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पूजा विधि · सत्यनारायण पूजा

सत्यनारायण पूजा विधि: सामग्री और घर पर पूजा का क्रम

घर पर सत्यनारायण पूजा की विधि: सामग्री की सूची, कलश और केले का मंडप, पंचामृत, सवा का प्रसाद, पाँच अध्याय की कथा और आरती का क्रम।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यह घर पर पूजा करने का आम तरीका है। आपके परिवार की रीति सबसे पहले है: क्षेत्र के हिसाब से क्रम, सामग्री और शब्द बदलते हैं, और मन से की गई सादी पूजा भी पूरी है। इसके लिए किसी से कुछ खरीदने की ज़रूरत नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

सत्यनारायण पूजा सत्य के रूप में भगवान विष्णु की पूजा है, जो घर पर परिवार और मित्रों के साथ होती है; इसमें कथा के पाँच अध्याय पढ़े जाते हैं और अंत में मीठा प्रसाद सबको बाँटा जाता है। संक्षेप में: कलश और केले के पत्तों का छोटा मंडप सजाएँ, पहले गणेश जी, नवग्रह और कलश का पूजन करें, फिर पंचामृत, तुलसी और सवा के भोग से सत्यनारायण भगवान की पूजा करें, कथा सुनें, आरती गाएँ और सबको प्रसाद दें।

बहुत-से घर यह पूजा पूर्णिमा को रखते हैं; साल भर की पूर्णिमाएँ पूर्णिमा व्रत पृष्ठ पर देखें। पूजा में पढ़ी जाने वाली कथा सत्यनारायण व्रत कथा पृष्ठ पर है।

पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें

  • चौकी और उस पर बिछाने को पीला या लाल कपड़ा
  • मंडप के लिए चारों कोनों पर बाँधने को केले के खंभ या पत्ते, और आम के पत्ते
  • तांबे, पीतल या मिट्टी का कलश, जल भरा हुआ, ऊपर आम के पत्ते और नारियल
  • शालिग्राम, भगवान विष्णु की छोटी मूर्ति, या सत्यनारायण भगवान का चित्र
  • गणेश जी की छोटी मूर्ति या एक सुपारी; जिन घरों में नवग्रह पूजे जाते हैं, उनके लिए नौ सुपारियाँ या थोड़े अनाज
  • पंचामृत: दूध, दही, घी, शहद और शक्कर मिलाकर
  • तुलसी दल, जो विष्णु जी के हर भोग पर रखा जाता है
  • रोली, हल्दी, चंदन, अक्षत, जनेऊ, मौली, फूल और माला
  • घी का दीया, धूप-अगरबत्ती, आरती के लिए कपूर
  • सवा का भोग बनाने के लिए सूजी या गेहूँ का आटा, घी, चीनी, पके केले, थोड़ा दूध और मेवे
  • फल, पान-सुपारी, दक्षिणा के लिए कुछ सिक्के
  • कथा की पुस्तक, अगर पंडित जी या घर के बड़े ज़बानी न सुनाते हों

इनमें से कुछ भी महँगा होना ज़रूरी नहीं। कथा स्वयं कहती है कि जो पास हो उसी से पूजा हो सकती है; जिस घर में बस आटा, घी, चीनी और एक केला हो, उसके पास भोग के लिए पूरा सामान है।

पूजा का क्रम

  1. स्थान तैयार करें। कमरा साफ़ करें और चौकी पूर्व या उत्तर की ओर रखें। कपड़ा बिछाएँ, कोनों पर केले के खंभ या पत्ते बाँधकर मंडप बनाएँ, आम के पत्तों और फूलों से सजाएँ। सामने छोटा-सा स्वस्तिक या रंगोली बनाएँ।
  2. प्रसाद बनाएँ। सूजी या आटे को घी में खुशबू आने तक भूनें, फिर दूध या पानी, चीनी और मसला हुआ केला डालकर चलाते रहें जब तक सब एकसार न हो जाए। पंजीरी बनाने वाले घर आटा घी में सूखा भूनकर उसमें चीनी और मेवे मिलाते हैं। भोग ढककर रखें।
  3. कलश स्थापना। चौकी के दाईं ओर थोड़े चावल पर कलश रखें; उसमें जल, एक सिक्का, सुपारी और अक्षत डालें, मुँह पर आम के पत्ते लगाएँ और ऊपर लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखें।
  4. संकल्प। पूजा करने वाले, या पति-पत्नी साथ, पूर्व की ओर मुँह करके बैठें, दाएँ हाथ में जल, अक्षत और फूल लें, और अपने शब्दों में अपना नाम, स्थान और यह कहें कि हम परिवार के मंगल के लिए, या किसी मनोकामना के पूरी होने पर धन्यवाद में, सत्यनारायण पूजा कर रहे हैं।
  5. गणेश, कलश और नवग्रह। पहले गणेश जी को रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएँ, फिर कलश को देवताओं का आसन मानकर पूजें, और जिन घरों में रीति है, वहाँ नवग्रहों का भी।
  6. सत्यनारायण पूजन। शालिग्राम या मूर्ति को पहले जल से, फिर पंचामृत से, फिर दोबारा साफ़ जल से स्नान कराएँ। पोंछकर चौकी पर विराजें, चंदन, जनेऊ, फूल, तुलसी और माला चढ़ाएँ, दीया और धूप जलाएँ।
  7. भोग लगाएँ। सवा का भोग, पंचामृत, फल और पान पत्तल या थाली में भगवान के सामने रखें, हर चीज़ पर एक तुलसी दल।
  8. कथा। सब लोग मंडप के चारों ओर बैठें और पाँचों अध्याय पढ़े जाएँ। हर अध्याय के अंत में घंटी या शंख बजाया जा सकता है।
  9. आरती। कपूर और घी के दीये से ओम जय लक्ष्मी रमणा आरती गाएँ और आरती की लौ सबके पास ले जाएँ।
  10. सबको प्रसाद। थोड़ा पंचामृत भोग में मिलाकर हर उपस्थित व्यक्ति को प्रसाद दें — पड़ोसियों, घर में काम करने वालों और देर से आए लोगों को भी। जिन्होंने व्रत रखा था, वे इसी प्रसाद से व्रत खोलते हैं।

समय कैसे देखें

इस पूजा का कोई एक तय मुहूर्त नहीं है। जो परिवार पूर्णिमा को पूजा रखते हैं, वे प्रायः शाम को करते हैं जब पूर्णिमा तिथि चल रही हो; तिथि कब लगती और उतरती है, यह पंचांग में देखें। जो अच्छे समय में शुरुआत पसंद करते हैं, वे अपने शहर का चौघड़िया देखकर लाभ, अमृत या शुभ की घड़ी चुन लेते हैं। गृहप्रवेश या विवाह जैसे अवसर पर उस काम का मुहूर्त ही दिन तय करता है, और सत्यनारायण की कथा उसी दिन या अगले दिन होती है।

परिवारों के रीति-रिवाज

ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; आपके घर की अपनी रीति सबसे पहले है।

  • भोग की हर मुख्य चीज़ सवा के माप में ली जाती है — जो भी माप घर में चलता हो, उसका सवा गुना, जैसे सवा पाव या सवा कटोरी — इसीलिए इसे सवा का भोग कहते हैं।
  • बहुत-से घरों में उस दिन रसोई में प्याज़-लहसुन नहीं बनता।
  • पूजा में बैठने वाले प्रायः प्रसाद लेकर ही भोजन करते हैं।
  • प्रसाद कभी मना नहीं किया जाता, और एक कण भी दोनों हाथ जोड़कर लिया जाता है; यह रिवाज सीधे कथा से आया है।
  • कुछ परिवार हर पूर्णिमा को कथा कराते हैं, कुछ साल में एक बार या किसी खास मौके पर।
  • कुछ घरों में महिलाएँ बिना पंडित के मिलकर कथा पढ़ लेती हैं, और वह पूजा भी उतनी ही पूरी मानी जाती है।

प्रांतों के अपने ढंग

  • उत्तर प्रदेश और बिहार: केले के पत्तों का मंडप, पंचामृत, और सूजी या आटे का हलवा; पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब में पंजीरी आम है।
  • महाराष्ट्र: विवाह और गृहप्रवेश के बाद यह पूजा बहुत होती है, और प्रसाद का शीरा केले और केसर से बनता है।
  • बंगाल और ओडिशा: पूर्णिमा को प्रायः होती है, और प्रसाद को शिन्नी कहते हैं, जो आटा, दूध, केला और चीनी से बनती है; बंगाल के गाँवों में कुछ समुदाय इसे सत्यपीर के नाम से भी जानते थे।
  • दक्षिण भारत: आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में भी यह पूजा खूब होती है; वहाँ सूजी का केसरी जैसा प्रसाद बनता है और कथा अपनी भाषा में पढ़ी जाती है।

पूजा के बाद

प्रसाद दूर-दूर तक बाँटें और जो न आ सके उनके लिए थोड़ा रख लें। पूजा के फूल और पत्ते कूड़े में न डालकर किसी गमले में या बहते जल में विसर्जित करें। इसी भाव की और कथाएँ हैं — विष्णु जी की एकादशी व्रत कथा और संतोषी माता की कथा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सत्यनारायण पूजा कब करनी चाहिए?

बहुत-से परिवार यह पूजा पूर्णिमा की शाम को करते हैं। गृहप्रवेश, जन्मदिन, विवाह के बाद या कोई मनोकामना पूरी होने पर भी कथा कराई जाती है। कोई भी दिन चुना जा सकता है; लोग प्रायः शांत शाम और अच्छा चौघड़िया देख लेते हैं।

सत्यनारायण भगवान का प्रसाद कैसे बनता है?

सवा का भोग, जिसे शीरा या हलवा भी कहते हैं: घी में भुनी सूजी या आटा, चीनी और पका केला, मुख्य चीज़ें प्रायः बराबर मात्रा में। पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आटे की सूखी पंजीरी भी बनती है। साथ में पंचामृत और फल चढ़ते हैं।

क्या सत्यनारायण पूजा में व्रत रखना ज़रूरी है?

पूजा में बैठने वाले बहुत-से लोग कथा पूरी होने तक कुछ नहीं खाते या केवल फल लेते हैं, पर यह रीति है, शर्त नहीं। बच्चे, बुज़ुर्ग और बीमार लोग सामान्य भोजन करें; डॉक्टर की सलाह सबसे पहले।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, बंगाल और ओडिशा के घरों में होने वाली सत्यनारायण पूजा की रीति
  • स्कंद पुराण (रेवा खंड) पर आधारित व्रत पुस्तकें, पूजा के क्रम के लिए

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति