी थी। पति को देखने की उतावली में वह प्रसाद लिए बिना ही नदी की ओर दौड़ पड़ी, और दामाद समेत नाव पानी में समा गई। कलावती बिलख उठी। तभी आकाशवाणी हुई कि लौटकर जो प्रसाद छोड़ आई हो, उसे ग्रहण करो। उसने वैसा ही किया, और नाव पति समेत सकुशल ऊपर आ गई। फिर साधु ने पूरे परिवार के साथ पूजा की और उसके बाद हर पूर्णिमा को करता रहा।
कथा को शांत मन से समझें
ये अध्याय पुरानी व्रत कथाओं के ढंग से कहे गए हैं, जिनमें भूला हुआ वचन और उसके बाद आई मुश्किलें साथ-साथ चलती हैं। इनका अर्थ यह नहीं कि पूजा छूट जाए तो कोई आँच आती है। साधु की असली चूक यह थी कि वह मन से किया वादा बार-बार टालता रहा, और फिर माल के बारे में झूठ बोला; कलावती की चूक बस एक नई बहू की उतावली थी। दोनों बार कथा क्षमा और सुधार पर खत्म होती है, दंड पर नहीं। घरों में बड़े-बुज़ुर्ग इससे यही सीख निकालते हैं।
पाँचवाँ अध्याय: राजा तुंगध्वज और ग्वाले
राजा तुंगध्वज एक दिन शिकार खेलने वन में गए। वहाँ एक पेड़ के नीचे कुछ ग्वाले सत्यनारायण की पूजा कर रहे थे। उन्होंने राजा को प्रसाद दिया, पर राजा ने घमंड में न प्रसाद लिया, न सिर झुकाया। महल लौटने के बाद उनका सब कुछ बिगड़ने लगा; कथा कहती है कि धन गया और परिवार पर भी दुख आया। राजा को समझ आया कि बात कहाँ से शुरू हुई थी। वे उसी पेड़ के पास लौटे, ग्वालों के साथ ज़मीन पर बैठे, उनके साथ पूजा की और हाथ जोड़कर प्रसाद लिया। उनका सब कुछ लौट आया, और उसके बाद उन्होंने नम्रता से राज किया।
कथा के और रूप
- कुछ पुस्तकों के अंत में एक प्रसंग जुड़ा मिलता है कि कथा के पात्र अगले जन्म में कौन बने — शतानंद श्रीकृष्ण के सखा सुदामा, लकड़हारा रामायण का निषादराज गुह, और राजा उल्कामुख राजा दशरथ। यह बहुत-सी छपी पुस्तकों में है, सब में नहीं।
- बंगाल और ओडिशा में यह पूजा सत्यनारायण या सत्यपीर के नाम से भी होती है, और वहाँ संस्कृत के साथ पुरानी बांग्ला पद्य-कथाएँ भी चलती हैं; कहानी मोटे तौर पर वही है।
- पूरे पाँचों अध्याय पढ़ना आम है, पर समय कम हो तो कुछ परिवार सार सुनाकर पाँचवाँ अध्याय पूरा पढ़ते हैं।
कथा कैसे सुनी जाती है
गणेश जी, कलश और भगवान के पूजन के बाद घर के लोग और मेहमान मंडप के चारों ओर बैठ जाते हैं, और पंडित जी या घर के कोई बड़े कथा बाँचते हैं। हर अध्याय के अंत में शंख बजता है या घंटी। पाँचवाँ अध्याय पूरा होने पर ओम जय लक्ष्मी रमणा आरती गाई जाती है, और प्रसाद हर किसी को दिया जाता है — देर से आने वालों को भी।
आज यह कथा क्या कहती है
सत्यनारायण कथा ऐसी पूजा की कथा है जिसे कोई भी, घर पर, बिना धन-दौलत के कर सकता है। इसके पात्र हैं एक भिखारी ब्राह्मण, एक लकड़हारा, एक बनिया, एक नई बहू, कुछ ग्वाले और एक राजा — और सबके लिए सीख एक ही है: जो वादा करो, निभाओ; किसी के सादे भोग को छोटा न समझो; और जो है, उसे बाँटकर खाओ। गृहप्रवेश, जन्मदिन या कोई मनोकामना पूरी होने पर यह पूजा कराई जाती है, जो कथा की अपनी शुरुआत से मेल खाता है।
इसी भाव की दो और कथाएँ हैं — विष्णु जी का दूसरा बड़ा व्रत, एकादशी व्रत कथा, और घर में रखा जाने वाला संतोषी माता का व्रत। पूजा के लिए शाम चुनते समय बहुत-से परिवार चौघड़िया और उस दिन का पंचांग देख लेते हैं।