जितिया तीन दिन का व्रत है: पहले दिन नहाय-खाय में स्नान और एक बार शुद्ध भोजन, दूसरे दिन आश्विन कृष्ण अष्टमी का कठिन उपवास और शाम को जीमूतवाहन की पूजा, और तीसरी सुबह पारण। संक्षेप में: एक दिन पहले सादा खाएँ, भोर से पहले व्रत शुरू करें, शाम को कुश के जीमूतवाहन और चील-सियारिन की पूजा करके कथा सुनें, जितिया धागा पहनें, और अगली सुबह नहाकर व्रत खोलें।
इस बार के तीनों दिन और अष्टमी कब से कब तक है, यह जितिया की तिथि वाले पृष्ठ पर है। यहाँ तारीख़ें नहीं लिखी गईं, क्योंकि मिथिला और भोजपुरी इलाक़े के पंचांग कभी-कभी एक दिन आगे-पीछे होते हैं, और घर में जो पंचांग चलता है, वही मान्य है।
पहले सेहत की बात
जितिया साल के सबसे लंबे व्रतों में से है। बहुत-सी माताएँ इसे भोर से अगली सुबह तक बिना पानी के रखती हैं, और वह भी बरसात के आख़िर की उमस में। जो माँ गर्भवती है या बच्चे को दूध पिलाती है, जिसे मधुमेह, रक्तचाप या गुर्दे की तकलीफ़ है, जो हाल में बीमार रही है, या जिसकी उम्र ढल चुकी है, उसे निर्जला नहीं रखना चाहिए। पानी, नारियल पानी, दूध और फल के साथ भी व्रत उतना ही पूरा है, और परंपरा ने इसे हमेशा माना है। इस पृष्ठ के हर रिवाज से पहले डॉक्टर की बात।
पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें
- जीमूतवाहन की छोटी मूर्ति बनाने के लिए कुश, या बनी-बनाई प्रतिमा
- चील और सियारिन की आकृति गढ़ने के लिए मिट्टी या गोबर; रँगने को थोड़ा लाल और पीला रंग
- नीची चौकी, या आँगन में वह जगह जहाँ छोटा-सा गड्ढा खोदकर पानी भरा जा सके
- रोली, सिंदूर, हल्दी, अक्षत, फूल और दूब
- घी का दीया, धूप, और जल भरा लोटा
- मौसमी फल, खीरा, भीगा चना और मिठाई, भोग के लिए
- जितिया: लाल-पीला धागा, अक्सर सोने या चाँदी के छोटे लॉकेट के साथ; किसी घर में हर बच्चे के नाम का एक, किसी में माँ के लिए एक
- नहाय-खाय और पारण के लिए मड़ुआ का आटा, नोनी साग, चावल, दाल और तोरई-झिंगनी जैसी सब्ज़ियाँ, जैसा आपके इलाक़े में बनता है
इनमें कुछ भी महँगा होना ज़रूरी नहीं। घर का धागा और अपने हाथ से गढ़ी आकृतियाँ — माताएँ हमेशा से यही चढ़ाती आई हैं।
तीनों दिन का क्रम
- नहाय-खाय (सप्तमी का दिन)। सुबह जल्दी नहाएँ, रसोई धो-पोंछ लें और एक बार सात्विक भोजन बनाएँ। मिथिला में मड़ुआ की रोटी और नोनी का साग, कई घरों में मछली के साथ; दूसरी जगह भात, दाल और सतपुतिया की सब्ज़ी। आराम से एक बार खाएँ और पानी ख़ूब पिएँ।
- अष्टमी की भोर से पहले। भोजपुरी इलाक़े में बहुत-सी माताएँ उजाला होने से पहले ओठगन करती हैं, यानी थोड़ा-सा दही-चूड़ा या कुछ मीठा। इसके बाद व्रत शुरू।
- दिन भर। जितना हो सके आराम करें। जिन्हें पानी या फल लेना है, वे सुबह ही तय कर लें; दोपहर में थककर सोचने की नौबत न आए।
- पूजा की जगह। दोपहर बाद या शाम को आँगन में छोटा गड्ढा खोदकर पोखरी बनाएँ और पानी भरें, या चौकी लगाएँ। बीच में कुश के जीमूतवाहन रखें, बगल में चील और सियारिन। उन पर सिंदूर और हल्दी लगाएँ।
- पूजन। दीया जलाएँ। जीमूतवाहन को जल, रोली, अक्षत, फूल, दूब और फल चढ़ाएँ, और चील-सियारिन को भी सिंदूर से छुएँ। अपने शब्दों में, बच्चों का नाम ले-लेकर उनकी कुशल माँगें।
- कथा। सब मिलकर जितिया व्रत कथा सुनें: पहले जीमूतवाहन और गरुड़ की, फिर चील और सियारिन की।
- जितिया धागा। कथा के बाद धागा जीमूतवाहन को चढ़ाकर गले में पहना जाता है। कुछ माताएँ हर बच्चे के नाम का अलग धागा पहनती हैं।
- रात। व्रत रात भर चलता है। बहुत-से गाँवों में औरतें रात का कुछ हिस्सा साथ बैठकर गीत गाते हुए बिताती हैं।
- पारण, अगली सुबह। नहाकर जल चढ़ाएँ, छोटी-सी प्रार्थना करें और व्रत खोलें। अधिकतर घरों में नहाय-खाय वाला ही भोजन बनता है; कुछ घर पहले थोड़ा-सा चील-सियारिन के नाम, या आसपास के पक्षी-जानवरों के लिए निकाल देते हैं।
समय कैसे देखें
दो बातें काम की हैं: सूर्योदय के समय अष्टमी किस दिन है, और अष्टमी उतरती कब है, क्योंकि पारण उसके बाद होता है। दोनों पंचांग से आती हैं; अपने शहर की तिथि पंचांग पृष्ठ पर देखें। शाम की पूजा किसी शुभ घड़ी में बैठानी हो तो अपने शहर का चौघड़िया काम आएगा। आपका मैथिली या भोजपुरी पंचांग कोई और दिन बताए, तो वही मानें जो आपके घर में मानते आए हैं।
परिवारों के रीति-रिवाज
ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; हर घर की अपनी रीत पहले है।
- जितिया का लॉकेट अक्सर सास से बहू को मिलता है, और नया बच्चा होने पर उसमें एक और जुड़ जाता है।
- बहुत-से घरों में नहाय-खाय बिना लहसुन-प्याज़ के बनता है और पहले रसोई धोई जाती है।
- कुछ माताएँ रात भर घी की जगह सरसों के तेल का दीया जलाए रखती हैं।
- पारण के बाद चील-सियारिन की आकृतियाँ कई घरों में पानी में या किसी पेड़ के नीचे रख दी जाती हैं।
- अब माताएँ यह व्रत बेटी और बेटे दोनों के लिए रखती हैं, और कुछ पिता भी साथ उपवास करते हैं।
इलाक़ों के अपने ढंग
- मिथिला (उत्तर बिहार और नेपाल का तराई): नहाय-खाय में मड़ुआ की रोटी, नोनी साग और मछली, और अपना अलग पंचांग, जिससे दिन बदल सकता है।
- भोजपुरी इलाक़ा (पश्चिमी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश): भोर से पहले ओठगन, आँगन की पोखरी, और उसके पास रखे कुश के जीमूतवाहन।
- झारखंड: शहरों में भी व्रत ख़ूब रखा जाता है, और औरतें अक्सर किसी मंदिर या तालाब पर इकट्ठा होती हैं।
- नेपाल के तराई का थारू समाज इस पर्व को अपने गीतों और नाच के साथ मनाता है।
पूजा के बाद
भोग के फल और मिठाई घर में बाँटें और आराम करें। उत्तर भारत में माताओं का अगला व्रत अहोई अष्टमी है, और कुछ ही हफ़्तों बाद यही आँगन छठ की तैयारी में जुट जाते हैं।