सोलह सोमवार की व्रत कथा उस मंदिर-पुजारी की कहानी है जो सोलह सोमवार का व्रत रखकर रोग से छूटा, और जिससे यह व्रत पार्वती जी, उनके बेटे कार्तिकेय, फिर एक गरीब ब्राह्मण और एक राजकुमारी तक पहुँचा। यह कथा सोलहों सोमवार को पढ़ी जाती है, और सत्रहवें सोमवार को उद्यापन के दिन भी।
बहुत-से लोग यह व्रत सावन के पहले सोमवार से शुरू करते हैं; साल भर के सावन सोमवार सावन सोमवार की तिथि वाले पृष्ठ पर हैं। घर पर सोमवार की पूजा कैसे हो, यह सोलह सोमवार पूजा विधि पृष्ठ पर है। यहाँ केवल कथा है, हमारे अपने शब्दों में।
अमरावती में चौपड़ का खेल
एक बार शिव जी और पार्वती जी मृत्युलोक में घूमते हुए अमरावती नगरी पहुँचे। नगर बहुत सुंदर था, और वहाँ के राजा ने शिव जी का एक भव्य मंदिर बनवाया था। दोनों ने कुछ दिन वहीं ठहरने का निश्चय किया। समय बिताने के लिए पार्वती जी ने चौपड़ खेलने की इच्छा जताई, और दोनों मंदिर के भीतर बिसात बिछाकर बैठ गए।
तभी मंदिर का पुजारी पूजा करने आया। पार्वती जी ने उससे पूछा — पुजारी जी, बताइए, इस खेल में कौन जीतेगा? पुजारी रोज़ शिव जी की सेवा करता था और उसके मन में कोई और नाम आया ही नहीं; उसने झट से कह दिया कि शिव जी जीतेंगे।
खेल चलता रहा और जीत पार्वती जी की हुई। उन्हें अच्छा नहीं लगा कि पुजारी ने बिना सोचे, सच के बजाय आदत से उत्तर दिया था, और कथा कहती है कि उन्होंने पुजारी को कोढ़ी होने का शाप दे दिया। शिव-पार्वती नगर से चले गए, और पुजारी, जैसा कहा गया था, रोगी और दुर्बल हो गया।
कथा को शांत मन से समझें
इस कथा का शाप पुरानी कहन का हिस्सा है, जिसमें देवता कठोर वचन बोलते हैं और उनका असर तुरंत होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि कोई रोग दंड होता है; जो बीमार है, उसे यह कथा इस तरह नहीं पढ़नी चाहिए। कुष्ठ रोग तो पूरी तरह ठीक होने वाला रोग है और इसमें कोई लज्जा की बात नहीं। कथा भी पुजारी को वहीं नहीं छोड़ती — वह तुरंत इस पर आ जाती है कि अजनबियों ने उसे धीरज और आस्था सिखाकर कैसे सहारा दिया, और उसका ठीक होना ही कथा का असली मर्म है।
अप्सराएँ और सोलह सोमवार
कुछ समय बाद स्वर्ग से कुछ अप्सराएँ शिव जी की पूजा करने उसी मंदिर में आईं। उन्होंने पुजारी को अकेले, बीमार बैठे देखा और हाल पूछा। पुजारी ने सब बताया तो वे बोलीं — शिव जी का एक व्रत है जो तुम्हारे काम आएगा। सोलह सोमवार उपवास रखो। हर सोमवार नहाकर शिव-पार्वती की पूजा करो, जल, बेलपत्र और फूल चढ़ाओ, और गेहूँ के आटे, घी और गुड़ का प्रसाद बनाओ। उसके तीन भाग करो — एक भगवान के लिए, एक वहाँ मौजूद लोगों के लिए, और एक अपने लिए। सत्रहवें सोमवार को उद्यापन करो, बड़ा प्रसाद चढ़ाओ और सबमें बाँटो।
पुजारी ने पूरे मन से व्रत किया। सोमवार-दर-सोमवार उसकी ताकत लौटने लगी, और सोलहवाँ हफ़्ता पूरा होते-होते वह स्वस्थ हो गया।
पार्वती जी और कार्तिकेय
जब शिव-पार्वती दोबारा उधर से निकले, तो पार्वती जी पुजारी को स्वस्थ और प्रसन्न देखकर चकित रह गईं। उन्होंने पूछा कि तुम ठीक कैसे हुए, और पुजारी ने अप्सराओं और सोलह सोमवार की बात बताई।
उन दिनों पार्वती जी का मन उदास था, क्योंकि उनके बेटे कार्तिकेय माता-पिता से रूठकर घर छोड़ गए थे। पार्वती जी ने बेटे के लौटने की कामना से स्वयं यह व्रत किया। सोलह सोमवार पूरे हुए, और सत्रहवें दिन कार्तिकेय अपने आप घर लौट आए।
कार्तिकेय ने माँ से पूछा कि मेरा मन अचानक कैसे बदल गया। माँ ने व्रत की बात बताई, तो उन्हें अपने एक प्रिय ब्राह्मण मित्र की याद आई, जो दूर देश चला गया था और लौटा नहीं था। कार्तिकेय ने मित्र के लिए सोलह सोमवार किए, और जल्द ही मित्र लौट आया। मित्र ने भी पूछा कि मैं घर कैसे खिंचा चला आया, और कार्तिकेय ने उसे सब बताया।
मित्र और राजकुमारी
वह ब्राह्मण मित्र गरीब था और अविवाहित। उसने विवाह की कामना से स्वयं यह व्रत किया। सोलह सोमवार पूरे होने पर वह घूमता हुआ एक राज्य में पहुँचा, जहाँ राजा ने अनोखा स्वयंवर रखा था: सजी हुई हथिनी हाथ में माला लिए इकट्ठे हुए वरों के बीच चलेगी, और जिसके गले में माला डालेगी, राजकुमारी उसी से ब्याहेगी। ब्राह्मण तमाशा देखने पीछे खड़ा हो गया। हथिनी राजकुमारों और सामंतों के पास से निकलती गई और माला उसी के गले में डाल दी।
राजा ने अपना वचन निभाया। राजकुमारी का विवाह ब्राह्मण से हुआ और दोनों सुख से रहने लगे। एक दिन राजकुमारी ने पूछा कि इतने राजकुमारों के बीच एक गरीब परदेसी कैसे चुना गया। उसने सोलह सोमवार की बात बताई। राजकुमारी ने पुत्र की कामना से स्वयं यह व्रत किया, और समय आने पर उनके घर एक भला, समझदार बेटा हुआ।
कथा के और रूप
- बहुत-सी पुस्तकों में कथा राजकुमारी के बेटे तक चलती है, जो खुद यह व्रत करके राजा बनता है; कुछ में आगे उसकी रानी का प्रसंग है, जो पूजा का आदर नहीं करती, महल से निकाली जाती है, और स्वयं व्रत करने पर फिर आदर से लौटाई जाती है।
- कुछ कथाओं में शाप कुष्ठ का नहीं, किसी साधारण रोग का है, और कुछ में अप्सराएँ तब आती हैं जब पुजारी स्वयं शिव जी से सहायता माँग चुका होता है।
- प्रसाद के आटे और घी की मात्रा कुछ पुस्तकों में पुराने माप से दी गई है, कुछ में घर की रीति पर छोड़ी गई है।
कथा कैसे सुनी जाती है
हर सोमवार शिव-पार्वती की पूजा और अभिषेक के बाद कथा पढ़ी जाती है, और सुनने वाले हाथ में चावल के कुछ दाने या एक फूल लिए बैठते हैं। अंत में दाने चढ़ाए जाते हैं, ओम जय शिव ओंकारा आरती गाई जाती है, और प्रसाद कथा में बताए ढंग से बाँटा जाता है। सत्रहवें सोमवार को प्रायः पूरा परिवार इकट्ठा होकर कथा सुनता है।
आज यह कथा क्या कहती है
सोलह सोमवार की कथा ऐसे व्रत की कथा है जो हाथ-दर-हाथ आगे बढ़ता रहता है। जिसे भी इससे सहारा मिला, उसने किसी और को बताया — अप्सराओं ने पुजारी को, पुजारी ने पार्वती जी को, पार्वती जी ने बेटे को, कार्तिकेय ने मित्र को, मित्र ने पत्नी को। कुँवारी कन्याएँ अक्सर अच्छे वर की कामना से यह व्रत रखती हैं, पर कथा में इसे एक बीमार आदमी, एक चिंतित माँ और मित्र की याद में बैठा एक बेटा रखते हैं। इसकी सीख है धीरज, और जिस बात से आपको सहारा मिला, उसे दूसरों तक पहुँचाने की आदत।
इसी से जुड़ी दो कथाएँ हैं — सावन के मंगलवारों को पार्वती जी के लिए रखा जाने वाला मंगला गौरी व्रत, और महीने में दो बार शाम को शिव जी के लिए रखा जाने वाला प्रदोष व्रत। पूजा का समय चुनते हुए बहुत-से लोग चौघड़िया देखते हैं और सोमवार का राहु काल छोड़ देते हैं।