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व्रत कथा · शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा व्रत कथा: साहूकार की दो बेटियों की कहानी

शरद पूर्णिमा की व्रत कथा सरल हिंदी में: साहूकार की दो बेटियाँ और पूरा व्रत, लक्ष्मी जी का प्रश्न 'को जागर्ति', श्रीकृष्ण का महारास और कथा का अर्थ।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यहाँ कथा हमारे अपने शब्दों में है, जैसे परिवारों में पूजा के समय सुनाई जाती है। क्षेत्र और घर के हिसाब से कथा के रूप बदलते हैं; कथा में कहीं चेतावनी आए तो वह कहानी का हिस्सा है, पढ़ने वाले के लिए डर की बात नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

शरद पूर्णिमा पर उत्तर भारत के ज़्यादातर घरों में साहूकार की दो बेटियों की कथा सुनाई जाती है — बड़ी बेटी पूर्णिमा का व्रत पूरे मन से पूरा करती थी, और छोटी हर बार उसे अधूरा छोड़ देती थी; कथा बताती है कि छोटी ने पूरे व्रत का मोल कैसे जाना। इसके साथ बहुत-से परिवार लक्ष्मी जी के प्रश्न "को जागर्ति" यानी "कौन जाग रहा है", और शरद की उजली रात में श्रीकृष्ण के महारास को भी याद करते हैं।

पूर्णिमा किस दिन है, आपके शहर में चाँद कब निकलेगा और रात तय करने का नियम क्या है — यह सब शरद पूर्णिमा की तिथि वाले पृष्ठ पर है, और किसी भी शहर का चंद्रोदय शहरवार चंद्रोदय पर देखा जा सकता है। यह पृष्ठ केवल कथाओं का है, हमारे अपने शब्दों में।

साहूकार की दो बेटियों की कथा

बहुत पुरानी बात है। एक नगर में एक धनी साहूकार रहता था। उसकी दो बेटियाँ थीं। माँ ने दोनों को बचपन से ही हर पूर्णिमा का व्रत रखना सिखाया था, और दोनों बहनें यह व्रत रखती भी थीं।

दोनों बहनें शक्ल-सूरत में एक-सी थीं, पर स्वभाव अलग था। बड़ी बहन जो व्रत उठाती, उसे शांत मन से निभाती। सुबह जल्दी नहाती, दिन भर संयम से रहती, शाम को चाँद की राह देखती, उसे जल चढ़ाती और तभी अन्न ग्रहण करती। छोटी बहन भी व्रत तो उतने ही चाव से शुरू करती, पर दोपहर होते-होते उसका मन डगमगा जाता। कभी कुछ खा लेती, कभी चाँद निकलने से पहले ही व्रत खोल लेती, कभी कोई मेहमान आ गया तो पूजा ही रह जाती। उसके मन में कोई अनादर नहीं था, बस वह कभी व्रत को अंत तक नहीं ले जा पाती थी।

समय आने पर दोनों का ब्याह अच्छे घरों में हो गया। बड़ी बहन का घर फला-फूला, बच्चे स्वस्थ रहे और घर में सुख रहा। छोटी बहन भी माँ बनी, पर उसकी कोई संतान ज़्यादा दिन जीवित न रहती। उसका दुख बहुत गहरा था। घरवाले एक के बाद एक विद्वानों के पास गए कि आखिर ऐसा क्यों होता है।

आखिर एक बूढ़े पंडित जी ने उसकी पूरी बात धीरज से सुनी और फिर प्यार से उसके व्रतों के बारे में पूछा। जब उसने बताया कि वह व्रत कैसे रखती है, तो पंडित जी बोले — बेटी, आधा निभाया व्रत आधे जले दीये जैसा है। अब से पूर्णिमा का व्रत पूरा रखो, सुबह के स्नान से लेकर चाँद को अर्घ्य देने तक, धीरज के साथ। उसने यह बात मन में बाँध ली और उस दिन के बाद एक भी व्रत बीच में नहीं तोड़ा।

कुछ समय बाद उसके घर बेटा हुआ। पर जन्म के थोड़ी ही देर बाद वह बच्चा भी निढाल हो गया, जैसे प्राण छोड़ रहा हो। माँ का कलेजा फट रहा था, पर उसने धीरज नहीं छोड़ा। उसने बच्चे को लकड़ी के एक पीढ़े पर लिटाया, ऊपर से कपड़ा ढक दिया, और बड़ी बहन को बुलवा भेजा।

बड़ी बहन आई तो छोटी ने उसे उसी पीढ़े पर बैठने को कहा। बड़ी बहन बैठने लगी तो उसके घाघरे का किनारा ढके हुए बच्चे को छू गया, और उसी पल बच्चा कुनमुनाया और रोने लगा। बड़ी बहन घबराकर उठ खड़ी हुई और बोली — यह क्या कर रही थी तू? मैं तेरे बच्चे पर बैठ जाती, और फिर दोष मुझ पर आता। तब छोटी बहन ने हाथ जोड़कर सब बता दिया — बच्चा तो जैसे जा ही चुका था; उसे आस थी कि जिस बहन ने हर पूर्णिमा का व्रत पूरा निभाया है, उसके छूने भर से बच्चा लौट आएगा। और ऐसा ही हुआ।

कथा के अंत में छोटी बहन नगर भर में घूमकर हर स्त्री से कहती है कि पूर्णिमा का व्रत पूरा रखो, शांत मन से रखो। और यह मान्यता चली कि आश्विन की पूर्णिमा पर, जब चंद्रमा अपनी सोलहों कलाओं से पूर्ण माना जाता है, यह व्रत अपने सबसे पूरे रूप में होता है।

कथा को शांत मन से समझें

यह एक लोककथा है, और बहुत-सी व्रत कथाओं की तरह इसमें भी एक कठिन बात आती है — संतान का खो जाना और व्रत से उसका लौट आना। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि बच्चे का स्वास्थ्य इस पर टिका है कि माँ ने चाँद निकलने से पहले कुछ खाया या नहीं; किसी परिवार को कथा को इस तरह नहीं पढ़ना चाहिए। कथा सुनाने वाली बड़ी-बूढ़ियाँ इसमें से जो बात निकालती हैं, वह शांत है — आधे मन और पूरे मन से किए काम का अंतर, और दो बहनों का प्रेम, जिसमें एक बहन अपनी दृढ़ता दूसरी को दे देती है। गर्भवती, बीमार या बुज़ुर्ग स्त्रियाँ पानी और फल लेकर व्रत रखती हैं, या नहीं भी रखतीं, और परंपरा ने इसकी छूट हमेशा दी है।

लक्ष्मी जी का प्रश्न: को जागर्ति

बंगाल, ओडिशा, असम, मिथिला, महाराष्ट्र और गुजरात में आश्विन की पूर्णिमा कोजागरी या कोजागिरी की रात है। यह नाम एक प्रश्न से बना है। कहते हैं, इस रात लक्ष्मी जी धरती पर उतरती हैं और चाँदनी में घर-घर घूमकर पूछती हैं — "कौन जाग रहा है?"

जिस घर में अँधेरा हो और सब सो रहे हों, वहाँ से वे आगे बढ़ जाती हैं। जहाँ दीया जल रहा हो, आँगन बुहारा हुआ हो, और कोई शांत मन से उनकी राह देखता बैठा हो, वहाँ वे भीतर आती हैं और आने वाले साल के लिए उस घर को भरा-पूरा कर देती हैं।

इसके साथ अक्सर एक गरीब ब्राह्मण परिवार की कथा भी कही जाती है। पति आलस में पड़ गया था और पत्नी अभाव से थक चुकी थी। पत्नी ने उसे मनाया कि इस बार कोजागरी की रात जागकर लक्ष्मी जी की पूजा करो। उसने घर साफ़ किया, दीया जलाया, जो थोड़ा-बहुत था वही लक्ष्मी जी को चढ़ाया, और गीत गाते, खेल खेलते पूरी रात जागता रहा। लक्ष्मी जी ने उसे जागता पाया, और उनके दिन फिर गए। कुछ घरों में यही कथा किसी राजा के नाम से कही जाती है; बात वही है — खुला द्वार और जागता मन।

शरद की पूर्णिमा पर महारास

श्रीकृष्ण के भक्तों के लिए शरद पूर्णिमा सबसे बढ़कर महारास की रात है। भागवत पुराण कहता है कि जब शरद का पूरा चाँद वृंदावन पर उगा, तो श्रीकृष्ण ने यमुना किनारे बाँसुरी छेड़ी। घरों में बैठी गोपियों ने वह धुन सुनी और जो जिस काम में थी, उसे वहीं छोड़कर उनके पास चल पड़ी। चाँदनी से नहाए कुंज में श्रीकृष्ण ने उनके साथ बड़े घेरे में रास किया, और हर गोपी को लगा कि कान्हा केवल उसी के साथ हैं।

भक्ति के आचार्य रास को साधारण नृत्य नहीं, आत्मा और परमात्मा का मिलन मानते हैं। ब्रज में इस रात रासलीला होती है, और बहुत-से मंदिरों में चाँदनी से मेल खाते सफ़ेद वस्त्रों में ठाकुर जी का श्रृंगार होता है।

कथा कैसे सुनी जाती है

पूर्णिमा का व्रत रखने वाली स्त्रियाँ प्रायः शाम को दीया जलाने के बाद और चाँद को जल चढ़ाने से पहले साथ बैठती हैं, या अकेले पूजा के कोने में। घर की कोई बड़ी दोनों बहनों की कथा कहती हैं, और सुनने वाली हाथ में चावल या गेहूँ के कुछ दाने रखती हैं, जो बाद में चाँद के अर्घ्य के साथ चढ़ाए जाते हैं। जिन घरों में कोजागरी का जागरण होता है, वहाँ लक्ष्मी जी के प्रश्न की कथा रात के जागरण में सुनाई जाती है। कृष्ण मंदिरों में रास की कथा पढ़कर नहीं, गीत और लीला से कही जाती है।

रात की पूरी पूजा, लक्ष्मी पूजन से लेकर चाँदनी में रखी खीर तक, शरद पूर्णिमा पूजा विधि पृष्ठ पर है।

आज यह कथा क्या कहती है

बहुत-से परिवारों के लिए शरद पूर्णिमा बस एक सुहानी शाम है — बरसात के बाद की पहली ठंडी रात, छत पर ठंडी होती खीर, और बहुत उजले चाँद के नीचे देर तक बैठा पूरा परिवार। कथा उस शाम को एक अर्थ का धागा दे देती है। दोनों बहनें पूछती हैं कि जो शुरू किया, क्या हम उसे पूरा करते हैं; कोजागरी का प्रश्न पूछता है कि क्या हम भलाई के लिए जागे हुए हैं; और महारास खुले मन के आनंद की बात कहता है।

हर महीने की पूर्णिमा पर जो पूजा बहुत-से घरों में होती है, उसकी कथा सत्यनारायण कथा पृष्ठ पर है, और कुछ ही दिन बाद उत्तर भारत में सुहागिनों का व्रत करवा चौथ आता है। शाम की योजना के लिए अपने शहर का पंचांग और चंद्रोदय का समय देख लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शरद पूर्णिमा पर कौन-सी कथा कही जाती है?

उत्तर भारत के बहुत-से घरों में साहूकार की दो बेटियों की कथा कही जाती है — बड़ी बेटी पूर्णिमा का व्रत पूरा करती थी और छोटी अधूरा छोड़ देती थी। बंगाल, ओडिशा, मिथिला और महाराष्ट्र में लक्ष्मी जी के 'कौन जाग रहा है' पूछने की कथा भी सुनाई जाती है।

कोजागरी या कोजागिरी का क्या अर्थ है?

यह संस्कृत के प्रश्न 'को जागर्ति' से बना है, यानी कौन जाग रहा है? मान्यता है कि इस रात लक्ष्मी जी घर-घर जाकर यही पूछती हैं और जहाँ दीया जलता मिले और कोई मन से उनकी राह देखता मिले, वहाँ कृपा करती हैं।

शरद पूर्णिमा को महारास से क्यों जोड़ा जाता है?

भागवत पुराण में वर्णन है कि शरद की पूर्णिमा की रात श्रीकृष्ण ने यमुना किनारे बाँसुरी बजाई और गोपियाँ उनके साथ रास करने आईं। ब्रज में यह रात महारास की रात के रूप में मनाई जाती है।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार की लोक-परंपरा, जैसी पूर्णिमा व्रत में कही जाती है
  • उत्तर भारत की व्रत कथा पुस्तकें (साहूकार की बेटियों की कथा), यहाँ हमारे अपने शब्दों में
  • भागवत पुराण, दशम स्कंध का रास प्रसंग (भक्ति-ग्रंथों में दिए सार के अनुसार)
  • बंगाल, ओडिशा, मिथिला और महाराष्ट्र में कोजागरी लक्ष्मी पूजा की घरेलू परंपरा

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति