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पूजा विधि · प्रदोष व्रत

प्रदोष व्रत पूजा विधि: प्रदोष काल में शिव पूजन

प्रदोष व्रत की पूजा विधि घर पर: दिन भर का व्रत, सूर्यास्त से पहले दोबारा स्नान, प्रदोष काल में शिव अभिषेक, बेलपत्र, दीया, कथा और आरती।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यह घर पर पूजा करने का आम तरीका है। आपके परिवार की रीति सबसे पहले है: क्षेत्र के हिसाब से क्रम, सामग्री और शब्द बदलते हैं, और मन से की गई सादी पूजा भी पूरी है। इसके लिए किसी से कुछ खरीदने की ज़रूरत नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

प्रदोष व्रत त्रयोदशी के दिन का उपवास है, जो सूर्यास्त के ठीक बाद की गोधूलि, यानी प्रदोष काल में शिव पूजा से पूरा होता है। संक्षेप में: सुबह संकल्प लें, दिन भर व्रत रखें, सूरज ढलने से पहले फिर नहाएँ, सांझ को शिव जी का अभिषेक करें, बेलपत्र और दीया चढ़ाएँ, कथा सुनें, आरती गाएँ और फिर सादा भोजन करें।

हर प्रदोष, उसके वार का नाम और आपके शहर का प्रदोष काल प्रदोष व्रत की तिथियों वाले पृष्ठ पर है। गोधूलि की बेला यहाँ नहीं लिखी गई, क्योंकि वह साल भर और शहर-शहर में खिसकती रहती है; वहाँ हर तिथि के पन्ने पर वह अलग से दी गई है।

पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें

  • शिवलिंग, इतना छोटा कि थाली में आ जाए, या शिव-पार्वती का चित्र; पास के मंदिर का शिवलिंग भी उतना ही अच्छा है
  • साफ़ जल भरा लोटा, घर में हो तो थोड़ा गंगाजल
  • अभिषेक के लिए दूध; पंचामृत बनाना हो तो दही, शहद, घी और शक्कर भी
  • बेलपत्र, हो सके तो तीन पत्तियों वाले, धोकर पोंछे हुए
  • सफ़ेद फूल; बहुत-से घरों में धतूरा या आक के फूल भी
  • चंदन, अक्षत, और यदि घर में चलन हो तो थोड़ी भस्म
  • घी का दीया, धूप, और आरती के लिए कपूर
  • भोग के लिए फल और कोई सादी मिठाई
  • बैठने को आसन, और कथा की किताब या फ़ोन पर कथा

पूजा का क्रम

  1. सुबह। नहाकर पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें, दाएँ हाथ में थोड़ा जल लें और अपने शब्दों में संकल्प करें कि आप शिव जी के लिए प्रदोष का व्रत रख रहे हैं। कुछ घर वार का नाम भी जोड़ते हैं — सोम प्रदोष, शनि प्रदोष। जल धरती पर छोड़ दें।
  2. दिन भर। व्रत वैसे रखें जैसे घर में चलता आया है, केवल पानी या फल-दूध के साथ। दिन शांति से बिताएँ; प्रदोष एक धीमी, शांत साधना है।
  3. सूर्यास्त से पहले दूसरा स्नान। फिर से नहा लें, या हाथ-पैर-मुँह धोकर साफ़ कपड़े पहन लें। बहुत-से लोग सफ़ेद या हल्के रंग पहनते हैं।
  4. पूजा की जगह। पूजा का कोना साफ़ करें, शिवलिंग को थाली में रखें ताकि जल उसी में इकट्ठा हो, और सामग्री हाथ भर की दूरी पर रख लें। सूरज ढलते ही दीया जला दें।
  5. गणेश जी और नंदी। पहले एक फूल और थोड़े चावल से गणेश जी का स्मरण करें। बहुत-से घरों में शिव जी से पहले नंदी को, या उनके चित्र को, प्रणाम किया जाता है।
  6. प्रदोष काल में अभिषेक। शिवलिंग पर धीरे-धीरे जल चढ़ाएँ, फिर दूध, फिर हो तो पंचामृत, और अंत में फिर से जल। चढ़ाते समय धीमे स्वर में "ॐ नमः शिवाय" कहते रहें।
  7. श्रृंगार और अर्पण। शिवलिंग को पोंछकर चंदन लगाएँ, फिर अक्षत, सफ़ेद फूल और बेलपत्र चढ़ाएँ, चिकनी सतह नीचे की ओर। धतूरा या आक चढ़ाते हों तो वे भी, और भोग सामने रखें।
  8. कथा। प्रदोष व्रत कथा पढ़ें या सुनें — ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त की कथा — और घर में चलन हो तो उस वार की छोटी कथा भी।
  9. आरती। कपूर या घी के दीये से "ॐ जय शिव ओंकारा" या घर में जो आरती गाई जाती है, वह गाएँ, और हाथ जोड़कर आख़िरी प्रार्थना करें।
  10. पूजा के बाद। चलन हो तो अभिषेक का थोड़ा जल चरणामृत की तरह लें, प्रसाद बाँटें और सादा सात्विक भोजन करें। कुछ लोग अगली सुबह सूर्योदय तक व्रत रखते हैं।

समय कैसे देखें

जो बेला मायने रखती है, वह प्रदोष काल है: त्रयोदशी की शाम, सूर्यास्त से शुरू होने वाली गोधूलि। पंचांग का नियम यह है कि व्रत उस दिन होता है जिस दिन यह बेला त्रयोदशी में पड़े; इसीलिए कभी-कभी प्रदोष छपे कैलेंडर में दिखे दिन के अगले दिन निकलता है। हर तिथि की बेला प्रदोष पृष्ठ पर है, उस दिन की तिथि और सूर्यास्त पंचांग में, और जो परिवार पूजा अच्छे समय में शुरू करना चाहते हैं, वे चौघड़िया भी देख सकते हैं।

परिवारों के रीति-रिवाज

ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; हर घर की अपनी रीत पहले है।

  • ज़्यादातर घरों में शिवलिंग पर हल्दी, कुमकुम और तुलसी नहीं चढ़ाई जाती, हालाँकि पार्वती जी को चढ़ाई जाती है।
  • बेलपत्र प्रायः चिकनी सतह शिवलिंग की ओर और डंठल अपनी ओर रखकर चढ़ाया जाता है।
  • बहुत-से घरों में अभिषेक का जल लाँघा नहीं जाता, और आधी परिक्रमा जलधारी तक जाकर लौट आती है।
  • बहुत-से लोग प्रदोष रखना सोम या शनि प्रदोष से शुरू करते हैं, और संकल्प के रूप में तय संख्या तक रखते हैं।
  • भौम प्रदोष पर कुछ परिवार हनुमान जी को भी दीया दिखाते हैं, और शनि प्रदोष पर शनि देव को।

इलाक़ों के अपने ढंग

  • उत्तर भारत: प्रदोष ज़्यादातर घर का व्रत है; कथा घर में पढ़ी जाती है, और सांझ को पास के शिव मंदिर में दर्शन होते हैं।
  • तमिलनाडु और दक्षिण भारत का बड़ा हिस्सा: प्रदोषम मंदिरों की बड़ी शाम है। पहले नंदी का अभिषेक होता है, और भक्त सोमसूत्र प्रदक्षिणा करते हैं, जिसमें जलधारी को लाँघे बिना गर्भगृह के चारों ओर आगे-पीछे चला जाता है।
  • महाराष्ट्र और गुजरात: बहुत-से लोग व्रत घर पर रखते हैं, और सोम प्रदोष की सांझ शिव मंदिरों में भीड़ साफ़ बढ़ जाती है।
  • कुछ परिवारों में शाम का अंत शिवलिंग के पास एक दीया छोड़कर होता है, जो अपने आप बुझने तक जलता रहता है।

पूजा के बाद

दो हफ़्ते बाद प्रदोष फिर आता है, और बहुत-से लोग इसे जीवन भर की लय बना लेते हैं। साल में शिव जी की सबसे बड़ी रात महाशिवरात्रि है, और प्रदोष के साथ जो सोमवार का व्रत बहुत-से लोग रखते हैं, उसकी कथा सोलह सोमवार पृष्ठ पर है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रदोष की पूजा किस समय होती है?

प्रदोष काल में, यानी त्रयोदशी को सूर्यास्त के साथ शुरू होने वाली गोधूलि की बेला में। यह बेला मौसम और शहर के साथ बदलती है, इसलिए कोई तय घड़ी मानने के बजाय अपने शहर का समय प्रदोष की तिथियों वाले पृष्ठ से लें।

प्रदोष पर शिव जी को क्या चढ़ाया जाता है?

अभिषेक के लिए जल या दूध, फिर बेलपत्र, सफ़ेद फूल, अक्षत, चंदन और घी का दीया। बहुत-से घर पंचामृत, धतूरा या आक के फूल और फल या मिठाई का भोग भी रखते हैं। जल भरा लोटा और कुछ बेलपत्र भी अपने आप में पूरी पूजा हैं।

क्या प्रदोष व्रत में कुछ खा सकते हैं?

हर घर का अलग नियम है। कुछ लोग शाम की पूजा तक केवल पानी लेते हैं, बहुत-से फल और दूध पर रहते हैं, और कुछ पूजा के बाद एक बार सात्विक भोजन करते हैं। गर्भवती, बीमार और बुज़ुर्ग हल्का व्रत रखें; डॉक्टर की सलाह पहले।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • उत्तर भारत के घरों की रीति और दक्षिण भारत के मंदिरों की परंपरा
  • प्रदोष व्रत पुस्तिकाएँ, शाम की पूजा के क्रम के लिए

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति