हरतालिका तीज व्रत कथा बताती है कि पार्वती ने शिव को ही पति मानने का प्रण किया था, पिता ने जब उनका विवाह विष्णु से तय कर दिया तो सखियाँ उन्हें हरकर वन ले गईं, और वहाँ बालू के शिवलिंग की पूजा, निर्जल व्रत और रात भर के जागरण से उन्होंने शिव को पाया। यह कथा भादों शुक्ल तृतीया को सुनी जाती है, क्योंकि उसी तिथि को पार्वती ने वह पूजा की थी।
तृतीया किस दिन है, तिथि छोटी हो तो दिन कैसे तय होता है, और पूजा का समय हरतालिका तीज की तिथि वाले पृष्ठ पर है; उस दिन की तिथि और नक्षत्र अपने शहर के पंचांग में देखें। यहाँ केवल कथा है, हमारे अपने शब्दों में।
शिव जी ने पार्वती को जो कथा सुनाई
कथा कैलास पर्वत से शुरू होती है। एक दिन पार्वती ने शिव जी से पूछा, "प्रभु, वह कौन-सा व्रत है जिसके पुण्य से मैं आपकी अर्धांगिनी बनी?" शिव जी मुस्कुराए और बोले, "देवी, तुम अपनी ही कहानी भूल गई हो। सुनो, मैं याद दिलाता हूँ।"
पिछले जन्म में तुम पर्वतराज हिमवान और रानी मैना की बेटी बनकर जन्मी थीं। बचपन से ही तुम्हारा मन केवल मुझमें लगा था। छोटी उम्र में ही तुम हिमालय की ढलान पर गंगा के किनारे जाकर तप करने लगीं। तप इतना कठिन था कि पिता से देखा नहीं जाता था। बहुत दिनों तक तुमने केवल पत्ते खाए, फिर पत्ते भी छोड़ दिए, इसी से तुम्हारा नाम अपर्णा पड़ा। गर्मी में तुम अग्नि के बीच बैठीं, जाड़े में ठंडे जल में खड़ी रहीं, और बरसात में खुले आकाश के नीचे।
हिमवान बेटी की यह दशा देखकर दुखी रहते थे। एक दिन नारद मुनि उनके दरबार में आए और बोले, "भगवान विष्णु ने आपकी बेटी का तप देखा है। वे उससे विवाह करना चाहते हैं।" हिमवान फूले न समाए। विष्णु से बड़ा दामाद और कौन हो सकता था? उन्होंने तुरंत हाँ कर दी, और नारद यह संदेश लेकर चले गए।
पार्वती ने यह सुना तो उनका मन टूट गया। उन्होंने तो मन ही मन शिव को वर लिया था। उन्होंने अपनी सबसे प्यारी सखी को सारी बात बताई। सखी ने न समझाया, न डाँटा। उसने झट से उपाय सोचा, एक-दो और सहेलियों को साथ लिया, और सब मिलकर पार्वती को महल से निकालकर घने वन में ले गईं, जहाँ पिता उन्हें ढूँढ न सकें। तीज के नाम का मूल यही है: सखियों यानी आलिका ने पार्वती को हर लिया।
बालू का शिवलिंग
उस वन में नदी किनारे एक गुफा थी। वहीं पार्वती ने अपने तप का अंतिम चरण शुरू किया। भादों के शुक्ल पक्ष की तृतीया आई, और उस दिन चंद्रमा हस्त नक्षत्र में था। पार्वती ने नदी किनारे की बालू से शिवलिंग बनाया। उसे स्नान कराया, वन के फूल-पत्ते चढ़ाए और शिव के भजन गाए। उस दिन उन्होंने न अन्न लिया, न जल। रात आई तो सोईं भी नहीं। सखियाँ साथ बैठीं, और सारी रात दीया जलता रहा और गीत चलते रहे।
उस पूजा की लगन शिव तक पहुँची। कहते हैं कैलास पर उनका आसन डोल गया। वे गुफा में आए, पार्वती के सामने खड़े हुए और बोले, "वर माँगो।" पार्वती ने बस इतना माँगा कि वे उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करें। शिव जी ने "तथास्तु" कहा और अपने धाम लौट गए।
अगली सुबह पार्वती ने पूजा की सारी सामग्री समेटी और बालू का शिवलिंग नदी में विसर्जित कर दिया। फिर सखियों के साथ व्रत खोला। तभी हिमवान, जो वन-वन बेटी को ढूँढ रहे थे, वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने बेटी को गले लगाया और पूछा कि वह घर छोड़कर क्यों आई। पार्वती ने साफ़ कहा, "मैं तभी लौटूँगी जब आप मेरा विवाह शिव से करेंगे।" हिमवान मान गए। समय आने पर विधि-विधान से शिव-पार्वती का विवाह हुआ, और जो सखियाँ पार्वती को हरकर ले गई थीं, वही सबसे पहले मंगल गीत गाने लगीं।
कथा के अंत में शिव जी कहते हैं कि जो स्त्री इसी तृतीया को इसी भाव से यह व्रत रखेगी, उसका दांपत्य भी हमारे जैसा सुखी होगा।
कथा को शांत मन से समझें
कुछ पुस्तिकाओं में कथा के आख़िर में लिखा मिलता है कि इस दिन अन्न खाने या सो जाने वाली स्त्री अगले जन्मों में क्या-क्या बनेगी। ये पंक्तियाँ उपदेश के उस पुराने ढंग की हैं जिसमें डराकर व्रत रखवाया जाता था; पार्वती की कथा का सार इनमें नहीं है, और आजकल बहुत-से घर इन्हें पढ़ते ही नहीं। पार्वती का उपवास प्रेम से लिया गया उनका अपना निर्णय था, और उनकी याद में रखा गया हर व्रत भी वैसा ही है। जो महिलाएँ बीमार, गर्भवती, बुज़ुर्ग हैं या दवा लेती हैं, वे जल या फल लेकर यह दिन रखती हैं, और परंपरा इसे किसी से कम नहीं मानती।
कथा के दूसरे रूप
- शिव पुराण में। पार्वती के तप की बड़ी कथा शिव पुराण की रुद्र संहिता में है, जहाँ ऋषि उनकी परीक्षा लेते हैं और शिव जी वेश बदलकर आते हैं, फिर अपना असली रूप दिखाते हैं। सखियों और बालू के शिवलिंग वाला प्रसंग हरतालिका की व्रत-पुस्तिकाओं का है।
- सखी के साथ पार्वती। महाराष्ट्र में इस दिन पार्वती की पूजा उनकी सखी के साथ होती है, और दोनों की छोटी प्रतिमाएँ साथ-साथ बिठाई जाती हैं।
- गौरी का मायके आना। कर्नाटक में यही तृतीया गौरी हब्बा है। वहाँ कहते हैं कि गौरी अपने मायके आती हैं, और अगले दिन उन्हें लेने बेटा गणेश आता है।
कथा कैसे सुनी जाती है
कथा शाम की पूजा में होती है, जब बालू या मिट्टी के शिव, पार्वती और गणेश फूलों के फुलेरे के नीचे बिठा दिए जाते हैं। घर या मोहल्ले की औरतें घेरा बनाकर बैठती हैं; एक पढ़ती है, बाकी हाथ में थोड़े अक्षत लेकर सुनती हैं। बहुत-से घरों में रात के हर पहर में भजनों के बीच कथा दोबारा सुनी जाती है, ताकि रात वैसे ही बीते जैसे पार्वती की बीती थी।
पूजा का पूरा क्रम, फुलेरा सजाना, रात का जागरण और अगली सुबह का पारण हरतालिका तीज पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आज यह कथा क्या कहती है
हरतालिका को तीजों में सबसे कठिन कहा जाता है, पर इसकी कथा असल में कठिनाई की नहीं है। यह एक ऐसी लड़की की कहानी है जो जानती थी कि उसे क्या चाहिए, और उन सहेलियों की, जो पिता के वचन दे देने के बाद भी उसके साथ खड़ी रहीं। बहुत-सी औरतें कहती हैं कि उन्हें यही हिस्सा सबसे प्यारा लगता है। कुँवारी लड़कियाँ मन के जीवनसाथी की आस में यह दिन रखती हैं, और ब्याहता औरतें अपने बसे-बसाए घर के लिए।
सावन के मंगलवार की गौरी कथा मंगला गौरी व्रत कथा में है, और पत्नी के धीरज की एक और कहानी वट सावित्री व्रत कथा में। शाम की पूजा के लिए बहुत-से परिवार अपने शहर का चौघड़िया देख लेते हैं।