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पूजा विधि · भाई दूज

भाई दूज पूजा विधि: टीका, आरती और भोजन

भाई दूज पूजा विधि सरल शब्दों में: थाली की सामग्री, टीका, भाई की आरती, बहन के हाथ का भोजन, उपहार, मथुरा का यमुना स्नान, और भाई फोंटा व भाऊबीज।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यह घर पर पूजा करने का आम तरीका है। आपके परिवार की रीति सबसे पहले है: क्षेत्र के हिसाब से क्रम, सामग्री और शब्द बदलते हैं, और मन से की गई सादी पूजा भी पूरी है। इसके लिए किसी से कुछ खरीदने की ज़रूरत नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

भाई दूज की पूजा एक छोटी-सी, आत्मीय रस्म है: बहन भाई के माथे पर टीका लगाती है, उसकी आरती उतारती है, अपने हाथ से बना भोजन कराती है, और बदले में भाई का उपहार और साथ निभाने का वचन पाती है। संक्षेप में: सुबह थाली सजाएँ, भाई को उत्तर या पूर्व की ओर मुँह करके बिठाएँ, रोली-चावल का टीका लगाएँ, घर की रीत हो तो कलावा बाँधें, दीये से आरती उतारें, मीठा खिलाएँ, फिर भोजन कराएँ और उपहार स्वीकार करें।

दिन और आपके शहर में द्वितीया का नियम भाई दूज की तिथि वाले पृष्ठ पर है; यहाँ नहीं दोहराया गया, क्योंकि यह हर साल बदलता है।

सामग्री: क्या तैयार रखें

  • एक थाली, उसमें रोली या कुमकुम और घोलने को थोड़ा पानी
  • टीके पर लगाने को अक्षत, यानी साबुत चावल
  • घी का छोटा दीया और माचिस
  • कुछ फूल या छोटी माला
  • पहला कौर खिलाने को मिठाई, और सूखा गोला या पूरा नारियल, जो बहुत-से घरों में भाई को दिया जाता है
  • घर की रीत हो तो कलावा
  • उत्तर भारत के बहुत-से घरों में थाली पर पान का पत्ता, सुपारी और एक सिक्का
  • भाई के बैठने को साफ़ आसन: छोटी चौकी, चटाई या गद्दी
  • बहन के हाथ का भोजन: जो भाई को पसंद हो, और बहुत-से घरों में पूरी, खीर, सूखी सब्ज़ी और दाल
  • बंगाल के लिए: फोंटा को चंदन, काजल, दही और दूब

इनमें कुछ भी नया लाने की ज़रूरत नहीं। स्टील की थाली, चुटकी भर रोली और थोड़े-से चावल से पूरी थाली बन जाती है।

पूजा का क्रम

  1. सुबह। बहन नहाकर थाली सजाती है। उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ घरों में पहले ज़मीन पर चावल के आटे से छोटा चौक पूरा जाता है, या यम-यमुना की सादी आकृति बनाकर रोली-चावल से पूजी जाती है।
  2. कथा। बहुत-सी बहनें थाली सजाते समय, भाई के आने से पहले, भाई दूज की कथा पढ़ या सुन लेती हैं।
  3. भाई का स्वागत। भाई आए तो उसके हाथ-पाँव धुलाएँ और उत्तर या पूर्व की ओर मुँह करके आसन पर बिठाएँ। बहुत-से घरों में भाई सिर पर रूमाल रख लेता है।
  4. टीका। अनामिका उंगली रोली में डुबोकर माथे पर ऊपर की ओर टीका लगाएँ और उस पर अक्षत के कुछ दाने चिपका दें। कुछ बहनें अँगूठे से टीका करती हैं। कुछ घरों में भाई की माँग में भी ज़रा-सी रोली लगाई जाती है।
  5. कलावा और नारियल। घर में कलावा बाँधने की रीत हो तो अभी दाहिनी कलाई पर बाँधें। गोला, पान और सुपारी भाई के हाथ में रखें।
  6. आरती। दीया जलाकर भाई के सामने धीरे-धीरे घुमाएँ, प्रायः दाईं ओर से, और अपने शब्दों में उसकी लंबी उम्र, सेहत और ख़ुशी की प्रार्थना करें।
  7. पहला मीठा। अपने हाथ से भाई को मिठाई का एक कौर खिलाएँ। बहुत-से भाई बदले में बहन का मुँह मीठा कराते हैं।
  8. आशीर्वाद और उपहार। छोटे भाई बहन के पाँव छूते हैं, बड़े भाई आशीर्वाद देते हैं। भाई अपना उपहार देता है — रुपये, कपड़े, गहना, या कुछ मन से चुना हुआ।
  9. भोजन। अपने हाथ का बना खाना परोसें और साथ बैठकर खाएँ। इस दिन का असली मन यही है।

समय कैसे देखें

टीका द्वितीया तिथि में होता है, और ज़्यादातर परिवार दोपहर बाद के समय, जिसे पुराने ग्रंथ अपराह्न कहते हैं, को अच्छा मानते हैं। किसी साल द्वितीया जल्दी ख़त्म हो रही हो तो पंचांग में देख लें कि वह कब तक है। अच्छी घड़ी चुनने वाले परिवार अपने शहर का चौघड़िया देखते हैं, और बहुत-से लोग टीके के लिए राहुकाल टालते हैं। जहाँ भाई की ट्रेन या उड़ान ही समय तय करे, वहाँ मिलना घड़ी से ज़्यादा मायने रखता है।

घरों में निभाई जाने वाली रीतें

ये रीतें हैं, शर्तें नहीं; आपके घर का अपना तरीका सबसे पहले है।

  • बहुत-सी बहनें टीका होने तक कुछ नहीं खातीं; कुछ हल्का नाश्ता कर लेती हैं।
  • बहुत-से घरों में भाई इस दिन अपने घर नहीं, बहन के घर भोजन करता है, चाहे पास ही रहता हो।
  • कुछ घरों में शाम को यम के नाम का एक दीया दक्षिण की ओर जलाया जाता है।
  • जो भाई आ नहीं पाते, वे उपहार पहले भेज देते हैं, और बहन बदले में मिठाई भेजती है।
  • जिन घरों में भाई नहीं, वहाँ बहनें चचेरे-ममेरे भाई, घर के दामाद या किसी अपने को टीका करती हैं।
  • कुछ बहनें टीके वाला गोला साल भर पूजा-घर में रखती हैं।

मथुरा का यमुना स्नान

मथुरा में इस दिन भाई-बहन विश्राम घाट पर आकर साथ में यमुना स्नान करते हैं — कथा में यमुना जी की माँगी हुई बात की याद में। स्नान के बाद बहुत-से लोग घाट के पास यम-यमुना के छोटे मंदिर में दर्शन करते हैं। घाटों पर भीड़ बहुत होती है; बुज़ुर्गों और छोटे बच्चों के साथ जाने वाले परिवार अक्सर जल्दी पहुँचते हैं, साथ बने रहते हैं, और पानी में एक-दूसरे का हाथ थामे रहते हैं।

अलग-अलग प्रदेशों में

  • बंगाल (भाई फोंटा): बहनें फोंटा होने तक उपवास रखती हैं, चंदन, काजल और दही से फोंटा लगाती हैं, भाई के सिर पर दूब और धान रखती हैं और छोटी-सी तुकबंदी कहती हैं। फिर भरपूर भोजन और उपहार।
  • महाराष्ट्र और गोवा (भाऊबीज): भाई पाट पर बैठता है, पास में रंगोली; बहन आरती करके बासुंदी-पूरी या श्रीखंड खिलाती है।
  • गुजरात (भाई बीज): भाऊबीज जैसा ही, बहन के घर परिवार का भोजन।
  • नेपाल और पहाड़ (भाई टीका): तिहार के आख़िरी दिन सात रंगों का टीका, मखमली फूलों की माला, और भाई के चारों ओर तेल का घेरा।
  • कायस्थ परिवार: बहुत-से घरों में इसी दिन कलम, दवात और बही-खाते के साथ चित्रगुप्त पूजा होती है।

पूजा के बाद

मिठाई सबमें बाँटें, रीत हो तो गोला पूजा-घर में रख दें, और दिन अगर भरपेट भोजन और दोपहर की झपकी पर ख़त्म हो, तो वह भी इसी पर्व का हिस्सा है। भाई-बहन का दूसरा दिन रक्षा बंधन है, और एक दिन पहले गोवर्धन पूजा थी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भाई दूज की थाली में क्या रखते हैं?

रोली या कुमकुम, अक्षत, दीया, कुछ फूल, मिठाई, सूखा गोला या नारियल, और बहुत-से घरों में कलावा, पान का पत्ता और सुपारी। बंगाल में फोंटा के लिए थाली में चंदन, काजल और दही भी होता है।

भाई दूर हो तो भाई दूज कैसे करें?

बहुत-सी बहनें वीडियो पर टीका कर लेती हैं, भाई की तस्वीर पर टीका लगाती हैं, या उसके नाम से पूजा करके मिठाई भेज देती हैं। जिनके भाई नहीं, वे चचेरे-ममेरे भाई या भाई जैसे किसी अपने को टीका करती हैं।

क्या बहन भाई दूज पर व्रत रखती है?

बहुत-से घरों में बहन टीका होने तक कुछ नहीं खाती और पहले भाई को खिलाती है। यह घर की रीत है, कोई विधिवत व्रत नहीं; भाई को आने में देर हो तो किसी से भूखे रहने की अपेक्षा नहीं की जाती।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, हरियाणा और मध्य प्रदेश के घरों की परंपरा
  • बंगाल (भाई फोंटा), महाराष्ट्र (भाऊबीज) और नेपाल (भाई टीका) की क्षेत्रीय रीतें
  • यम द्वितीया पर मथुरा के विश्राम घाट की परंपरा

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति