त्योहार · 2027
हरतालिका तीज 2027 — शुक्रवार, 3 सितंबर 2027
हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया का व्रत है, जिसे महिलाएं शिव को पति रूप में पाने के लिए किए गए पार्वती के कठोर तप की स्मृति में रखती हैं।
2026 में
सोमवार, 14 सितंबर 2026
- तिथि
- शुक्ल तृतीया: 13 सितंबर, 07:08 – 14 सितंबर, 07:07
- चांद्र मास
- भाद्रपद
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 06:05 / 18:27
| पूजा मुहूर्त | 06:05 – 07:07 |
|---|---|
| प्रातः काल मुहूर्त | 06:05 – 08:33 |
नियम: सूर्योदय के समय भाद्रपद शुक्ल तृतीया (द्वितीया-युक्त की अपेक्षा चतुर्थी-युक्त तृतीया श्रेष्ठ)।
2027 में
शुक्रवार, 3 सितंबर 2027
- तिथि
- शुक्ल तृतीया: 2 सितंबर, 16:50 – 3 सितंबर, 14:19
- चांद्र मास
- भाद्रपद
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 05:59 / 18:40
| पूजा मुहूर्त | 05:59 – 08:32 |
|---|---|
| प्रातः काल मुहूर्त | 05:59 – 08:32 |
नियम: सूर्योदय के समय भाद्रपद शुक्ल तृतीया (द्वितीया-युक्त की अपेक्षा चतुर्थी-युक्त तृतीया श्रेष्ठ)।
समय नई दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त से। दूसरे शहरों में मुहूर्त कुछ मिनट खिसकते हैं, और कभी-कभी तिथि एक दिन। पूरा त्योहार कैलेंडर
हरतालिका तीज क्या है
हरतालिका तीज वर्षा ऋतु की तीजों में तीसरी और सबसे कठिन तीज है; इससे पहले हरियाली तीज और कजरी तीज आती हैं। यह भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को पड़ती है, जो प्रायः गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले होती है। विवाहित महिलाएं इसे पति की लंबी आयु और घर-परिवार के सुख के लिए रखती हैं, और कई अविवाहित कन्याएं भी अच्छे वर की कामना से यह व्रत रखती हैं, जैसे स्वयं पार्वती ने रखा था।
इस नाम का अर्थ प्रायः ऐसे समझाया जाता है: हरत यानी हर ले जाना और आलिका यानी सखी। व्रत कथा के अनुसार पार्वती के पिता हिमवान ने उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया था, जबकि पार्वती का मन शिव में लगा था। तब उनकी सखियां उन्हें वन में ले गईं ताकि वह विवाह न हो सके। वहां पार्वती ने बालू का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की, निराहार रहीं और रात भर जागरण किया। उनकी दृढ़ता से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें स्वीकार किया। यह दिन उसी पूजा की स्मृति है।
हरतालिका की विशेषता इसका अनुशासन है। बहुत सी महिलाएं इसे निर्जला रखती हैं, यानी सूर्योदय से अगली सुबह तक बिना अन्न और जल के, और रात भर भजन गाकर व कथा सुनकर जागरण करती हैं। जो परिवार इतना कठोर व्रत नहीं रख पाते, या जहां कोई महिला अस्वस्थ, गर्भवती या वृद्ध हो, वहां जल या फल लेकर व्रत को सरल कर लेना आम बात है; व्रत की परंपरा में इसके लिए हमेशा जगह रही है।
इस दिन का भाव केवल तप का नहीं है। महिलाएं हरे या लाल वस्त्र पहनती हैं, नई चूड़ियां और मेहंदी लगाती हैं, और घरों व मंदिरों में इकट्ठी होकर साथ पूजा करती हैं। बहुतों के लिए यह सखियों के मेल और मिलकर गीत गाने का दिन भी है, जो उस पर्व के लिए उचित ही है जिसका नाम ही पार्वती की सहायता करने वाली सखियों से जुड़ा है।
कैसे मनाया जाता है
- व्रत सूर्योदय से आरंभ होता है; बहुत सी महिलाएं निर्जला रहती हैं, जबकि अन्य स्वास्थ्य और कुल की रीति के अनुसार जल या फल ले लेती हैं।
- बालू या मिट्टी से शिव, पार्वती और प्रायः गणेश की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं और फूलों व केले के पत्तों से सजे छोटे मंडप में रखी जाती हैं।
- पूजा प्रायः शाम को प्रदोष काल में होती है, जिसमें बेलपत्र, फूल, सिंदूर और सुहाग की सामग्री पार्वती को अर्पित की जाती है।
- हरतालिका व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाती है, अक्सर कई महिलाएं मिलकर सुनती हैं।
- बहुत सी महिलाएं रात भर जागरण करती हैं, भजन गाती हैं और रात के हर प्रहर में फिर से पूजा करती हैं।
- अगली सुबह अंतिम पूजा के बाद व्रत खोला जाता है और मिट्टी की प्रतिमाओं का जल में विसर्जन किया जाता है।
तिथि कैसे तय होती है
हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया को रखी जाती है, उस दिन जिस दिन सूर्योदय के समय तृतीया हो। यदि तृतीया क्षय हो, यानी एक सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाए और किसी सूर्योदय को न छुए, तो हम वह दिन लेते हैं जिस दिन वह शुरू होती है। शास्त्र यह भी कहते हैं कि इस व्रत के लिए चतुर्थी से जुड़ी तृतीया, द्वितीया से जुड़ी तृतीया से बेहतर मानी जाती है। तिथि और तृतीया के आरंभ व समाप्ति का समय ऊपर दिया गया है।
क्षेत्रीय अंतर
हरतालिका तीज सबसे अधिक उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में मनाई जाती है, और नेपाल में यह तीज पर्व का मुख्य दिन है। महाराष्ट्र में हरतालिका की पूजा पार्वती और उनकी सखी के रूप में होती है और इसके अगले दिन से ही गणेशोत्सव शुरू हो जाता है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में यही तृतीया गौरी हब्बा यानी स्वर्ण गौरी व्रत है, जब गणेश से एक दिन पहले गौरी का स्वागत होता है। यह शुक्ल पक्ष की तिथि है, इसलिए हरतालिका तीज हर पंचांग में — अमांत हो या पूर्णिमांत — भाद्रपद में ही गिनी जाती है। व्रत कितना कठोर हो और जागरण पूरी रात चले या नहीं, यह कुल की रीति पर निर्भर है।
तिथियाँ और समय हमारा अपना इंजन गणना करता है (सूर्योदय, तिथि और काल नई दिल्ली के लिए, लाहिड़ी अयनांश)। दूसरे शहर में, या किसी दूसरी परंपरा के पंचांग में, तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने कुल पुरोहित की परंपरा मानें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हरतालिका तीज और हरियाली तीज में क्या अंतर है?
हरियाली तीज श्रावण शुक्ल तृतीया को पड़ती है और झूलों व गीतों के साथ शिव-पार्वती के मिलन का उत्सव है। हरतालिका तीज एक महीने बाद भाद्रपद शुक्ल तृतीया को आती है और पार्वती के तप की स्मृति है, इसलिए इसमें कठोर व्रत और रात्रि जागरण होता है।
क्या हरतालिका तीज हमेशा निर्जला रखी जाती है?
निर्जला इसका पारंपरिक रूप है, पर एकमात्र रूप नहीं। अस्वस्थ, गर्भवती, वृद्ध या दवा लेने वाली महिलाएं प्रायः जल या फल ले लेती हैं, और कई परिवारों में हमेशा से ऐसे ही व्रत रखा जाता रहा है।
हरतालिका तीज का व्रत कब खोला जाता है?
अगली सुबह सूर्योदय के बाद एक छोटी अंतिम पूजा करके। इसके बाद मिट्टी की प्रतिमाओं का विसर्जन होता है और महिला अन्न ग्रहण करती है, अक्सर पहले परिवार के साथ प्रसाद बांटकर।
क्या अविवाहित कन्याएं हरतालिका तीज रख सकती हैं?
हां। कथा विवाह से पहले शिव के लिए पार्वती की प्रार्थना की है, इसलिए कई परिवारों में अविवाहित कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत रखती हैं, कभी-कभी हल्के रूप में।