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पूजा विधि · जन्माष्टमी

जन्माष्टमी पूजा विधि: व्रत, पालना और आधी रात का अभिषेक

जन्माष्टमी पूजा विधि घर पर: आधी रात तक का व्रत, सामग्री की सूची, झूला सजाना, निशीथ काल में लड्डू गोपाल का पंचामृत अभिषेक, भोग और दही हांडी।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यह घर पर पूजा करने का आम तरीका है। आपके परिवार की रीति सबसे पहले है: क्षेत्र के हिसाब से क्रम, सामग्री और शब्द बदलते हैं, और मन से की गई सादी पूजा भी पूरी है। इसके लिए किसी से कुछ खरीदने की ज़रूरत नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

जन्माष्टमी पर दिन भर व्रत रखकर आधी रात को पूजा होती है, जिसमें बाल कृष्ण यानी लड्डू गोपाल को पंचामृत से नहलाकर नए कपड़े पहनाए जाते हैं, सजे हुए पालने में बिठाया जाता है और माखन-मिश्री का भोग लगाया जाता है। थोड़े में: सुबह संकल्प लें, आधी रात तक व्रत रखें, शाम को झूला सजाएँ, रात गहराने पर भजन और कथा करें, निशीथ काल में अभिषेक और आरती करें, फिर प्रसाद बाँटकर व्रत खोलें।

व्रत का दिन, स्मार्त और वैष्णव तिथि और आपके शहर का निशीथ काल जन्माष्टमी की तिथि वाले पृष्ठ पर है। समय यहाँ दोबारा नहीं लिखे गए, क्योंकि वे शहर और साल के साथ बदलते हैं।

पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें

  • लड्डू गोपाल (बाल गोपाल) की मूर्ति या बालकृष्ण का चित्र
  • छोटा झूला या पालना, सजाने को फूल, पत्ते, छोटी घंटियाँ और नरम गद्दी
  • लड्डू गोपाल के नए कपड़े (छोटी पोशाक), मुकुट, बाँसुरी, मोरपंख और माला
  • पंचामृत के लिए दूध, दही, घी, शहद और शक्कर; साथ में गंगाजल और सादा जल
  • नहलाने के लिए कटोरा या छोटी परात, और पोंछने के लिए मुलायम कपड़ा
  • तुलसीदल, एक दिन पहले तोड़े हुए
  • चंदन, कुमकुम, अक्षत, पीले और ख़ुशबूदार फूल
  • घी का दीया, धूप, कपूर, शंख और घंटी
  • माखन-मिश्री: ताज़ा सफ़ेद मक्खन और मिश्री
  • धनिये की पंजीरी: घी में भुना धनिया पाउडर, शक्कर और मेवे के साथ, व्रत का पारंपरिक प्रसाद
  • फल, उत्तर के बहुत-से घरों में ख़ासकर खीरा, और दूध की मिठाइयाँ
  • झाँकी बनानी हो तो छोटे खिलौने, यमुना के लिए नीला कपड़ा और शेषनाग के लिए खिलौने वाला साँप

पूजा का क्रम

  1. सुबह स्नान और संकल्प। नहाकर हाथ में थोड़ा जल लेकर अपने शब्दों में संकल्प लें कि आप श्रीकृष्ण के लिए आधी रात के जन्म तक जन्माष्टमी का व्रत रख रहे हैं।
  2. दिन भर। जैसा व्रत तय किया है वैसा रखें (नीचे देखें)। घर और पूजा का कोना साफ़ करें; बहुत-से घरों में देहरी धोकर भीतर आते हुए नन्हे पैरों के निशान बनाए जाते हैं।
  3. पालना सजाएँ। दोपहर या शाम को झूले को फूलों और पत्तों से सजाएँ, और झाँकी बनानी हो तो वह भी। नए कपड़े और भोग की चीज़ें पास रख लें।
  4. शाम। साँझ को दीया जलाकर छोटी-सी आरती करें। बहुत-से परिवार इस समय कृष्ण मंदिर हो आते हैं।
  5. भजन और कथा। रात गहराने पर परिवार को इकट्ठा करें। भजन गाएँ और जन्माष्टमी की कथा पढ़ें, इस तरह कि जन्म वाला प्रसंग आधी रात के पास आए।
  6. जन्म, निशीथ काल में। निशीथ काल शुरू होते ही शंख बजाएँ, घंटी बजाएँ, और लड्डू गोपाल को नहलाने वाले कटोरे में रखें।
  7. अभिषेक। पहले जल से, फिर एक-एक करके दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से, या मिले हुए पंचामृत से नहलाएँ, और अंत में गंगाजल और सादे जल से। पंचामृत प्रसाद के लिए अलग रख लें। फिर हल्के हाथ से पोंछें।
  8. श्रृंगार। नए कपड़े पहनाएँ, मुकुट, माला और बाँसुरी लगाएँ, थोड़ा चंदन लगाएँ, और पालने में बिठा दें।
  9. भोग। माखन-मिश्री, धनिये की पंजीरी, फल और मिठाई का भोग लगाएँ, हर चीज़ पर एक तुलसी का पत्ता रखकर।
  10. आरती और झूला। आरती गाएँ, बहुत-से घरों में "आरती कुंजबिहारी की", और परिवार का हर सदस्य बारी-बारी से पालना झुलाए। कई घरों में इसी समय बधाई के गीत गाए जाते हैं।
  11. व्रत खोलना। पंचामृत और प्रसाद बाँटें। ज़्यादातर परिवार आधी रात की पूजा के बाद व्रत खोलते हैं; कुछ अपनी परंपरा से अगली सुबह सूर्योदय के बाद खोलते हैं।

अपना व्रत कैसे चुनें

  • निर्जल: आधी रात की पूजा तक न अन्न, न जल; कुछ भक्त ऐसे रखते हैं।
  • फलाहार: फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, आलू, और सेंधा नमक के साथ सिंघाड़े या कुट्टू का आटा। यही सबसे आम है।
  • अन्न के बिना: दिन में एक बार व्रत का भोजन, और पूजा तक कोई अनाज नहीं।

बच्चे, गर्भवती महिलाएँ, बीमार और बुज़ुर्ग पानी, फल और दूध के साथ दिन बिताएँ, या बिना व्रत के पूजा करें। डॉक्टर की सलाह सबसे पहले।

समय कैसे देखें

दो बातें देखनी होती हैं। पहली, कौन-सा दिन: स्मार्त पंचांग वह रात लेते हैं जिसकी आधी रात को अष्टमी हो, जबकि इस्कॉन और कई वैष्णव संप्रदाय सूर्योदय की अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र देखते हैं, जो अक्सर एक दिन बाद पड़ता है; तिथि वाला पृष्ठ दोनों को समझाता है। दूसरी, निशीथ काल, यानी रात का आठवाँ मुहूर्त, जो स्थानीय आधी रात के आसपास पड़ता है; अभिषेक इसी में होता है, और यह शहर-शहर में कुछ मिनट आगे-पीछे होता है। अष्टमी और रोहिणी कब लगते और उतरते हैं, यह पंचांग में दिखता है। इस रात चाँद देर से निकलता है, और उत्तर के कुछ घर उसे भी अर्घ्य देते हैं; अपने शहर का समय चंद्रोदय पृष्ठ पर देखें।

परिवारों के रीति-रिवाज

ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; आपके घर की अपनी रीति सबसे पहले है।

  • पूजा तक अनाज नहीं खाया जाता, और बहुत-से घरों में उस दिन रसोई में प्याज़-लहसुन नहीं आता।
  • हर भोग पर तुलसी रखी जाती है, क्योंकि माना जाता है कि कान्हा बिना तुलसी के भोग नहीं लेते।
  • बच्चों को कृष्ण और राधा बनाया जाता है, बाँसुरी और मोरपंख के साथ।
  • उत्तर के कुछ घरों में आधी रात को खीरा काटा जाता है, जन्म के प्रतीक के रूप में।
  • झूला कुछ दिन सजा रहता है, और रोज़ शाम लड्डू गोपाल को झुलाया जाता है।
  • कुछ परिवार अगला दिन नंदोत्सव के रूप में मनाते हैं और नंद बाबा की तरह मिठाई और उपहार बाँटते हैं।

प्रांतों के अपने ढंग

  • मथुरा और वृंदावन: सबसे बड़ा उत्सव; मंदिर रात भर खुले रहते हैं, झाँकियाँ सजती हैं, और अगली सुबह नंदोत्सव होता है।
  • महाराष्ट्र: अगला दिन गोपालकाला है, जब गोविंदाओं की टोलियाँ मानव पिरामिड बनाकर गली के ऊपर ऊँचाई पर टँगी दही की हांडी फोड़ती हैं।
  • गुजरात: द्वारका में रात भर भारी भीड़ रहती है, और बहुत-से घरों में शाम भर खेल और भजन चलते हैं।
  • दक्षिण भारत: गोकुलाष्टमी या श्री जयंती; चावल के आटे से द्वार पर नन्हे पैरों के निशान बनते हैं, और बालक के लिए सीडै और मुरुक्कु जैसी चीज़ें बनती हैं।
  • इस्कॉन के मंदिर वैष्णव दिन पर शाम भर कीर्तन, आधी रात को अभिषेक और बड़ा भोज रखते हैं; दूसरे मंदिरों में छप्पन भोग, यानी छप्पन व्यंजन, चढ़ते हैं।

पूजा के बाद

पंचामृत और पंजीरी घर के सब लोगों और पड़ोसियों में बाँटें। इसके बाद बहुत-से परिवार जो व्रत रखते हैं, वह एकादशी व्रत है, और गोकुल के लिए पर्वत उठाने की कहानी गोवर्धन पूजा की कथा में है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जन्माष्टमी की पूजा कब की जाती है?

मुख्य पूजा निशीथ काल में, यानी आधी रात के आसपास के मुहूर्त में होती है, जब श्रीकृष्ण का जन्म माना जाता है। आपके शहर का समय जन्माष्टमी की तिथि वाले पृष्ठ पर है। जिन घरों में छोटे बच्चे या बुज़ुर्ग हैं, वे कभी-कभी शाम को ही सादी पूजा कर लेते हैं।

जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल को क्या भोग लगाते हैं?

पंचामृत स्नान के बाद माखन-मिश्री, धनिये की पंजीरी, फल और हर भोग पर तुलसी का पत्ता। मंदिरों में छप्पन भोग बनता है, और घरों में वही मिठाइयाँ बनती हैं जो परिवार को प्यारी हों।

कुछ लोग जन्माष्टमी एक दिन बाद क्यों मनाते हैं?

स्मार्त घर वह रात मानते हैं जिसकी आधी रात को अष्टमी हो। इस्कॉन और कई वैष्णव संप्रदाय सूर्योदय की अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र को देखते हैं, जो अक्सर अगले दिन पड़ता है। दोनों अपनी-अपनी परंपरा में सही हैं।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • श्रीमद्भागवत पुराण, श्रीकृष्ण जन्म की रात के बारे में, जैसा व्रत पुस्तकों में संक्षेप में मिलता है
  • ब्रज, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के घरों और मंदिरों की रीति
  • वैष्णव मंदिरों (इस्कॉन, पुष्टिमार्ग) की प्रचलित रीति

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति