देवउठनी एकादशी की पूजा में दिन भर एकादशी का व्रत रहता है और शाम को घर के सब लोग मिलकर गन्ने के मंडप के नीचे, शंख-घंटी बजाकर और "उठो देव" पुकारकर भगवान विष्णु को चार महीने की निद्रा से जगाते हैं। संक्षेप में: दिन भर व्रत रखें, शाम को भगवान के चरण बनाकर गन्ने का मंडप खड़ा करें, मौसमी फल-सब्ज़ी डलिया से ढकें, कथा सुनें, सब मिलकर भगवान को जगाएँ, दीया और भोग अर्पित करें, और अगली सुबह पारण के समय व्रत खोलें।
व्रत का दिन और आपके शहर का पारण समय देवउठनी एकादशी की तिथि वाले पृष्ठ पर है, और साल भर की सारी एकादशियाँ एकादशी सूची में। यहाँ कोई समय नहीं लिखा गया, क्योंकि वह साल और जगह के साथ बदलता है।
पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें
- भगवान विष्णु, कान्हा या शालिग्राम — जो आपके घर में पूजे जाते हों — का चित्र या छोटी मूर्ति
- चरण और चौक बनाने के लिए चावल का ऐपन (भीगे चावल पीसकर बना घोल) और/या गेरू
- मंडप के लिए पाँच या ज़्यादा गन्ने, और ऊपर से बाँधने के लिए थोड़ा धागा
- मौसमी चीज़ें: सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर, आँवला, मूली, अमरूद, कहीं-कहीं नई कपास, और मौसम के दूसरे फल
- सामान ढकने के लिए बाँस की डलिया या बड़ी छलनी
- तुलसी दल — जो घर एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ते, वे एक दिन पहले तोड़ लें
- रोली, हल्दी, अक्षत, फूल, और चौकी के लिए पीला कपड़ा
- घी के दीये, और आँगन व दरवाज़ों के लिए कई छोटे दीये
- शंख हो तो शंख, और घंटी — या स्टील की थाली और चम्मच
- व्रत के अनुकूल भोग: फल, मखाने की खीर, बिना अन्न की मिठाई
- अगर घर की रीति हो तो भगवान के लिए नए सूती वस्त्र और मिठाई
इनमें से कुछ भी खास खरीदने की ज़रूरत नहीं। गाँवों के बहुत-से घरों में थाली पर चम्मच बजाकर ही हमेशा से "घंटी" बजती आई है।
पूजा का क्रम
- सुबह संकल्प। नहाकर भगवान के आगे बैठें और अपने शब्दों में कहें कि आप प्रबोधिनी एकादशी का व्रत रख रहे हैं। शुरू में ही तय कर लें कि फल और पानी लेंगे या नहीं, और उस फ़ैसले को बिना खिंचाव के निभाएँ।
- दिन भर। चावल और अन्न से बचें। दिन शांति से बिताएँ — बहुत-से लोग "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" जपते हैं, गीता या विष्णु सहस्रनाम पढ़ते हैं, और मंदिर जाते हैं।
- सफ़ाई और चौक। तीसरे पहर तक आँगन, रसोई का फ़र्श या पूजा का कोना साफ़ कर लें। ऐपन या गेरू से एक चौक बनाएँ, और दरवाज़े से पूजा के स्थान की ओर आते भगवान के छोटे-छोटे चरण बनाएँ। कुछ घरों में पास की दीवार पर सूरज, चाँद, दीया और घर के लोगों के चित्र भी बनाए जाते हैं।
- मंडप खड़ा करें। चौक के चारों ओर गन्ने खड़े करें और ऊपर से उनके सिरे बाँध दें, ताकि एक छोटा मंडप बन जाए। उसके नीचे पीला कपड़ा बिछाकर चौकी या पटरा रखें और भगवान का चित्र, मूर्ति या शालिग्राम विराजमान करें।
- सामान ढकें। सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर, गन्ने के टुकड़े और बाकी चीज़ें चौक में रखकर डलिया या छलनी से ढक दें। मान्यता है कि जगाए जाने तक भगवान इसी के नीचे सो रहे हैं।
- दीये। साँझ होते ही मंडप के आगे घी का दीया जलाएँ, और दरवाज़ों, तुलसी और रसोई में छोटे दीये।
- कथा सुनें। सब साथ बैठकर देवउठनी एकादशी व्रत कथा सुनें — राजा बलि की और भगवान को भोजन कराने वाले सेवक की कथा।
- भगवान को जगाएँ। सब खड़े हो जाएँ। घंटी या थाली बजाएँ, शंख फूँकें, और अपने घर के लोक-बोलों में मिलकर "उठो देव" पुकारें — कि चार महीने पूरे हुए, अब प्रभु उठें। बहुत-से घरों में इस समय जगाने का पारंपरिक गीत गाया जाता है।
- डलिया उठाएँ। घर के सबसे बड़े, या जिसने व्रत रखा है, वे डलिया उठाएँ। भगवान को रोली, अक्षत, तुलसी दल, फूल और पहला दीया अर्पित करें, फिर मौसमी फल-सब्ज़ी और मिठाई का भोग लगाएँ।
- आरती। घर में जो आरती गाई जाती हो, अक्सर "ॐ जय जगदीश हरे", वह गाएँ और मंडप के चारों ओर दीया घुमाएँ।
- प्रसाद और रात। फल और मिठाई प्रसाद के रूप में बाँटें। जो जागरण करते हैं, वे देर रात तक भजन गाते हैं।
- अगले दिन पारण। द्वादशी की सुबह नहाकर छोटी-सी प्रार्थना करें और पारण के समय में व्रत खोलें — प्रायः पहले तुलसी वाला जल, फिर अन्न सहित सादा भोजन।
समय कैसे देखें
दो समय काम के हैं। शाम को भगवान को जगाना सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में होता है, और जो परिवार अच्छे मुहूर्त में शुरू करना चाहें, वे अपने शहर का पंचांग देख लें। दूसरा है पारण: व्रत अगली सुबह हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) बीतने के बाद और द्वादशी खत्म होने से पहले खोला जाता है। आपके शहर का यह समय तिथि वाले पृष्ठ पर है। स्मार्त और वैष्णव घर कभी-कभी अलग-अलग दिन व्रत रखते हैं, इसीलिए तिथि वाला पृष्ठ दूसरी एकादशी भी दिखाता है। आने वाले हफ़्तों में ब्याह या गृह प्रवेश के लिए ठीक दिन मुहूर्त पृष्ठ पर देखें।
परिवारों के रीति-रिवाज
ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; आपके घर की अपनी रीति सबसे पहले है।
- बहुत-से घरों में एकादशी को चावल नहीं पकते, उनके लिए भी नहीं जो व्रत नहीं रखते।
- तुलसी दल एक दिन पहले तोड़ लिए जाते हैं, क्योंकि बहुत-से लोग एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ते।
- मंडप के गन्ने अगले दिनों में प्रसाद के रूप में खाए जाते हैं; बहुत-से गाँवों में नए गन्ने का पहला स्वाद इसी दिन के बाद लिया जाता है।
- बहुत-से घर पूरे कार्तिक में हर शाम तुलसी पर दीया जलाते हैं, और यह रात उनमें सबसे उजली होती है।
- चातुर्मास में जो ब्याह, मुंडन और गृह प्रवेश बहुत-से परिवार टाल देते हैं, उनकी तारीखें इस दिन के बाद फिर तय होने लगती हैं।
- गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग और बीमार लोग पानी, दूध और फल के साथ हल्का व्रत रखें या बिना व्रत के पूजा में शामिल हों; डॉक्टर की सलाह सबसे पहले।
प्रांतों के अपने ढंग
- उत्तर प्रदेश और बिहार: चरणों की अल्पना, सिंघाड़ा-शकरकंद से भरी ढकी डलिया, और साँझ को स्त्रियों के जगाने वाले गीत; तुलसी विवाह अक्सर उसी शाम हो जाता है।
- राजस्थान और हरियाणा: दीवार पर गेरू के चित्र और गन्ने का मंडप, आँगन में जुटा पूरा परिवार।
- महाराष्ट्र: कार्तिकी एकादशी, जब पंढरपुर में विठोबा के दर्शन को वारकरी जुटते हैं; अगले दिन से तुलसी विवाह शुरू होता है।
- गुजरात: देव उठी अगियारस, मंदिरों में उत्सव और तुलसी विवाह की शुरुआत।
- दक्षिण भारत: उत्थान एकादशी, और अगले दिन क्षीराब्धि द्वादशी, जब आँवले की टहनी के साथ तुलसी की पूजा होती है।
पूजा के बाद
अब ब्याह-शादियों का मौसम खुलता है। अगला उत्सव तुलसी विवाह है, और अगर आप हर एकादशी का व्रत रखते हैं तो साल भर की कथाएँ एकादशी व्रत कथा पृष्ठ पर हैं। इस दिन पूरे होने वाले चार महीनों का ब्योरा चातुर्मास पृष्ठ पर है।