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व्रत कथा · देवउठनी एकादशी

देवउठनी एकादशी व्रत कथा: राजा बलि, वामन और भगवान का जागना

देवउठनी एकादशी की व्रत कथा: राजा बलि और वामन अवतार, भगवान विष्णु की चार महीने की निद्रा का कारण, और भगवान को भोजन कराने वाले सेवक की लोककथा।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यहाँ कथा हमारे अपने शब्दों में है, जैसे परिवारों में पूजा के समय सुनाई जाती है। क्षेत्र और घर के हिसाब से कथा के रूप बदलते हैं; कथा में कहीं चेतावनी आए तो वह कहानी का हिस्सा है, पढ़ने वाले के लिए डर की बात नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

देवउठनी एकादशी की व्रत कथा बताती है कि भगवान विष्णु चार महीने क्यों सोते हैं और इस दिन क्यों जागते हैं: वामन अवतार के बाद भगवान ने राजा बलि को पाताल में उसके साथ रहने का वचन दिया था, और हर साल का वही ठहराव, देवशयनी से देवउठनी एकादशी तक, उनकी निद्रा के रूप में याद किया जाता है। बहुत-से घरों में इसके साथ उस भोले सेवक की कथा भी सुनाई जाती है, जिसने एकादशी के दिन अन्न माँगा और जिसके सच्चे मन ने भगवान को उसके साथ भोजन करने बुला लिया।

व्रत का दिन, व्रत खोलने का पारण समय और एकादशी तय करने का नियम देवउठनी एकादशी की तिथि वाले पृष्ठ पर है, और साल भर की सारी एकादशियाँ एकादशी की तिथियों वाले पृष्ठ पर। इस दिन जो चार महीने पूरे होते हैं, उनका ब्योरा चातुर्मास पृष्ठ पर है। यह पृष्ठ केवल कथाओं का है, हमारे अपने शब्दों में।

राजा बलि और वामन अवतार

बलि असुरों के राजा थे और भगवान के परम भक्त प्रह्लाद के पोते। वे वीर थे, प्रजा के प्रति न्यायी थे, और दान में उनका कोई सानी नहीं था — कहते हैं, उनके द्वार से कोई माँगने वाला कभी खाली हाथ नहीं लौटा। अपने बल और एक बड़े यज्ञ के सहारे उन्होंने तीनों लोक जीत लिए। स्वर्ग से निकाले गए देवता भगवान विष्णु की शरण में गए, और उनकी माता अदिति ने अपने पुत्रों के लिए व्रत और प्रार्थना की।

भगवान विष्णु अदिति के घर वामन के रूप में जन्मे — छोटा-सा ब्राह्मण बालक, हाथ में छाता और कमंडल। वे वहाँ पहुँचे जहाँ बलि यज्ञ कर रहे थे, और बड़ी सरलता से दान माँगा: बस उतनी धरती, जितनी उनके तीन पग में आ जाए।

इतनी छोटी माँग पर बलि मुस्कुरा दिए और बदले में गाँव, गायें और सोना देने लगे। बालक ने मना कर दिया; उसे तीन पग ही चाहिए थे। असुरों के गुरु शुक्राचार्य पहचान गए कि यह बालक असल में कौन है, और उन्होंने बलि को दान न देने की सलाह दी। बलि ने उत्तर दिया कि वचन दे चुका हूँ, और अगर स्वयं भगवान मेरे द्वार पर माँगने आए हैं तो इससे बड़ा सम्मान और क्या होगा। उन्होंने कमंडल से जल छोड़कर दान का संकल्प कर दिया।

तब वामन बढ़ने लगे। पहले पग में उन्होंने पूरी धरती नाप ली, दूसरे में आकाश। तीसरे पग के लिए कोई जगह न बची। बलि ने घुटने टेककर अपना सिर आगे कर दिया। भगवान ने उस पर पैर रखा और धीरे से उन्हें धरती के नीचे सुतल लोक में पहुँचा दिया — एक सुंदर लोक, जिसका राज उन्होंने बलि को ही सौंप दिया।

बलि की सच्चाई और समर्पण से भगवान का मन भर आया, और उन्होंने बलि से वर माँगने को कहा। बलि ने माँगा कि प्रभु, आप मेरे साथ रहें और सदा मेरी आँखों के सामने रहें। सो भगवान सुतल में ठहर गए और बलि के द्वार पर पहरा देने लगे।

उधर वैकुंठ में लक्ष्मी जी अपने स्वामी की राह देखती रहीं। जब वे न लौटे, तो लक्ष्मी जी वेश बदलकर बलि के पास पहुँचीं। बलि ने उन्हें बहन मानकर अपने यहाँ रखा। जब बलि ने पूछा कि बहन, क्या चाहिए, तो लक्ष्मी जी ने अपना असली परिचय दिया और अपने पति को लौटा देने की विनती की। बलि ने हमेशा की तरह माँगने वाले की बात रख ली। व्रत की पुस्तकें बताती हैं कि इसी से यह व्यवस्था बनी कि भगवान वैकुंठ लौट जाएँगे, पर हर साल चार महीने बलि के पास रहेंगे। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक के यही चार महीने भगवान के विश्राम का समय माने जाते हैं, और प्रबोधिनी एकादशी को वे जागकर लौटते हैं।

निद्रा के और कारण

कुछ व्रत पुस्तकें दूसरा कारण बताती हैं — कि एक असुर से लंबे युद्ध के बाद भगवान थककर क्षीरसागर में शेषनाग पर विश्राम करने लेटे, और कहा कि उनके चार महीने के विश्राम को व्रत-नियम से मनाया जाए। कहीं केवल योगनिद्रा की बात है — भगवान की वह ध्यानमग्न नींद, जिसमें वे सोते हुए भी संसार को संभाले रहते हैं। ज़्यादातर घरों में ये सब बातें साथ-साथ चलती हैं; किसी एक को चुनने की ज़रूरत किसी को नहीं लगती।

अन्न माँगने वाले सेवक की कथा

एक राजा था, जिसके पूरे राज्य में एकादशी का व्रत रखा जाता था। उस दिन बाज़ार में अन्न नहीं बिकता था, किसी रसोई में अन्न नहीं पकता था; राजा के अस्तबल के पशुओं को भी उस दिन दाना नहीं, घास ही दी जाती थी।

एक दिन परदेस से एक आदमी काम माँगने राजमहल आया। राजा ने कहा, रख लेंगे, पर एक शर्त है — एकादशी के दिन अन्न नहीं मिलेगा। उसने खुशी-खुशी हामी भर दी।

एकादशी आई तो उसे भी सबकी तरह फल और दूध मिला। दोपहर तक उसे भूख सताने लगी। वह राजा के पास गया और बोला, महाराज, मैं मेहनत करने वाला आदमी हूँ, फल से मेरा दिन नहीं कटेगा। राजा ने शर्त याद दिलाई, पर उसका उतरा चेहरा देखकर पिघल गए और भंडार से आटा, दाल, चावल दिलवा दिए।

वह सामान लेकर नदी किनारे गया, छोटी-सी आग जलाकर खाना बनाया, और अपनी आदत के मुताबिक भगवान को पुकारा कि आओ प्रभु, पहले आप भोग लगाओ। वह भोला-भाला था, सो ऐसे पुकारता था जैसे किसी दोस्त को बुलाते हैं। और भगवान आए — पीले वस्त्र पहने — उसके पास बैठे और भोजन किया। सेवक को इसमें कुछ अचरज न हुआ; वह तो हमेशा से ऐसे ही खाता आया था।

अगली एकादशी पर उसने राजा से दुगना सामान माँगा। बोला, महाराज, अब भगवान भी मेरे साथ खाते हैं, मेरा पेट आधा ही भरता है। राजा को विश्वास न हुआ; उन्होंने इतने व्रत किए थे और भगवान के दर्शन कभी नहीं हुए थे। उन्होंने कहा, मैं खुद चलकर देखूँगा।

राजा नदी किनारे एक पेड़ के पीछे छिप गए। सेवक ने पहले की तरह खाना बनाया और पुकारा, पर इस बार भगवान नहीं आए। वह बार-बार पुकारता रहा, और आखिर आँखों में आँसू भरकर बोला कि जब तक मेरे सखा नहीं आएँगे, मैं एक कौर नहीं खाऊँगा। तब भगवान प्रकट हुए, उसका हाथ थामा और पहले जैसे ही प्रेम से उसके साथ भोजन किया। राजा पेड़ के पीछे से निकले और सेवक के पैरों में गिर पड़े। उन्हें समझ आ गया कि व्रत एक पात्र है, और भगवान उस पात्र में भरे प्रेम के लिए आते हैं।

कथा को शांत मन से समझें

कुछ घरों में यह कथा और कड़े ढंग से कही जाती है — कि सेवक कहता है, भगवान न आए तो नदी में कूद जाऊँगा, और अंत में भगवान उसे अपने धाम ले जाते हैं। लोककथाएँ भक्त की तड़प की गहराई ऐसे ही दिखाती हैं। यह कोई निर्देश नहीं है, और आस्था के नाम पर किसी से अपने को जोखिम में डालने को नहीं कहा जाता। आज यह कथा राजा की सीख के लिए सुनाई जाती है: सच्चे मन से निभाया नियम दिखावे के नियम से बड़ा है, और व्रत किसी मेहनतकश या भूखा न रह सकने वाले पर बोझ नहीं बनना चाहिए।

कथा कैसे सुनी जाती है

देवउठनी एकादशी की शाम, भगवान के चरण बन जाने और गन्ने का मंडप सज जाने के बाद, परिवार जगाने से पहले साथ बैठता है। घर के कोई बड़े बलि की कथा कहते हैं, अक्सर उसके बाद सेवक की कथा भी, और फिर पूरा घर शंख, घंटी और "उठो देव" की पुकार के साथ भगवान को जगाता है। शाम का पूरा क्रम देवउठनी एकादशी पूजा विधि पृष्ठ पर है।

आज यह कथा क्या कहती है

बलि की कथा वचन निभाने की है, चाहे उसकी कितनी भी कीमत हो, और उस भगवान की, जिसका मन दान से पिघल जाता है। सेवक की कथा बिना दिखावे की आस्था की है। दोनों मिलकर दिन का भाव बनाती हैं — भगवान जाग गए, अब ब्याह-शादियाँ शुरू हो सकती हैं, और घर गन्ने, दीयों और गीतों से भर जाता है।

इसके ठीक बाद तुलसी विवाह आता है, जिसमें तुलसी का विवाह भगवान विष्णु से होता है, और साल की बाकी एकादशियों की कथाएँ एकादशी व्रत कथा पृष्ठ पर हैं। शाम की पूजा या आने वाले हफ़्तों में किसी पारिवारिक संस्कार का समय चुनना हो तो अपने शहर का पंचांग और मुहूर्त पृष्ठ देख लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

देवउठनी एकादशी से पहले भगवान विष्णु चार महीने क्यों सोते हैं?

व्रत की पुस्तकें इसे राजा बलि की कथा से समझाती हैं। वामन अवतार के बाद बलि की दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान ने पाताल में उसके साथ रहने का वचन दिया; फिर लक्ष्मी जी के कहने पर बीच का रास्ता निकला कि भगवान हर साल चार महीने वहाँ रहेंगे। यही समय देवशयनी से देवउठनी एकादशी तक उनकी निद्रा माना जाता है।

देवउठनी एकादशी पर घरों में कौन-सी कथा कही जाती है?

बलि की कथा के साथ बहुत-से घरों में उस राज्य की कथा सुनाई जाती है जहाँ सब एकादशी का व्रत रखते थे, और उस भोले सेवक की, जिसने भूख लगने पर अन्न माँगा और जिसके सच्चे मन के बुलावे पर भगवान खुद उसके साथ भोजन करने आए।

क्या प्रबोधिनी एकादशी की कोई एक तय कथा है?

नहीं। इस दिन भगवान का जागना ही सबसे बड़ा उत्सव है, और परिवार उसके साथ अलग-अलग कथाएँ कहते हैं। बलि की कथा निद्रा का कारण बताती है, और सेवक की कथा सच्चे मन की सीख देती है।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • भागवत पुराण, अष्टम स्कंध का वामन प्रसंग (भक्ति-ग्रंथों में दिए सार के अनुसार)
  • पद्म और स्कंद पुराण का एकादशी माहात्म्य, जैसा उत्तर भारत की व्रत पुस्तकों में संक्षेप में मिलता है
  • उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान की लोक-परंपरा, जैसी देवोत्थान एकादशी पर कही जाती है

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति