शरद पूर्णिमा की पूजा आश्विन की पूर्णिमा को शाम और रात में होने वाला लक्ष्मी जी और चंद्रमा का पूजन है, जिसके बाद चाँदनी में खीर रखी जाती है और प्रसाद के रूप में खाई जाती है। संक्षेप में: शाम ढलते घर साफ़ करके दीये जलाएँ, लक्ष्मी जी की पूजा करें (बहुत-से घरों में साथ में विष्णु जी की भी), उगते चाँद को अर्घ्य दें, खीर खुले आसमान के नीचे रखें, जितनी देर आराम से जाग सकें जागें, और खीर देर रात या अगली सुबह नहाकर सबमें बाँटें।
आपके शहर के लिए पूर्णिमा की रात और चंद्रोदय का समय शरद पूर्णिमा की तिथि वाले पृष्ठ और शहरवार चंद्रोदय पर है। यहाँ वे समय नहीं लिखे गए, क्योंकि वे साल और जगह के साथ बदलते रहते हैं।
पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें
- लक्ष्मी जी का चित्र या छोटी मूर्ति, और अगर घर में साथ पूजते हों तो विष्णु जी या कान्हा का चित्र
- चौकी या पटरा, उस पर लाल, गुलाबी या सफ़ेद कपड़ा
- रोली या कुमकुम, हल्दी, अक्षत, कुछ फूल — सफ़ेद फूल या कमल मिल जाए तो अच्छा
- घी या तेल के दीये: एक पूजा के लिए और कुछ दरवाज़े, आँगन और छत के लिए
- धूप-अगरबत्ती, और अगर घर में चलन हो तो कपूर
- चाँद को अर्घ्य देने के लिए साफ़ जल से भरा लोटा; चाहें तो उसमें थोड़ा दूध, चावल और एक सफ़ेद फूल
- खीर: चावल, गाढ़ा दूध, चीनी या गुड़, इलायची और थोड़े मेवे; बहुत-से घरों में चाँदी, स्टील या मिट्टी का कटोरा
- बाहर रखी खीर ढकने के लिए महीन सूती कपड़ा या जाली
- भोग के लिए बताशे, मखाने, नारियल या मिठाई
- महाराष्ट्र और गुजरात की कोजागिरी के लिए केसर, चीनी, बादाम-पिस्ता वाला दूध, या दूध-पौआ
- कथा सुनते समय हाथ में रखने को चावल या गेहूँ के कुछ दाने
इनमें कुछ भी खास होना ज़रूरी नहीं। साफ़ स्टील का कटोरा भी चाँदी जितना ही अच्छा है, और लक्ष्मी जी का छपा चित्र पीतल की मूर्ति जितना ही प्रिय।
पूजा का क्रम
- सुबह। स्नान करें और अगर व्रत रख रहे हैं तो अपने शब्दों में संकल्प लें कि घर के सुख-मंगल के लिए पूर्णिमा का व्रत रख रहे हैं। जो व्रत नहीं रख रहे, वे बस छोटी-सी प्रार्थना से दिन शुरू करें।
- सफ़ाई और सजावट। दिन में घर बुहारें, देहरी धोएँ और रंगोली या अल्पना बनाएँ; बहुत-से परिवार चावल के घोल से भीतर की ओर आते लक्ष्मी जी के छोटे-छोटे पैर बनाते हैं।
- साँझ के दीये। सूरज ढलते ही दरवाज़े, आँगन और छत पर दीये जलाएँ। कोजागिरी के भाव में घर रात भर रोशन रखा जाता है।
- पूजा की तैयारी। चौकी पर कपड़ा बिछाकर लक्ष्मी जी का चित्र या मूर्ति रखें, और घर की रीति हो तो पास में विष्णु जी या कान्हा को। जल का कलश या लोटा, दीया और भोग पास में रखें।
- पहले गणेश जी। गणेश जी को रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएँ, फिर लक्ष्मी पूजन शुरू करें।
- लक्ष्मी पूजन। लक्ष्मी जी को हल्दी, कुमकुम, अक्षत, फूल, धूप और दीप अर्पित करें, और बताशे, मखाने या मिठाई का भोग लगाएँ। "ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः" जैसा छोटा नाम-मंत्र जपा जा सकता है; बहुत-से घरों में लक्ष्मी जी की आरती भी गाई जाती है।
- कथा सुनें। हाथ में कुछ दाने लेकर शरद पूर्णिमा व्रत कथा सुनें — दो बहनों की और लक्ष्मी जी के प्रश्न की कथा।
- चाँद को अर्घ्य। चाँद निकलकर साफ़ दिखने लगे तो लोटा लेकर छत या आँगन में जाएँ। कथा वाले दानों के साथ धीरे-धीरे चाँद की ओर जल चढ़ाएँ और मन में प्रार्थना करें। जिन्होंने व्रत रखा है, वे इसके बाद व्रत खोलें।
- खीर रखें। खीर का कटोरा वहाँ रखें जहाँ उस पर चाँदनी पड़े — छत, बालकनी या खुला आँगन। धूल, कीड़ों और चिड़ियों से बचाने के लिए उसे महीन कपड़े या जाली से ढक दें। बहुत-से घर पहले थोड़ी खीर लक्ष्मी जी और चंद्रमा को अर्पित करते हैं।
- रात। साथ बैठें, बातें करें, भजन गाएँ या कोई शांत खेल खेलें, जैसा कोजागिरी वाले घरों में होता है। बहुत-से घरों में आधी रात के आसपास नए दीयों के साथ लक्ष्मी जी की एक छोटी पूजा फिर से होती है।
- प्रसाद। खीर भीतर लाकर पूजा के स्थान पर एक बार फिर भोग लगाएँ और देर रात या अगली सुबह नहाकर प्रसाद बाँटें। गर्म या उमस भरी जगहों में खीर उसी रात खा लें या ठंडी जगह रख दें; उसे दोपहर तक बाहर न छोड़ें।
समय कैसे देखें
इस रात दो घड़ियाँ काम की हैं: चंद्रोदय, अर्घ्य और खीर रखने के लिए; और आधी रात, जब कोजागिरी वाले घर लक्ष्मी पूजन करते हैं। अलग-अलग शहरों में चाँद कुछ मिनट आगे-पीछे निकलता है, इसलिए अपने शहर का समय शहरवार चंद्रोदय पर देखें। तिथि वाले पृष्ठ पर यह भी समझाया गया है कि किसी-किसी साल कोजागिरी का जागरण और शरद पूर्णिमा अलग-अलग दिन क्यों पड़ते हैं — यह इस पर निर्भर है कि आधी रात को पूर्णिमा है या नहीं। अगर आपके घर में शाम की पूजा किसी खास मुहूर्त में शुरू होती है, तो अपने शहर का पंचांग तिथि और दिन के भाग बता देगा।
परिवारों के रीति-रिवाज
ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; आपके घर की अपनी रीति सबसे पहले है।
- बहुत-से लोग इस रात सफ़ेद या हल्के रंग पहनते हैं, चाँदनी से मेल खाते।
- घर रात भर साफ़ और रोशन रखा जाता है, और मुख्य द्वार अक्सर लक्ष्मी जी के लिए थोड़ा खुला छोड़ा जाता है।
- कुछ घरों में पूर्णिमा को सिलाई-कढ़ाई नहीं होती, और दिन कलह से दूर रखा जाता है।
- बहुत-सी दादी-नानी चाँदनी में सुई में धागा पिरोने को कहती हैं; मान्यता है कि इससे आँखों को लाभ होता है।
- कोई खीर चाँदी के कटोरे में रखता है, कोई मिट्टी के बर्तन में।
- व्रत रखने वाले दिन भर पानी, दूध और फल लेते हैं; गर्भवती, बीमार और बुज़ुर्ग लोग बिना व्रत के शाम की पूजा कर लें, और डॉक्टर की सलाह सबसे पहले।
प्रांतों के अपने ढंग
- उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार: पूर्णिमा का व्रत, दो बहनों की कथा, चाँद को अर्घ्य और छत पर खीर।
- ब्रज: वृंदावन और मथुरा के मंदिरों में रासलीला और सफ़ेद श्रृंगार के दर्शन।
- महाराष्ट्र: कोजागिरी पूर्णिमा — खुले में केसर वाला दूध औटाया जाता है और उसमें चाँद की परछाईं देखकर पिया जाता है; बहुत-से घरों में इस रात घर की पहली संतान की आरती उतारी जाती है।
- गुजरात: शरद पूनम — देर रात तक गरबा और चाँदनी में दूध-पौआ।
- बंगाल, असम और त्रिपुरा: कोजागरी लक्ष्मी पूजा, साल की मुख्य लक्ष्मी पूजा, अल्पना और रात भर जागरण के साथ।
- ओडिशा: कुमार पूर्णिमा, जब कुँवारी लड़कियाँ कुमार यानी कार्तिकेय और चंद्रमा की पूजा करती हैं, और शाम खेल-गीतों में बीतती है।
- मिथिला: कोजागरा, नए दूल्हे के लिए खास दिन, जब ससुराल से मखाना, पान और उपहार आते हैं।
पूजा के बाद
खीर पड़ोसियों और घर आने वाले हर व्यक्ति में बाँटें। बहुत-से परिवार अगले दिन से कार्तिक मास का दीपदान और भोर का स्नान शुरू करते हैं। हर महीने की पूर्णिमा पर होने वाली पूजा की कथा सत्यनारायण कथा है, और उत्तर भारत में सुहागिनों का अगला व्रत करवा चौथ है।