गणेश चतुर्थी की पूजा में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की दोपहर मिट्टी के गणपति घर लाए जाते हैं, सरल-सी प्राण प्रतिष्ठा से उन्हें मूर्ति में विराजने का न्योता दिया जाता है, और विदाई तक रोज़ सुबह-शाम उनकी पूजा होती है। संक्षेप में: जगह तैयार करें, मध्याह्न में स्थापना करें, इक्कीस दूर्वा और मोदक चढ़ाएँ, आरती गाएँ, जितने दिन घर की रीति हो उतने दिन पूजा करें, और प्रेम से विसर्जन करें।
तिथि और आपके शहर में मध्याह्न का समय गणेश चतुर्थी की तिथि वाले पृष्ठ पर है; उत्सव का अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी है। यहाँ समय नहीं लिखे गए, क्योंकि वे हर साल और हर शहर में बदलते हैं।
पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें
- गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति, बिना रंग की या प्राकृतिक रंगों वाली; महाराष्ट्र में शाडू मिट्टी की मूर्ति पारंपरिक मानी जाती है
- चौकी या पटरा, लाल या पीला कपड़ा, और मूर्ति के नीचे रखने को थाली या चावल की छोटी ढेरी
- आम के पत्तों और नारियल वाला जल भरा कलश, यदि आपके घर में कलश रखने की रीति है
- दूर्वा: इक्कीस तिनके, या तीन-तीन तिनकों की इक्कीस गाँठें, धुली हुई
- लाल फूल, ख़ासकर गुड़हल, और एक माला
- रोली या कुमकुम, हल्दी, चंदन, अक्षत, जनेऊ और गणपति के लिए छोटा वस्त्र
- मोदक: नारियल-गुड़ के भाप में पके उकडीचे मोदक, या तले हुए, या बाज़ार के; हो सके तो इक्कीस, कम हों तो भी ठीक
- लड्डू, केले और दूसरे फल; स्नान के लिए पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
- घी का दीया, आरती के लिए कपूर, धूप या अगरबत्ती
- आसपास मिलें तो शमी के पत्ते; कुछ घर बेलपत्र भी चढ़ाते हैं
- घर पर विसर्जन के लिए एक बाल्टी या टब
इनमें कुछ भी भव्य होना ज़रूरी नहीं। साफ़ ताक पर छोटी-सी मूर्ति, एक दीया, मुट्ठी भर दूर्वा और एक मिठाई — इतने में भी पूरी गणेश पूजा हो जाती है।
पूजा का क्रम
- जगह तैयार करें। एक दिन पहले या उसी सुबह वह कोना साफ़ करें जहाँ गणपति बैठेंगे। चौकी पर कपड़ा बिछाएँ, चावल का छोटा आसन बनाएँ, और फूल-पत्तों या सादी रंगोली से सजाएँ। बहुत-से परिवार चारों ओर छोटा-सा मंडप सजाते हैं।
- गणपति को घर लाएँ। मूर्ति अक्सर मुख ढककर लाई जाती है और स्थापना के समय ही खोली जाती है। घर के लोग दरवाज़े पर दीया लेकर "गणपति बप्पा मोरया" के जयकारे से स्वागत करते हैं।
- स्नान और संकल्प। मध्याह्न में नहाकर चौकी के सामने बैठें, दाएँ हाथ में जल लें और अपने शब्दों में कहें कि आप गणेश जी का स्वागत कर रहे हैं और इतने दिन उनकी पूजा करेंगे। जल छोड़ दें।
- स्थापना। मूर्ति को चावल के आसन पर रखें, हो सके तो मुख पूर्व या पश्चिम की ओर। कलश रखते हों तो उसे पास में रखें।
- प्राण प्रतिष्ठा, सरल शब्दों में। यह गणपति को मिट्टी में विराजने का न्योता देने का क्षण है। पंडित जी मंत्र पढ़ते हैं; घर पर एक फूल या दूर्वा से मूर्ति के हृदय को हल्के से छुएँ और हाथ जोड़कर कहें कि बप्पा, आइए, हमारे मेहमान बनकर रहिए। मुख ढका हो तो अब खोल दें।
- जितना हो सके, षोडशोपचार। चरण और हाथ धोने को जल, आचमन, पंचामृत स्नान (मिट्टी की मूर्ति पर छींटे देकर, या उनके प्रतीक सुपारी पर), फिर शुद्ध जल, वस्त्र और जनेऊ, चंदन, रोली, अक्षत, फूल और माला अर्पित करें।
- दूर्वा। "ॐ गं गणपतये नमः" कहते हुए एक-एक करके या तीन-तीन की गाँठ में इक्कीस दूर्वा चढ़ाएँ। दूर्वा गणेश जी को सबसे प्रिय है; बहुत-से घर इसे कभी नहीं छोड़ते।
- नैवेद्य। मोदक, लड्डू और फल का भोग लगाएँ। इक्कीस मोदकों की थाली सबसे पारंपरिक भोग है।
- आरती। कपूर और दीया जलाकर आरती गाएँ। महाराष्ट्र में सुखकर्ता दुखहर्ता गाई जाती है, अक्सर उसके बाद और आरतियाँ भी; उत्तर भारत में बहुत-से घर जय गणेश जय गणेश देवा गाते हैं। फिर गणेश चतुर्थी की कथा सुनें।
- रोज़ की पूजा। जितने दिन गणपति घर में रहें, हर सुबह और शाम जल, फूल, दूर्वा, ताज़ा भोग और आरती। आने वाले मेहमान भी शामिल होते हैं, और आरती में अक्सर बच्चे सबसे आगे होते हैं।
- उत्तर पूजा और विसर्जन। अंतिम दिन दूर्वा और मोदक से आख़िरी पूजा करें, अनजाने में हुई किसी चूक के लिए क्षमा माँगें, और विदाई की आरती करें। मूर्ति को धीरे से उठाएँ और विसर्जन करें — घर पर साफ़ पानी की बाल्टी या टब में, या नगर निगम के बनाए कृत्रिम तालाब में। सब मिलकर पुकारते हैं "गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ"।
- मिट्टी घुलने के बाद। पानी और मिट्टी बगीचे या गमलों में डाल दें।
समय कैसे देखें
दो समय काम के हैं। स्थापना और पहली पूजा चतुर्थी के मध्याह्न काल में होती है, जो हर शहर के लिए तिथि वाले पृष्ठ पर दिया है। विसर्जन के दिन और शोभा-यात्रा के लिए बहुत-से परिवार अच्छा समय देखने को चौघड़िया देखते हैं, और कुछ मुहूर्त पृष्ठ भी। चतुर्थी की रात वही रात है जब बहुत-से लोग चाँद की ओर नहीं देखते; इसका कारण कथा में है।
परिवारों के रीति-रिवाज
नीचे लिखी बातें रिवाज हैं; हर घर का अपना रूप होता है।
- गणपति कितने दिन रहेंगे, यह घर की परंपरा है: डेढ़ दिन, तीन, पाँच, सात या दस दिन; दस दिन वाला उत्सव अनंत चतुर्दशी को पूरा होता है।
- एक पुरानी कथा के कारण ज़्यादातर घरों में गणेश जी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती, जबकि दूर्वा और लाल फूल ज़रूर चढ़ते हैं।
- बहुत-से घरों में चतुर्थी की रात चाँद नहीं देखा जाता; भूल से दिख जाए तो स्यमंतक मणि की कथा पढ़ ली जाती है।
- महाराष्ट्र के बहुत-से घरों में उत्सव के बीच दो-तीन दिन के लिए गणपति की माँ, गौरी, का भी आगमन होता है।
- इस दिन व्रत रखना अपनी इच्छा पर है। व्रत रखने वाले पूजा के बाद फल और मोदक का प्रसाद लेते हैं; गर्भवती, बीमार और बुज़ुर्ग सामान्य भोजन करें, और डॉक्टर की सलाह सबसे पहले।
- बिना प्लास्टर ऑफ़ पेरिस वाली मिट्टी और बिना रसायन के रंग अब आम चलन है, और घर पर विसर्जन से नदियाँ और तालाब साफ़ रहते हैं।
प्रांतों के अपने ढंग
- महाराष्ट्र: उत्सव का केंद्र। घरों में डेढ़ से दस दिन तक गणपति बैठते हैं और सार्वजनिक मंडल बड़े पंडाल सजाते हैं। सार्वजनिक गणेशोत्सव को उन्नीसवीं सदी के अंत में लोकमान्य तिलक ने यह रूप दिया, ताकि अलग-अलग जातियों और मोहल्लों के लोग एक साथ जुटें।
- गोवा और कोंकण: यहाँ इसे चवथ कहते हैं और यह पूरी तरह परिवार का उत्सव है; मूर्ति के ऊपर फलों और वनस्पतियों से सजी माटोली लटकाई जाती है।
- कर्नाटक: गणपति के आने से एक दिन पहले गौरी की पूजा होती है, जिसे गौरी हब्बा कहते हैं।
- आंध्र प्रदेश और तेलंगाना: विनायक चविथि, जिसमें कई तरह के पत्तों से पत्री पूजा होती है।
- उत्तर भारत: पहले घर की छोटी-सी पूजा होती थी, अक्सर एक दिन की; अब कई शहरों में बड़े सामुदायिक उत्सव होने लगे हैं।
पूजा के बाद
मोदक प्रसाद के रूप में बाँटें। गणेश जी का हर महीने का व्रत संकष्टी चतुर्थी है, और गणेश चतुर्थी के अगले दिन ऋषि पंचमी आती है।