ऋषि पंचमी की पूजा सात महान ऋषियों, यानी सप्तर्षि, और अरुंधती की पूजा है, जो भादों शुक्ल पंचमी को सादे स्नान, दोपहर की पूजा और सादे भोजन के साथ की जाती है। संक्षेप में: अपामार्ग से नहाएँ, ऋषियों के लिए चावल की सात ढेरियाँ और अरुंधती के लिए एक ढेरी रखें, उनकी पूजा करें, कथा सुनें, और केवल वही खाएँ जो बिना हल के उगा हो।
आपके शहर में ऋषि पंचमी किस दिन है, यह ऋषि पंचमी की तिथि वाले पृष्ठ पर है; दोपहर में तिथि कौन-सी है, यह देखना ज़रूरी है, इसलिए उस दिन का पंचांग देख लें। समय यहाँ नहीं लिखे गए, क्योंकि वे शहर और साल के साथ बदलते हैं।
पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें
- अपामार्ग (चिरचिटा, लटजीरा) की टहनियाँ, नहाने और दातुन के लिए; न मिलें तो कुछ पत्तियाँ, या केवल साफ़ स्नान
- साफ़ चौकी और उस पर पीला या सफ़ेद कपड़ा
- सात छोटी ढेरियों के लिए चावल, या सात सुपारियाँ, और एक अरुंधती के लिए; कुछ घर हल्दी से आठ आकृतियाँ बनाते हैं या कुश की छोटी मूर्तियाँ
- कलश या लोटे में जल, चंदन, रोली, हल्दी, अक्षत
- फूल, कुछ तुलसी दल और दूब
- घी का दीया और धूप
- जिन घरों में रीति है, वहाँ ऋषियों के लिए जनेऊ
- फल, और भोग के लिए दही, दूध या बिना जुते अनाज की कोई मिठाई
- व्रत की पुस्तिका, या घर में जैसे कही जाती है वैसी कथा
पूजा का क्रम
- अपामार्ग स्नान। सुबह अपामार्ग की दातुन करें, फिर नहाएँ। कुछ परिवार अपामार्ग की पत्तियाँ शरीर पर मलते हैं या नदी-तालाब में नहाते हैं; बहुत-से लोग घर पर नहाने के पानी में ही कुछ पत्तियाँ डाल लेते हैं।
- संकल्प। पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें, दाएँ हाथ में जल लें और अपने शब्दों में कहें कि आप सप्तर्षि और अरुंधती के सम्मान में, अपने सब सिखाने वालों के प्रति कृतज्ञता से, ऋषि पंचमी रख रहे हैं। जल छोड़ दें।
- स्थान तैयार करें। चौकी पर कपड़ा बिछाएँ। चावल की सात छोटी ढेरियाँ एक पंक्ति में या हल्के घुमाव में बनाएँ, जैसा आकाश में सप्तर्षि मंडल दिखता है, और छठी-सातवीं के पास आठवीं ढेरी अरुंधती की। सुपारी हो तो हर ढेरी पर एक रखें, और पास में कलश रखें।
- पहले गणेश जी। दीया जलाएँ और एक फूल व थोड़े अक्षत से गणेश जी का स्मरण करें।
- ऋषियों का पूजन। हर ऋषि का नाम लेते हुए जल, चंदन, अक्षत और फूल चढ़ाएँ: कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ, और फिर अरुंधती। घर की रीति हो तो ऋषियों को जनेऊ चढ़ाएँ, और अरुंधती को हल्दी-कुमकुम। "ॐ सप्तर्षिभ्यो नमः" जैसा छोटा नाम-मंत्र काफ़ी है।
- भोग। फल, दही या दूध, और बाद में जो बिना जुता अन्न खाना है, वह अर्पित करें।
- कथा। ऋषि पंचमी व्रत कथा पढ़ें या सुनें। आजकल बहुत-से घरों में कथा के बाद पढ़ने वाली अपनी ओर से एक बात जोड़ देती है: मासिक धर्म स्वाभाविक है, और यह दिन कृतज्ञता का है।
- आरती और प्रार्थना। दीया घुमाएँ, और कुछ पल रुककर उन गुरुओं, बड़ों और दूसरे लोगों को नाम लेकर याद करें जिन्होंने आपको कुछ सिखाया।
- गुरु को भेंट। कुछ परिवार पूजा के बाद किसी शिक्षक या विद्वान को भोजन, फल या छोटी भेंट देते हैं, ताकि जीवित गुरुओं में ऋषियों का सम्मान हो।
- भोजन। पूजा के बाद, या दिन में एक बार, व्रत का सादा भोजन करें।
समय कैसे देखें
परंपरा से पूजा मध्याह्न में होती है, यानी दिन के बीच वाले हिस्से में, इसलिए देखा जाता है कि आपके शहर में उस समय पंचमी तिथि चल रही हो। पंचांग में तिथि, सूर्योदय और सूर्यास्त मिल जाते हैं; मध्याह्न दिन के प्रकाश के पाँच बराबर भागों में बीच वाला भाग है, जो तिथि वाले पृष्ठ पर हर शहर के लिए दिया गया है। अच्छे समय में पूजा शुरू करनी हो तो उस दिन का चौघड़िया भी देख सकते हैं।
परिवारों के रीति-रिवाज
ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं। आपके घर की अपनी रीति सबसे पहले है।
- बिना हल के उगा अन्न: समा या सावाँ के चावल, जंगली साग, कंद, फल; बहुत-से लोग उस दिन गेहूँ और साधारण चावल नहीं खाते।
- कुछ घरों में बैलों की मेहनत से मिली चीज़ें भी नहीं ली जातीं, इसलिए गाय की जगह भैंस का दूध लिया जाता है; दूसरे घरों में दूध-दही सहज रूप से चलता है।
- दिन में एक बार भोजन, या पूजा तक व्रत; गर्भवती, बीमार और बुज़ुर्ग फल, दूध और पानी लें, और डॉक्टर की सलाह पहले मानें।
- कुछ परिवारों में यह व्रत सात साल या कोई और तय संख्या तक रखकर उद्यापन से पूरा किया जाता है, जब सात ब्राह्मण दंपतियों या सात गुरुओं को भोजन कराया जाता है।
- बहुत-सी महिलाएँ यह व्रत जीवन भर रखती हैं, और अब बहुत-से पुरुष भी साथ रखते हैं।
प्रांतों के अपने ढंग
- महाराष्ट्र: इस दिन ऋषि पंचमी की भाजी बनती है, उन सब्ज़ियों से जो बैल या हल के बिना उगी हों, जैसे अरबी के पत्ते, कद्दू, तुरई, भुट्टा और हरी मिर्च, प्रायः बिना प्याज़-लहसुन के। इसे भगर यानी समा के चावल के साथ खाया जाता है।
- गुजरात और राजस्थान: महिलाएँ टोलियों में पूजा करती हैं और साथ बैठकर कथा सुनती हैं; कुछ कस्बों में स्नान के लिए नदी किनारे या मंदिर के कुंड पर जाती हैं।
- उत्तर प्रदेश: फ़र्श पर चावल के घोल या हल्दी से सप्तर्षि बनाए जाते हैं और उनके आगे दीया जलाया जाता है।
- नेपाल: ऋषि पंचमी तीज के दो दिन बाद आती है। महिलाएँ नदियों में नहाती हैं, दतिवन (अपामार्ग) की टहनियों और लाल मिट्टी से कई बार शरीर मलती हैं, फिर सात ऋषियों की पूजा करती हैं; काठमांडू में बागमती के घाटों पर उस दिन बड़ी भीड़ होती है।
पूजा के बाद
प्रसाद बाँटें। ऋषि पंचमी के आसपास के दिन व्रतों से भरे रहते हैं; हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी की कथाएँ भी पास ही हैं।