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पूजा विधि · नवरात्रि

नवरात्रि पूजा विधि: घटस्थापना, व्रत और कन्या पूजन

नवरात्रि की पूजा विधि घर पर: कलश और जौ के साथ घटस्थापना, हर दिन की देवी की पूजा, व्रत के नियम, अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन और पारण।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यह घर पर पूजा करने का आम तरीका है। आपके परिवार की रीति सबसे पहले है: क्षेत्र के हिसाब से क्रम, सामग्री और शब्द बदलते हैं, और मन से की गई सादी पूजा भी पूरी है। इसके लिए किसी से कुछ खरीदने की ज़रूरत नहीं।

इस पृष्ठ पर

नवरात्रि की पूजा पहले दिन घटस्थापना से शुरू होती है — कलश की स्थापना और मिट्टी में जौ बोना — फिर हर दिन माँ दुर्गा के एक रूप की पूजा होती है, और अंत में कन्या पूजन, हवन और व्रत के पारण से नौ दिन पूरे होते हैं। संक्षेप में: प्रतिपदा को सही समय पर कलश बिठाएँ, दीया जलाएँ, सुबह-शाम उस दिन की देवी को पूजें, जैसा घर का नियम हो वैसा व्रत रखें, अष्टमी या नवमी को कन्याओं का पूजन करें, और पारण के बाद जौ का विसर्जन करें।

तिथियाँ और आपके शहर में घटस्थापना का समय शारदीय नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि के पृष्ठों पर हैं, और आठवें-नौवें दिन दुर्गा अष्टमी और महानवमी पृष्ठों पर। यहाँ समय नहीं दिए गए, क्योंकि वे हर साल और हर शहर में बदलते हैं।

पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें

  • तांबे, पीतल या मिट्टी का कलश, साफ़ जल, और हो तो थोड़ा गंगाजल
  • कलश के भीतर डालने को एक सिक्का, सुपारी, थोड़े अक्षत और दूर्वा या फूल
  • कलश के मुँह पर रखने को आम के पाँच या सात पत्ते
  • जटा वाला नारियल, लाल कपड़े या चुनरी में लिपटा और मौली से बँधा
  • मिट्टी का चौड़ा पात्र या कुंडा, साफ़ मिट्टी, और बोने के लिए मुट्ठी भर जौ
  • माँ दुर्गा का चित्र या छोटी मूर्ति, चौकी, और उस पर बिछाने को लाल कपड़ा
  • माँ के श्रृंगार के लिए लाल चुनरी, चूड़ियाँ, बिंदी और सिंदूर
  • रोली, हल्दी, अक्षत, फूल (ख़ासकर लाल), माला, धूप या अगरबत्ती
  • घी या तेल का दीया; अखंड ज्योति रखनी हो तो काँच की चिमनी वाला पीतल का बड़ा दीया
  • फल, मिठाई और रोज़ का भोग; कन्या पूजन के लिए हलवा, पूरी और काले चने
  • पाठ करते हों तो दुर्गा सप्तशती की पुस्तक, और घर में गाई जाने वाली आरती

इनमें कुछ भी महँगा होना ज़रूरी नहीं। स्टील का लोटा भी कलश बन सकता है, और छपा हुआ चित्र भी मूर्ति जितना ही प्रिय है।

पूजा का क्रम

  1. घर और पूजा का कोना साफ़ करें। एक दिन पहले बहुत-से परिवार पूरे घर की सफ़ाई करते हैं और पूजा का स्थान धोते हैं।
  2. प्रतिपदा को स्नान और संकल्प। घटस्थापना के समय में नहाकर चौकी के सामने बैठें और दाएँ हाथ में जल लें। अपने शब्दों में कहें कि आप नौ दिन नवरात्रि का व्रत रख रहे हैं, या जैसा भी आपने तय किया है। जल छोड़ दें।
  3. पहले गणेश जी। गणेश जी को रोली, अक्षत और फूल चढ़ाकर प्रार्थना करें कि नौ दिन निर्विघ्न बीतें।
  4. जौ बोएँ। पात्र में मिट्टी फैलाएँ और उस पर जौ बिखेर दें। पानी के छींटे दें। ये अंकुर, जिन्हें जवारे या खेत्री कहते हैं, रोज़ हल्का-सा सींचे जाते हैं और नवमी तक हरे-भरे हो जाते हैं।
  5. कलश स्थापित करें। कलश पर रोली से स्वस्तिक बनाएँ और गले में मौली बाँधें। उसमें जल भरें और सिक्का, सुपारी, अक्षत और दूर्वा डालें। मुँह पर आम के पत्ते सजाएँ और ऊपर नारियल रखें। कलश को जौ के पात्र के ऊपर या पास में रखें।
  6. देवी का आवाहन। चौकी पर माँ का चित्र रखें। हाथ जोड़कर उनसे नौ दिन कलश और चित्र में विराजने की विनती करें। चुनरी, श्रृंगार, फूल, रोली और अक्षत चढ़ाएँ।
  7. दीया जलाएँ। दीया जलाएँ। घर में अखंड ज्योति की रीति हो तो उसे अभी जलाया जाता है।
  8. उस दिन की देवी की पूजा। पहले दिन शैलपुत्री से लेकर नौवें दिन सिद्धिदात्री तक, उस दिन की देवी का स्मरण करें, नवरात्रि की कथा में से उनकी कथा सुनें और भोग लगाएँ।
  9. पाठ। बहुत-से लोग रोज़ दुर्गा सप्तशती के कुछ अध्याय पढ़ते हैं, या नौ दिनों में पूरा पाठ करते हैं; कुछ केवल देवी कवच पढ़ते हैं, या बस "ॐ दुं दुर्गायै नमः" का जाप करते हैं। फिर आरती गाएँ, अक्सर जय अम्बे गौरी।
  10. बाकी दिनों में। सुबह-शाम जौ को पानी दें, ताज़े फूल और भोग चढ़ाएँ, पाठ करें और आरती गाएँ।
  11. अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन। छोटी कन्याओं को घर बुलाएँ, आम तौर पर नौ, और अक्सर साथ में एक छोटा बालक लांगुर या भैरव के रूप में। उनके पैर धोएँ, कलाई पर मौली बाँधें, तिलक लगाएँ, हलवा-पूरी-चने खिलाएँ और छोटा-सा उपहार दें। देवी मानकर उनके पैर छुएँ।
  12. हवन और पारण। बहुत-से घरों में नवमी को छोटा-सा हवन होता है। व्रत कन्या पूजन और हवन के बाद, या दशमी की सुबह खोला जाता है — जैसी घर की रीति हो।
  13. विदाई। दशमी को कलश का जल पूरे घर में छिड़का जाता है, नारियल प्रसाद में बँटता है, और जौ नदी, तालाब या बगीचे में विसर्जित किए जाते हैं; कुछ हरे अंकुर पूजा के स्थान पर रख लिए जाते हैं या आशीर्वाद मानकर कान के पीछे लगाए जाते हैं।

समय कैसे देखें

सबसे ज़रूरी समय प्रतिपदा की सुबह घटस्थापना का है; हर शहर के लिए यह तिथि वाले पृष्ठों पर दिया है, साथ में दोपहर का वह समय भी जिसे कई परंपराएँ सुबह उपयुक्त न होने पर मानती हैं। अष्टमी और नवमी तिथि के बदलने के साथ बदलती हैं, इसलिए कन्या पूजन और संधि पूजा के लिए परिवार दुर्गा अष्टमी और महानवमी के पृष्ठ देखते हैं। हवन और पारण के लिए चौघड़िया और मुहूर्त पृष्ठ काम आते हैं।

परिवारों के रीति-रिवाज

इनमें से कोई बात पूजा की शर्त नहीं; आपके घर का तरीका सबसे पहले है।

  • व्रत कई तरह से रखा जाता है: नौ दिन फल और दूध पर, दिन में एक बार फलाहारी भोजन, केवल पहला और आख़िरी दिन, या केवल अष्टमी। अनाज, प्याज़ और लहसुन से आम तौर पर परहेज़ होता है, और साधारण नमक की जगह सेंधा नमक। गर्भवती, मधुमेह वाले, बीमार और बुज़ुर्ग हल्का व्रत रखें या न रखें; डॉक्टर की सलाह सबसे पहले।
  • अखंड ज्योति कुछ परिवारों की रीति है, अनिवार्य नहीं। रखें तो धातु की थाली पर, काँच की चिमनी के नीचे, पर्दों और कपड़ों से दूर रखें, घी या तेल ख़त्म होने से पहले भर दें, और बंद घर में उसे अकेला न छोड़ें। सुबह-शाम जलाया गया दीया भी पूरी नवरात्रि है।
  • बहुत-से घरों में नौ दिन बाल और नाख़ून नहीं काटे जाते, और घर का माहौल सादा और शांत रखा जाता है।
  • कुलदेवी की रीति के अनुसार कुछ घरों में कन्या पूजन अष्टमी को होता है और कुछ में नवमी को।

प्रांतों के अपने ढंग

  • उत्तर भारत: घर में कलश और जवारे, कन्या पूजन, शाम को रामलीला, और दशहरे पर रावण का पुतला दहन।
  • गुजरात: हर रात गरबो — भीतर दीया जलते मिट्टी के घड़े — के चारों ओर गरबा और डांडिया।
  • बंगाल, असम और ओडिशा: षष्ठी से दशमी तक पंडालों में दुर्गा पूजा, अष्टमी-नवमी के संधि काल में संधि पूजा, और आख़िरी दिन सिंदूर खेला।
  • तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश: घरों में सीढ़ियों पर गुड़ियों की सजावट — गोलू, बोम्बे हब्बा या बोम्मला कोलुवु — और नवमी को आयुध पूजा, जिसमें औज़ारों और पुस्तकों की पूजा होती है।
  • चैत्र नवरात्रि इसी ढंग से मनाई जाती है और रामनवमी पर पूरी होती है; उत्तर भारत, हिमाचल और जम्मू में इसका ख़ास महत्व है।

पूजा के बाद

प्रसाद और नारियल सबमें बाँटें। शारदीय नवरात्रि के अगले दिन दशहरा है। देवी का साप्ताहिक व्रत रखना हो तो संतोषी माता की कथा देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

घर पर घटस्थापना कैसे करें?

पहले दिन सुबह मिट्टी की परत में जौ बोए जाते हैं, और उसके ऊपर या पास में जल भरा कलश रखा जाता है, जिसमें सिक्का, सुपारी और आम के पत्ते होते हैं, और ऊपर लाल कपड़े में लिपटा नारियल। कलश में देवी का आवाहन होता है और नौ दिन वहीं पूजा होती है।

नवरात्रि के व्रत में क्या खा सकते हैं?

हर घर का नियम अलग है। आम तौर पर फल, दूध, दही, कुट्टू और सिंघाड़े का आटा, समा के चावल, साबूदाना, आलू और सेंधा नमक लिया जाता है; अनाज, प्याज़ और लहसुन नहीं। गर्भवती, बीमार और बुज़ुर्ग सामान्य भोजन करें या हल्का व्रत रखें; डॉक्टर की सलाह सबसे पहले।

नवरात्रि का व्रत कब खोलते हैं?

नौ दिन का व्रत रखने वाले ज़्यादातर नवमी को कन्या पूजन और हवन के बाद, या दशमी की सुबह व्रत खोलते हैं। जो पहले और आख़िरी दिन, या केवल अष्टमी का व्रत रखते हैं, वे उसी दिन पूजा के बाद पारण करते हैं।

क्या चैत्र और शारदीय नवरात्रि की पूजा एक जैसी है?

हाँ। घटस्थापना, नौ रूपों की रोज़ की पूजा, व्रत और कन्या पूजन दोनों में एक जैसे हैं। चैत्र नवरात्रि रामनवमी पर पूरी होती है, और शारदीय नवरात्रि के अगले दिन दशहरा आता है।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, पंजाब, हिमाचल, मध्य प्रदेश, गुजरात और बंगाल के घरों की रीति
  • हिंदी की नवरात्रि पूजा पुस्तकें, घटस्थापना और कन्या पूजन के क्रम के लिए

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति