गणेश चतुर्थी की कथा गणेश जी के जन्म की कथा है: माता पार्वती ने स्नान से पहले शरीर पर लगाए हल्दी के उबटन से एक बालक गढ़ा, उसे द्वार पर पहरे के लिए बिठाया, और शिव जी से हुई भारी भूल के बाद उस बालक को हाथी का मस्तक मिला और वह शिव के गणों का स्वामी, सबसे पहले पूजे जाने वाला देवता बना। उसी रात एक और कथा कही जाती है कि चाँद क्यों नहीं देखा जाता, और भूल से चाँद दिख जाए तो श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि की कथा सुनी जाती है।
पर्व का दिन, आपके शहर में मध्याह्न पूजा का समय और तिथि तय होने का नियम गणेश चतुर्थी की तिथि वाले पृष्ठ पर है। स्थापना अच्छे समय में करनी हो तो अपने शहर का चौघड़िया देख लें। यह पृष्ठ केवल कथा का है, हमारे अपने शब्दों में।
गणेश जी का जन्म
कैलाश पर शिव जी अक्सर ध्यान में डूबे रहते या अपने गणों के साथ घूमने निकल जाते। गण — भूत, प्रेत, नंदी और न जाने कितने निराले साथी — केवल शिव जी की बात मानते थे। माता पार्वती की सखियाँ जया और विजया ने एक दिन उनसे कहा कि माँ, आपका भी कोई ऐसा होना चाहिए जो सिर्फ़ आपकी आज्ञा माने।
यह बात माता के मन में बैठ गई। एक सुबह स्नान की तैयारी करते हुए उन्होंने हल्दी और तेल का सुगंधित उबटन अपने शरीर पर मला — वही उबटन जो आज भी ब्याह से पहले दुल्हन को लगाया जाता है। उबटन सूखकर झड़ा तो माता ने उसे समेटा और अपने हाथों से एक सुंदर बालक की मूरत बना दी। बड़े दुलार से उसे देखा और उसमें प्राण फूँक दिए। बालक ने आँखें खोलीं, माता को प्रणाम किया और उन्हें माँ कहकर पुकारा।
माता ने उसके हाथ में एक डंडा दिया और कहा — बेटा, मैं भीतर स्नान करने जा रही हूँ। इस द्वार पर खड़े रहना और जब तक मैं न कहूँ, किसी को अंदर मत आने देना। बालक पूरी गंभीरता से पहरे पर खड़ा हो गया।
थोड़ी ही देर में शिव जी लौटे और भीतर जाने लगे। एक छोटे-से अनजान बालक ने उनका रास्ता रोक लिया। पहले तो शिव जी मुस्कुराए, फिर हैरान हुए, क्योंकि बालक किसी भी तरह हटने को तैयार नहीं था। गणों ने उसे हटाने की कोशिश की तो वह एक-एक करके सबको पछाड़ता गया। उसे बस इतना पता था कि माँ ने किसी को भीतर न आने देने को कहा है।
बात बढ़ती गई। देवता भी यह युद्ध देखने आ पहुँचे; कुछ कथाओं में भगवान विष्णु शिव जी के साथ खड़े होकर बालक का ध्यान बँटाते हैं। आखिर शिव जी का धैर्य टूट गया, उन्होंने त्रिशूल उठाया और बालक का सिर धड़ से अलग हो गया।
माता पार्वती बाहर आईं और यह दृश्य देखा तो उनका शोक ऐसे क्रोध में बदल गया कि तीनों लोक काँप उठे। कई कथाओं में वे देवी के उग्र रूपों को प्रकट करती हैं, और देवता हाथ जोड़कर शिव जी से सब ठीक करने की विनती करते हैं। शिव जी अब स्वयं दुखी थे। उन्होंने गणों को उत्तर दिशा में भेजा और कहा — जो पहला प्राणी उत्तर की ओर सिर करके सोया मिले, उसका मस्तक ले आओ। गणों को एक हाथी मिला, और वे उसका मस्तक ले आए।
शिव जी ने वह मस्तक बालक के धड़ पर रखा और उसे फिर से जीवन दिया। उन्होंने बालक को गले लगाकर अपना पुत्र माना, और सब देवताओं के सामने माता पार्वती को वचन दिया कि यह बालक मेरे गणों का नायक, गणपति, होगा, और हर पूजा, हर यात्रा, हर नए काम में सबसे पहले इसी की पूजा होगी। ब्रह्मा, विष्णु और सब देवताओं ने उसे आशीर्वाद और भेंट दी। मान्यता है कि यह सब भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को दोपहर के समय हुआ, इसीलिए गणेश चतुर्थी की मुख्य पूजा मध्याह्न में होती है।
कथा को शांत मन से समझें
सिर कटने का प्रसंग कथा का सबसे कठिन हिस्सा है, और बच्चों को इसे धीरे से सुनाना अच्छा है। पुराणों में यह क्रूरता की कहानी नहीं है; यह उन दो लोगों की कहानी है जो दोनों माता पार्वती से प्रेम करते थे, पर एक-दूसरे को अभी पहचानते नहीं थे। शिव जी का क्रोध एक भूल थी, और बाकी पूरी कथा उसी भूल को सुधारने की है — इतना सुधारने की कि जिस बालक पर वार हुआ, वही हर प्रार्थना का पहला देवता बन गया। बहुत-से घरों में बड़े-बुज़ुर्ग हाथी के मस्तक का अर्थ यूँ समझाते हैं: बड़े कान ज़्यादा सुनने के लिए, छोटा मुँह कम बोलने के लिए, और हाथी जैसी धीर-गंभीर चाल।
कथा के और रूप
- हल्दी या चंदन। कहीं कहा जाता है कि माता ने चंदन के लेप से गणेश जी बनाए, कहीं केवल स्नान का उबटन। कथा का मर्म वही रहता है।
- शनि देव की दृष्टि। ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा में माता के आग्रह पर शनि देव बालक को देखते हैं, उनकी दृष्टि से बालक का सिर गिर जाता है और भगवान विष्णु हाथी का मस्तक लाते हैं।
- पृथ्वी की परिक्रमा। बच्चों की प्यारी कथा है कि शिव-पार्वती ने दोनों पुत्रों से संसार की परिक्रमा करने को कहा। कार्तिकेय मोर पर उड़ चले, और गणेश जी ने धीरे-धीरे माता-पिता की परिक्रमा करके कहा कि मेरा संसार तो आप ही हैं। जीत उन्हीं की हुई।
चंद्रमा की हँसी
अपने जन्मदिन पर गणेश जी घर-घर गए, और हर जगह उन्हें मोदक और लड्डू इतने खिलाए गए कि पेट भर गया। रात को वे अपने मूषक पर बैठकर लौट रहे थे कि रास्ते में एक साँप आ गया। मूषक डरकर उछला और गणेश जी नीचे गिर पड़े; उनके गोल पेट से लड्डू बिखर गए। उन्होंने लड्डू समेटे और उसी साँप को पेट पर कमरबंद की तरह बाँध लिया।
आकाश से चंद्रमा यह सब देख रहा था। उसे अपनी सुंदरता का बड़ा घमंड था, और वह ज़ोर से हँस पड़ा। गणेश जी ने ऊपर देखा और कहा — दूसरों के गिरने पर हँसते हो, तो आज की रात जो तुम्हें देखेगा, उस पर झूठा कलंक लगेगा। चंद्रमा की चमक लज्जा से फीकी पड़ गई। उसने और देवताओं ने क्षमा माँगी, तो गणेश जी का मन पसीजा। उन्होंने कहा कि तुम पहले की तरह घटते-बढ़ते रहोगे, और यह बात साल में केवल इसी एक रात के लिए रहेगी।
इसीलिए गणेश चतुर्थी की रात लोग चाँद की ओर नहीं देखते, और बहुत-से घरों में इस चौथ को कलंक चौथ भी कहा जाता है।
श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि
द्वारका में सत्राजित नाम के एक यादव रहते थे, जिन्हें सूर्य देव ने स्यमंतक नाम की एक दमकती मणि दी थी। कहते थे कि जहाँ वह मणि रहे, वहाँ अन्न-धन की कमी नहीं रहती। श्रीकृष्ण ने एक बार सुझाव दिया कि मणि राजा उग्रसेन के पास रहे तो पूरी नगरी का भला हो। सत्राजित नहीं माने और मणि अपने घर में ही रखी।
एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेन वह मणि पहनकर वन में शिकार खेलने गया और लौटकर नहीं आया। एक सिंह ने उसे मार डाला और मणि ले गया, और उस सिंह को रीछों के राजा, बूढ़े जाम्बवान ने मार दिया। जाम्बवान ने चमकती मणि अपने बच्चे को खिलौने के रूप में दे दी।
द्वारका में कानाफूसी होने लगी कि मणि कृष्ण ने ही ली होगी। कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने उस बरस भाद्रपद की चौथ का चाँद देख लिया था। अपना नाम साफ़ करने के लिए वे कुछ लोगों के साथ वन में गए, पैरों के निशान देखते-देखते जाम्बवान की गुफा तक पहुँचे और अकेले भीतर गए। दोनों में कई दिनों तक युद्ध चला। थककर जाम्बवान ने पहचाना कि यह तो वही प्रभु हैं जिनकी उन्होंने त्रेता में श्रीराम के रूप में सेवा की थी। उन्होंने प्रणाम करके मणि लौटा दी और अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया।
द्वारका लौटकर श्रीकृष्ण ने भरी सभा में मणि सत्राजित को सौंप दी। सत्राजित को अपने संदेह पर बड़ी लज्जा हुई, और उन्होंने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया। झूठा कलंक धुल गया।
कथा को शांत मन से समझें
चाँद न देखने का रिवाज एक लोक-मान्यता है, जिसे लोग हल्के मन से, अक्सर मुस्कुराते हुए निभाते हैं। छत से चाँद की एक झलक दिख जाने से किसी का कुछ नहीं बिगड़ता। कथा जो सिखाती है वह सीधी-सी बात है: किसी के गिरने पर हँसना अपने ही ऊपर लौटता है, और कभी-कभी निर्दोष पर भी दोष लग जाता है — जैसे श्रीकृष्ण पर लगा — जिसका उत्तर धीरज और सच्चाई से दिया जाता है।
कथा कैसे सुनी जाती है
जन्म की कथा दोपहर की पूजा में कही जाती है, जब मूर्ति की स्थापना हो चुकी हो और पहली बार दूर्वा और मोदक चढ़ा दिए गए हों। बच्चे सबसे आगे बैठते हैं, क्योंकि यह सबसे बढ़कर बच्चों का त्योहार है। चंद्रमा और स्यमंतक मणि की कथा अक्सर शाम को सुनाई जाती है; बहुत-से घरों में अगर किसी को भूल से चाँद दिख जाए, तो घर की कोई बड़ी पूरे परिवार को स्यमंतक मणि की कथा पढ़कर सुना देती हैं। स्थापना और रोज़ की पूजा का पूरा क्रम गणेश चतुर्थी पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आज यह कथा क्या कहती है
गणेश जी नए आरंभ के देवता इसलिए हैं क्योंकि वे स्वयं एक नया आरंभ थे — माँ के हाथों से गढ़े गए, और उस पिता से दूसरा जीवन पाने वाले जिनसे भूल हुई थी। जो परिवार दस दिन गणपति को घर में रखते हैं, वे अक्सर कहते हैं कि उन दिनों घर का माहौल ही बदल जाता है, जैसे कोई मेहमान आया हो जो घर का बच्चा भी है।
हर महीने की कृष्ण पक्ष की चौथ का व्रत संकष्टी चतुर्थी कहलाता है, जिसकी अपनी गणेश कथाएँ हैं, और गणेश चतुर्थी के अगले दिन ऋषि पंचमी आती है। उत्सव के दिनों में कोई नया काम शुरू करना हो तो मुहूर्त पृष्ठ देख लें।