धनतेरस की जो कथा सबसे ज़्यादा घरों में सुनाई जाती है, वह राजा हिम के बेटे की है — एक राजकुमार, जिसकी मृत्यु विवाह की चौथी रात लिखी थी, और जिसकी नई-नवेली पत्नी ने दीयों, सोने-चाँदी के ढेर और अपनी कहानियों के सहारे यमराज को पूरी रात द्वार पर ही रोके रखा। इसके साथ धन्वंतरि की कथा भी कही जाती है, जो इसी त्रयोदशी को समुद्र मंथन से अमृत का कलश लेकर निकले थे।
त्योहार का दिन और आपके शहर में शाम की पूजा का मुहूर्त धनतेरस की तिथि वाले पृष्ठ पर है। यह पृष्ठ केवल कथा का है, हमारे अपने शब्दों में।
राजा हिम का बेटा
बहुत पहले हिम नाम के एक राजा थे। बरसों तक राजा-रानी की गोद सूनी रही, और जब आख़िर बेटा हुआ तो महल में ढोल-नगाड़े बज उठे। राज ज्योतिषियों ने बालक की कुंडली बनाई और फिर चुप हो गए। बहुत पूछने पर सबसे बूढ़े ज्योतिषी ने कहा — राजकुमार बड़ा होकर बलवान और भला बनेगा, पर विवाह के चौथे दिन उसे साँप डसेगा, और उसके प्राण नहीं बचेंगे।
राजा-रानी ने यह बात मन में दबा ली और बेटे को आँखों की पुतली की तरह सँभालकर पाला। राजकुमार बड़ा होकर दयालु और सुशील निकला। समय आने पर उसका विवाह एक ऐसी राजकुमारी से हुआ जो जितनी समझदार थी, उतनी ही निडर भी। किसी तरह उसे भी ज्योतिषियों की बात पता चल गई।
उसने न आँसू बहाए, न हिम्मत हारी। चौथी रात आई तो वह तैयारी में जुट गई। महल का हर दीया तेल से भरवाया और जलवाया — कमरों में, गलियारों में, सीढ़ियों पर — यहाँ तक कि पूरा महल रोशनी से नहा गया। उसने अपने गहने उतारे, घर भर के सोने-चाँदी के आभूषण इकट्ठे किए और शयनकक्ष के द्वार पर उनका चमचमाता ढेर लगा दिया। फिर पति के पास बैठ गई और उसे सोने नहीं दिया। एक के बाद एक कहानियाँ सुनाती रही, गीत गाती रही, और रात भर उसे बातों में लगाए रखा।
आधी रात को यमराज साँप का रूप धरकर महल में आए। आँगन से सरकते हुए वे राजकुमार के कमरे की ओर बढ़े, पर इतने दीयों की रोशनी और सोने के ढेर की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं, और भीतर जाने का रास्ता न सूझा। वे उसी गहनों के ढेर पर कुंडली मारकर बैठ गए। वहाँ से राजकुमारी की आवाज़ साफ़ सुनाई देती थी, और यमराज भी उसकी कहानियाँ सुनने लगे। रात ढलती गई। जिस घड़ी के लिए वे आए थे, वह कहानियाँ सुनते-सुनते निकल गई। भोर होते ही वे चुपचाप लौट गए, और राजकुमार के प्राण बच गए।
यमराज ने अपने दूतों से क्या कहा
इसके साथ एक और प्रसंग अक्सर जोड़ा जाता है। एक बार यमराज ने अपने दूतों से पूछा — क्या कभी प्राण हरते समय तुम्हें किसी पर दया आई? दूत पहले झिझके, फिर बोले — हाँ महाराज, जब हम राजा हिम के बेटे को लेने गए और उसकी नई ब्याही पत्नी को देखा, तो हमारा मन भर आया था। क्या कोई ऐसा उपाय नहीं जिससे लोग अकाल मृत्यु से बच सकें?
यमराज ने कहा — कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी की शाम जो मेरे नाम का दीपक घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके रखेगा, उसके घर अकाल मृत्यु नहीं आएगी। इसी से यम दीपदान की परंपरा मानी जाती है, जो धनतेरस की शाम निभाई जाती है।
कथा को शांत मन से समझें
यह एक भविष्यवाणी और एक टल गई मृत्यु की कथा है। इसका यह अर्थ नहीं कि जिस घर में यम का दीया न जले, वह किसी संकट में है; यह दीया प्रेम से की गई लंबी आयु की प्रार्थना है। कथा असल में राजकुमारी की हिम्मत और सूझ-बूझ का सम्मान करती है — जिस बात से लड़ा नहीं जा सकता था, उसके सामने उसने रात को रोशनी और आवाज़ से भर दिया और डर को पास नहीं फटकने दिया। आज दीया रखने वाले घर उसी भाव से इसे जलाते हैं।
धन्वंतरि और समुद्र मंथन
दूसरी कथा समुद्र मंथन की है। देवता और असुर अकेले-अकेले अमृत नहीं पा सकते थे, इसलिए दोनों ने मिलकर क्षीरसागर को मथने की ठानी। मंदराचल पर्वत मथानी बना और वासुकि नाग रस्सी। भगवान विष्णु ने कच्छप रूप धरकर पर्वत को अपनी पीठ पर थामा।
मंथन से एक के बाद एक बहुत कुछ निकला, कुछ भयानक और कुछ अद्भुत। अंत के पास एक तेजस्वी पुरुष प्रकट हुए, जिनके हाथ में अमृत से भरा कलश था। यही देवताओं के वैद्य धन्वंतरि थे, जिन्हें तब से आयुर्वेद का प्रवर्तक माना जाता है। मान्यता है कि वे कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को प्रकट हुए, इसीलिए यह दिन धन्वंतरि जयंती कहलाता है, और बहुत-से वैद्य और आयुर्वेद के विद्यालय इस दिन उनका पूजन करते हैं।
बहुत-से घरों के लिए यह दूसरी कथा "धन" शब्द का अर्थ ही बदल देती है। वे कहते हैं, धनतेरस का पहला धन निरोगी काया है, अलमारी में रखा धन उसके बाद आता है।
लक्ष्मी जी और किसान
कुछ घरों में एक तीसरी कथा भी सुनाई जाती है। एक बार भगवान विष्णु धरती पर आए तो लक्ष्मी जी भी साथ चलने की ज़िद करने लगीं। विष्णु जी मान गए, पर कहा कि मैं आगे जाता हूँ, तुम दक्षिण की ओर मत जाना। लक्ष्मी जी का मन नहीं माना; वे एक किसान के खेत में पहुँच गईं, वहाँ गन्ना तोड़कर चूसा और फूल तोड़े। विष्णु जी ने देखा तो कहा कि जो लिया है, उसका बदला अब किसान की सेवा करके चुकाओ। लक्ष्मी जी किसान के घर रहकर काम करने लगीं, और उस घर में धन-धान्य भर गया। जब विष्णु जी उन्हें लेने आए तो किसान ने जाने देने से मना कर दिया। तब लक्ष्मी जी ने कहा — दीवाली से पहले की त्रयोदशी को घर साफ़ करके, दीये जलाकर मेरी पूजा करना, मैं हर साल आऊँगी। इस कथा का ब्योरा अलग-अलग घरों में बहुत अलग मिलता है।
कथा कैसे सुनी जाती है
धनतेरस की शाम, घर की सफ़ाई और दीये जलने के बाद, लक्ष्मी, कुबेर और धन्वंतरि के पूजन के बाद यह कथा प्रायः सुनाई जाती है, और उसके बाद या उसके साथ यम का दीया बाहर रखा जाता है। कोई तय ढंग नहीं है: कहीं दादी-नानी पाँच मिनट में कथा कह देती हैं और बच्चे सुनते हैं, कहीं परिवार मिलकर पढ़ता है। शाम की पूजा और यम दीपदान का पूरा क्रम धनतेरस पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आज यह कथा क्या कहती है
आज धनतेरस ख़रीदारी के लिए जाना जाता है, और पुरानी कथाएँ चुपचाप इसमें संतुलन लाती हैं। एक कथा उस युवती की है जिसने सिर्फ़ रोशनी और कहानियों से अपने पति की रक्षा की; दूसरी आरोग्य के वरदान की। इन्हें सुनाने वाले घरों को याद रहता है कि लंबी आयु और अच्छी सेहत सबसे पहले है, और द्वार पर रखा एक दीया लगभग कुछ भी नहीं माँगता।
इसके दो दिन बाद दीवाली की लक्ष्मी पूजा होती है, और दीवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा। शाम की योजना के लिए मुहूर्त पृष्ठ और अपने शहर का चौघड़िया देख लें।