व्रत कथा वह कहानी है जो किसी व्रत या त्योहार की पूजा में सुनाई जाती है। वह बताती है कि यह दिन क्यों मनाया जाता है, सबसे पहले किसने यह व्रत रखा और उसका क्या फल मिला। ज़्यादातर घरों में कथा सुने बिना व्रत अधूरा-सा लगता है। इस खंड में प्रमुख व्रतों और त्योहारों की कथाएँ हमारे अपने शब्दों में, हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में दी गई हैं।
ये कथाएँ कैसे लिखी गई हैं
यहाँ हर कथा दोबारा कही गई है, कहीं से उतारी नहीं गई। कथाएँ पुराणों और लोक-परंपरा से आती हैं और हर परिवार उन्हें थोड़े अलग ढंग से कहता है; जहाँ कथा के रूपों में बड़ा अंतर है, वहाँ पृष्ठ पर यह साफ़ लिखा है। आरती और लोकगीतों के बोल हम नहीं छापते, बस उनका नाम बताते हैं।
बहुत-सी कथाओं में कोई कठिन मोड़ आता है: कोई शाप, कोई बीमारी, कोई हानि, जिसे बाद में व्रत ठीक करता है। लोककथाएँ अपनी बात ऐसे ही कहती हैं, और हम इन्हें कहानी की तरह ही सुनाते हैं। जहाँ ऐसा मोड़ आता है, वहाँ कथा को शांत मन से समझने की एक छोटी टिप्पणी भी है। कथा की कोई बात पढ़ने वाले के लिए डर की बात नहीं, और कोई कथा किसी पैसे वाले उपाय की माँग नहीं करती।
तिथियाँ कहाँ हैं
इन पृष्ठों में कोई तारीख़ या समय नहीं लिखा जाता, क्योंकि व्रत का दिन हर साल बदलता है और सही समय शहर-शहर में अलग होता है। हर कथा अपने व्रत या त्योहार के पृष्ठ से जुड़ी है, जो हमारे त्योहार कैलेंडर में है; वहाँ तिथि और मुहूर्त हमारा पंचांग शास्त्रीय नियम से निकालता है। बार-बार आने वाले व्रत अपनी तिथि-सूची से जुड़े हैं, जैसे हर एकादशी या प्रदोष।
कथा और पूजा साथ-साथ
हर कथा के साथ उसकी पूजा विधि का पृष्ठ भी है: कौन-सी सामग्री तैयार रखें, पूजा का क्रम क्या हो, परिवारों में कौन-से रिवाज चलते हैं और अलग-अलग प्रांतों में यह पूजा कैसे होती है। तैयारी के लिए विधि पढ़ें, और पूजा के समय कथा सुनें।
घर पर कथा कैसे सुनें
कथा प्रायः बैठकर सुनी जाती है, मुख्य पूजन के बाद और आरती या व्रत खोलने से पहले। बहुत-से घरों में सुनने वाले हाथ में चावल या गेहूँ के कुछ दाने रखते हैं और कथा के बाद उन्हें चढ़ा देते हैं। एक व्यक्ति कथा कहता या पढ़ता है, बाकी सुनते हैं; बच्चे भी साथ बैठ सकते हैं। कहने वाला कोई न हो तो मन लगाकर ख़ुद पढ़ लेना भी आज बहुत-से लोगों का तरीका है।