त्योहार · 2026
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026 — शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
जन्माष्टमी कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात को हुए श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव है, जिसे व्रत, भजन-कीर्तन और निशीथ काल की पूजा के साथ मनाया जाता है।
2026 में
शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
- तिथि
- कृष्ण अष्टमी (कृष्ण): 4 सितंबर, 02:25 – 5 सितंबर, 00:14
- चांद्र मास
- भाद्रपद (पूर्णिमांत) / श्रावण (अमांत)
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 06:00 / 18:39
| पूजा मुहूर्त | 23:57 – 5 सितंबर, 00:14 |
|---|---|
| निशीथ काल | 23:57 – 5 सितंबर, 00:42 |
| रोहिणी नक्षत्र | 00:29 – 23:04 |
नियम: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (अमांत में श्रावण) जो निशीथ काल में हो — श्रीकृष्ण का अर्धरात्रि जन्म (स्मार्त नियम)।
2027 में
मंगलवार, 24 अगस्त 2027
- तिथि
- कृष्ण अष्टमी (कृष्ण): 24 अगस्त, 20:25 – 25 अगस्त, 19:20
- चांद्र मास
- भाद्रपद (पूर्णिमांत) / श्रावण (अमांत)
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 05:54 / 18:51
| पूजा मुहूर्त | 25 अगस्त, 00:01 – 25 अगस्त, 00:45 |
|---|---|
| निशीथ काल | 25 अगस्त, 00:01 – 25 अगस्त, 00:45 |
| रोहिणी नक्षत्र | 25 अगस्त, 12:28 – 26 अगस्त, 11:42 |
नियम: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (अमांत में श्रावण) जो निशीथ काल में हो — श्रीकृष्ण का अर्धरात्रि जन्म (स्मार्त नियम)।
समय नई दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त से। दूसरे शहरों में मुहूर्त कुछ मिनट खिसकते हैं, और कभी-कभी तिथि एक दिन। पूरा त्योहार कैलेंडर
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी क्या है
जन्माष्टमी श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव है, जिन्हें भक्त भगवान विष्णु का आठवां अवतार मानते हैं। यह कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आती है — उत्तर भारत की गणना में भाद्रपद मास में और पश्चिम व दक्षिण की अमांत गणना में श्रावण मास में। मान्यता है कि श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात को हुआ था, इसलिए मुख्य पूजा निशीथ काल यानी मध्यरात्रि के मुहूर्त में होती है और बहुत से भक्त तब तक जागते हैं।
यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण में है। मथुरा के अत्याचारी राजा कंस ने भविष्यवाणी सुनी कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी, तो उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया। आधी रात को जब कारागार में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तो पहरेदार सो गए और द्वार खुल गए। वसुदेव शिशु को उफनती यमुना पार कर गोकुल ले गए, जहां नंद और यशोदा ने उन्हें पाला।
कई परिवारों के लिए जन्माष्टमी भविष्यवाणी से अधिक उस बालक की याद है — गोकुल का माखनचोर, गोवर्धन उठाने वाला ग्वाला, अर्जुन को गीता सुनाने वाला सखा। आधी रात को घरों में छोटा-सा पालना झुलाया जाता है, मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है और अगले दिन दही हांडी और नंदोत्सव होते हैं। यह भक्ति का पर्व है, जिसे अधिकतर लोग सहज आनंद के रूप में जीते हैं।
कैसे मनाया जाता है
- बहुत से भक्त दिन भर व्रत रखते हैं — कुछ अन्न त्यागकर, कुछ फल-दूध लेकर — और आधी रात की पूजा के बाद या कुछ परंपराओं में अगली सुबह व्रत खोलते हैं।
- घरों और मंदिरों में बाल गोपाल का पालना सजाया जाता है और श्रीकृष्ण के जीवन की झांकियां बनाई जाती हैं।
- निशीथ काल में लड्डू गोपाल को पंचामृत से स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और पालने में बिठाया जाता है।
- शाम से भजन-कीर्तन चलता है और जन्म के क्षण शंख बजाया जाता है।
- भोग में माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी और कई मंदिरों में अनेक व्यंजन चढ़ाए जाते हैं।
- अगले दिन महाराष्ट्र और अन्य जगहों पर गोविंदा टोलियां मानव पिरामिड बनाकर दही हांडी फोड़ती हैं।
- बच्चे कृष्ण और राधा बनते हैं, और स्कूलों व सोसाइटियों में छोटे-छोटे कार्यक्रम होते हैं।
तिथि कैसे तय होती है
जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी है (अमांत गणना में श्रावण)। स्मार्त नियम के अनुसार हमारा पंचांग वह दिन चुनता है जिसकी रात निशीथ काल यानी मध्यरात्रि के मुहूर्त में अष्टमी हो, क्योंकि यही श्रीकृष्ण के जन्म का समय माना जाता है। यदि दोनों रातों में निशीथ काल के समय अष्टमी हो, तो पहली रात ली जाती है।
क्षेत्रीय अंतर
इस पृष्ठ की तिथि स्मार्त नियम के अनुसार है। इस्कॉन और कई वैष्णव संप्रदाय प्रायः अगले दिन जन्माष्टमी मनाते हैं, क्योंकि वे सूर्योदय के समय की अष्टमी (उदया अष्टमी) और रोहिणी नक्षत्र को देखते हैं; इसलिए कुछ वर्षों में पंचांगों में दो तिथियां दिखती हैं और दोनों अपनी-अपनी परंपरा में सही हैं। मथुरा-वृंदावन में यह पर्व सबसे भव्य रूप में मनाया जाता है, महाराष्ट्र में गोकुलाष्टमी की दही हांडी प्रसिद्ध है, और दक्षिण में इसे गोकुलाष्टमी या श्री जयंती कहते हैं, जब द्वार पर बालकृष्ण के नन्हे पदचिह्न बनाए जाते हैं।
तिथियाँ और समय हमारा अपना इंजन गणना करता है (सूर्योदय, तिथि और काल नई दिल्ली के लिए, लाहिड़ी अयनांश)। दूसरे शहर में, या किसी दूसरी परंपरा के पंचांग में, तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने कुल पुरोहित की परंपरा मानें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कुछ वर्षों में जन्माष्टमी की दो तिथियां क्यों होती हैं?
स्मार्त परिवार मध्यरात्रि की अष्टमी देखते हैं, जबकि इस्कॉन और कई वैष्णव संप्रदाय सूर्योदय की अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र देखते हैं, जो प्रायः अगले दिन पड़ती है। दोनों ही स्थापित परंपराएं हैं।
जन्माष्टमी का व्रत कब खोला जाता है?
अधिकतर भक्त निशीथ काल की पूजा के बाद व्रत खोलते हैं; कुछ परंपराओं में अगली सुबह पारण होता है। अपने परिवार या मंदिर की परंपरा का पालन करें।
निशीथ काल क्या है?
यह मध्यरात्रि के आसपास का मुहूर्त है, जिस समय श्रीकृष्ण का जन्म माना जाता है। जन्माष्टमी की मुख्य पूजा इसी समय होती है।