नाग पंचमी की जो कथा गाँव-घरों में सबसे ज़्यादा सुनाई जाती है, वह एक किसान की है, जिसके हल के फाल से अनजाने में एक नागिन के बच्चे मर गए, और उसकी बेटी की, जिसकी सीधी-सच्ची नाग पूजा ने नागिन का क्रोध शांत कर दिया। इसके साथ दो पुरानी कथाएँ भी कही जाती हैं: बालक कृष्ण का कालिय नाग के फनों पर नाचना, और आस्तीक मुनि का राजा जनमेजय का सर्प यज्ञ रुकवाना।
नाग पंचमी श्रावण शुक्ल पंचमी को आती है। आपके शहर में यह किस दिन है और तिथि कैसे तय होती है, यह नाग पंचमी की तिथि वाले पृष्ठ पर है, और उस दिन की तिथि-नक्षत्र अपने शहर के पंचांग में देखें। यहाँ केवल कथाएँ हैं, हमारे अपने शब्दों में।
किसान, नागिन और बेटी की कथा
किसी गाँव में एक किसान रहता था। घर में उसकी पत्नी थी, दो बेटे थे और एक बेटी थी, जिसका ब्याह कुछ बरस पहले दूर के गाँव में हो चुका था। सावन आया, बारिश से धरती नरम हो गई, और किसान बैलों को लेकर खेत जोतने निकल पड़ा।
खेत की मेड़ के पास घास के एक झुरमुट में एक नागिन ने अपने बच्चों के लिए ठिकाना बनाया था। किसान को इसका पता न था। हल का फाल गीली मिट्टी में धँसता गया और उसी में नागिन के नन्हे बच्चे कुचले गए। साँझ को किसान बैल खोलकर घर लौट आया, उसे कुछ ख़बर न थी।
नागिन लौटी तो बच्चों को उस हाल में देखकर बिलख उठी। कथा में वह कोई साधारण साँप नहीं, बोलने-सोचने वाली नाग जाति की है। दुख धीरे-धीरे क्रोध में बदल गया। वह हल की लीक पकड़कर किसान के घर तक पहुँची। कहानी कहती है कि उसी रात उसने सोते हुए किसान, उसकी पत्नी और दोनों बेटों को डस लिया, और सुबह उनमें से कोई नहीं उठा।
फिर भी नागिन का मन ठंडा न हुआ। उसे याद आया कि किसान की एक बेटी भी है। अगली सुबह वह उस गाँव की ओर चल पड़ी जहाँ बेटी ब्याही थी।
वह सुबह सावन के उजले पाख की पंचमी की थी। नागिन जब बेटी के आँगन में पहुँची तो देखा कि वह ज़मीन पर बैठी है। दरवाज़े के पास दीवार पर उसने हल्दी से नागों की एक कतार बनाई है। सामने कटोरी में दूध रखा है, थोड़े फूल हैं, चावल के दाने हैं और एक दीया जल रहा है। बेटी हाथ जोड़े धीमे-धीमे प्रार्थना कर रही थी कि नाग देवता उसके मायके और ससुराल, दोनों की रक्षा करें।
नागिन वहीं ठिठक गई। जिसे मारने आई थी, वही उसकी जाति की पूजा कर रही थी। पूजा पूरी होने तक वह चुपचाप देखती रही, और उसका क्रोध पिघल गया। फिर उसने बेटी के सामने आकर सारी बात कह दी: खेत में क्या हुआ था, और उसने दुख में क्या कर डाला।
बेटी ने उसे कोसा नहीं। वह रोई, और फिर हाथ जोड़कर पूछा कि क्या अब कुछ हो सकता है। उसकी नम्रता देखकर नागिन ने उसे थोड़ा अमृत दिया; कुछ घरों में कहा जाता है कि उसने एक जड़ी-बूटी का पता बताया। बेटी भागती हुई मायके पहुँची और माँ-बाप और भाइयों को वह अमृत छुआया। चारों ऐसे उठ बैठे जैसे लंबी नींद से जागे हों। नागिन ने किसान को क्षमा कर दिया, और किसान ने वचन दिया कि इस दिन उसके खेत में कभी हल नहीं चलेगा।
कथा को शांत मन से समझें
बहुत-सी लोककथाओं की तरह यह कथा भी मृत्यु और फिर से जी उठने की घटना से अपनी बात साफ़ कहती है। यह साँपों से डराने वाली कथा नहीं है, और पूजा का कोई अंग छूट जाने पर किसी अनहोनी का डर रखने की कोई बात इसमें नहीं है। जिन किसानों ने यह कथा सबसे पहले सुनाई, वे सीधी-सी बात कह रहे थे: बरसात में साँप हमारे खेतों में ही रहते हैं, लापरवाही से चला हल किसी का घर उजाड़ सकता है, और डर से अच्छा आदर है। बेटी ने भी अपनी दीवार पर बने चित्र की पूजा की थी, किसी जीवित साँप की नहीं। आज भी यही सबसे सुंदर ढंग है।
कृष्ण और कालिय नाग
ब्रज में नाग पंचमी को कालिय दमन की कथा से भी याद किया जाता है। यमुना के एक गहरे कुंड में कई फनों वाला कालिय नाग आ बसा था। उसके विष से पानी कड़वा हो गया था; जो गाय या पक्षी वहाँ पानी पीते, बीमार पड़ जाते। एक दिन ग्वाल-बालों के साथ खेलते हुए कन्हैया किनारे के कदंब के पेड़ पर चढ़े और कुंड में कूद गए।
कालिय ने बालक को अपनी कुंडली में जकड़ लिया। किनारे पर ग्वाले घबरा गए, यशोदा मैया दौड़ी आईं। पर कृष्ण कुंडली से निकलकर नाग के फनों पर चढ़ गए और नाचने लगे, एक फन से दूसरे फन पर, जब तक कालिय थक न गया। तब कालिय की पत्नियाँ हाथ जोड़कर आईं और पति के प्राणों की भीख माँगी। कृष्ण ने उसे मारा नहीं; कहा कि यमुना छोड़कर समुद्र में चले जाओ। नदी फिर निर्मल हो गई। कथा दया पर पूरी होती है, और नाग पंचमी पर घर-घर में इसे इसी तरह सुनाया जाता है।
आस्तीक मुनि और सर्प यज्ञ
सबसे पुराना संबंध महाभारत में मिलता है। अर्जुन के पोते राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हुई। उनके पुत्र जनमेजय ने शोक और क्रोध में ऐसा यज्ञ शुरू किया जिसमें मंत्रों के बल से संसार के सारे सर्प खिंचकर आग में गिरने लगे।
तब नाग आस्तीक मुनि की शरण गए। आस्तीक के पिता जरत्कारु ऋषि थे और माता नागराज वासुकि की बहन। युवा आस्तीक यज्ञ में पहुँचे, राजा की विद्या और यज्ञ की प्रशंसा की। प्रसन्न होकर जनमेजय ने मनचाहा वर माँगने को कहा, और आस्तीक ने केवल इतना माँगा कि यह यज्ञ रोक दिया जाए। राजा वचन से बँधे थे, उन्होंने यज्ञ रोक दिया। बहुत-सी कथाएँ कहती हैं कि यह श्रावण शुक्ल पंचमी का दिन था, इसीलिए इस दिन नागों की पूजा होती है।
कथा के और रूप
- भाई और बहन। कर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में यह दिन उस कथा से जुड़ा है जिसमें बहन की नाग पूजा से भाई की रक्षा होती है; वहाँ बहनें भाइयों के कुशल के लिए यह व्रत रखती हैं।
- आठ महानाग। कुछ परिवार लंबी कथा नहीं कहते, पूजा से पहले बस अनंत, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक जैसे महानागों के नाम लेते हैं।
कथा कैसे सुनी जाती है
ज़्यादातर घरों में कथा सुबह कही जाती है, दीवार पर बने नागों की पूजा के बाद। घर की औरतें साथ बैठती हैं, कोई बड़ी-बूढ़ी किसान और उसकी बेटी की कहानी सुनाती है, और बच्चों से कहा जाता है कि हल वाली बात ध्यान से सुनें। पूजा का पूरा क्रम, सामग्री और दिन के रिवाज नाग पंचमी पूजा विधि पृष्ठ पर हैं।
आज यह कथा क्या कहती है
यह कथा उन लोगों के बीच बनी जो बरसात के खेतों को साँपों के साथ बाँटते थे। यह बरसात में धरती के साथ सावधानी, अनाज को चूहों से बचाने वाले जीवों के प्रति कृतज्ञता, और उस बेटी जैसे धीरज की बात करती है। आज वन्यजीवों की सुरक्षा की सलाह भी यही कहती है: पूजा चित्र, प्रतिमा या बाँबी पर करें, और जीवित साँपों को उनके हाल पर छोड़ दें।
नाग पंचमी के कुछ ही दिन बाद रक्षा बंधन आता है, और भादों में ऋषि पंचमी का व्रत। पूजा अच्छे समय में शुरू करना चाहें तो अपने शहर का चौघड़िया देख लें।