अहोई अष्टमी माँ का अपनी संतान के लिए रखा जाने वाला व्रत है, जो सूर्योदय से तारे निकलने तक चलता है और शाम को दीवार पर स्याहु व उसके बच्चों के साथ बनी अहोई माता की पूजा से पूरा होता है। संक्षेप में: सुबह संकल्प लें, दिन भर व्रत रखें, अहोई माता का चित्र बनाएँ या लगाएँ, शाम को जल भरे कलश के साथ उनकी पूजा करके कथा सुनें, फिर तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलें।
व्रत किस दिन पड़ता है और आपके शहर में सूरज कब डूबेगा, यह अहोई अष्टमी की तिथि वाले पृष्ठ पर देखें। यहाँ वे समय नहीं लिखे गए, क्योंकि वे हर साल और हर जगह बदलते हैं।
पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें
- अहोई माता का चित्र: दीवार पर गेरू से बना, कागज़ पर बना, या छपा हुआ; दीवार पर बनाना हो तो सुबह ही वह हिस्सा पोंछकर सुखा लें
- जल से भरा कलश या लोटा; बहुत-से घरों में यह वही करवा होता है जो करवा चौथ पर पूजा गया था
- रोली, हल्दी, अक्षत, कुछ फूल, थोड़ा-सा दूध
- घी या तेल का दीया, रुई की बत्ती, धूप या अगरबत्ती
- गेहूँ के दाने: कथा के समय हर महिला के हाथ में रखने के लिए
- भोग: पूरी, हलवा, पुए या मीठी मठरी; कुछ घरों में अष्टमी के नाते आठ पूरियाँ और आठ पुए बनते हैं
- पूजा की थाली और अर्घ्य के लिए एक कटोरी या लोटा
- स्याऊ माला: लाल धागे में चाँदी का अहोई लॉकेट और चाँदी के दाने, अगर घर में यह रिवाज है
- सास के लिए बायना: भोग में से कुछ, थोड़े रुपये, कहीं साड़ी या मिठाई
- चित्र के सामने बैठने के लिए चौकी या साफ़ आसन
इनमें कुछ भी ख़ास होना ज़रूरी नहीं। स्टील का सादा लोटा अच्छा कलश बन जाता है, और बच्चे के हाथ से मोम के रंगों से बनी अहोई माता भी उतनी ही प्यारी हैं।
पूजा का क्रम
- सुबह। नहा लें। चाहें तो सूर्योदय से पहले थोड़ा कुछ खा-पी लें; बहुत-सी माताएँ भोर में पानी और हल्का नाश्ता लेती हैं। व्रत सूर्योदय से तारे निकलने तक चलता है।
- संकल्प। पूर्व की ओर मुँह करके बैठें, हाथ में थोड़ा जल और कुछ चावल लें, और अपने शब्दों में कहें कि आप अपनी संतान के स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रख रही हैं। जल धरती पर छोड़ दें।
- चित्र। पूजा के कोने या रसोई के पास दीवार का एक हिस्सा साफ़ करें। गेरू से अहोई माता बनाएँ, और उनके पास स्याहु और उसके बच्चे। बहुत-सी महिलाएँ आठ कोनों वाला घेरा, एक छोटा घर, घर के बच्चे और तारे या चाँद भी बनाती हैं। छपा चित्र हो तो उसे दीवार पर चिपका दें या चौकी पर टिका दें।
- कलश। शाम होते-होते कलश में जल भरें, रोली से स्वस्तिक बनाएँ और गले में मौली बाँधें। उसे अहोई माता के सामने रखें। स्याऊ माला हो तो थाली में रख लें।
- पहले गणेश जी। दीया जलाएँ। रोली, अक्षत और फूल से गणेश जी का स्मरण करें।
- अहोई माता का पूजन। चित्र में अहोई माता और स्याहु व उसके बच्चों को रोली, हल्दी, अक्षत, फूल और थोड़ा दूध चढ़ाएँ। पूरी-हलवे का भोग लगाएँ। स्याऊ लॉकेट और दानों पर भी रोली लगाएँ।
- कथा सुनें। हाथ में गेहूँ के दाने लेकर अहोई अष्टमी व्रत कथा सुनें या पढ़ें। बच्चे अक्सर माँ के पास ही बैठते हैं।
- स्याऊ माला। कथा के बाद कोई नया दाना हो तो धागे में पिरोकर माला पहन लें। जिन घरों में नए बच्चे के लिए या हर साल दाना जुड़ता है, वे इसी समय जोड़ते हैं।
- बायना। सास के पैर छूकर उन्हें बायना दें। सास पास न हों तो परिवार की किसी बड़ी महिला को दें।
- तारों को अर्घ्य। जब पहले तारे साफ़ दिखने लगें, कलश या लोटे का जल और कथा वाले गेहूँ के दाने लेकर आँगन या छत पर जाएँ, तारों की ओर अर्घ्य दें और बच्चों के लिए प्रार्थना करें।
- व्रत खोलें। पहले पानी और भोग का थोड़ा प्रसाद लें, फिर परिवार के साथ भोजन करें।
समय कैसे देखें
दो बातें काम की हैं: शाम की पूजा का समय, और वह घड़ी जब तारे दिखने लगें। आसमान के हिसाब से तारे सूर्यास्त के कुछ देर बाद निकलते हैं, इसलिए अहोई अष्टमी की तिथि वाले पृष्ठ पर दिया सूर्यास्त का समय सबसे अच्छा सहारा है। जो घर चाँद देखकर व्रत खोलते हैं, वे अपने शहर का देर से होने वाला चंद्रोदय चंद्रोदय पृष्ठ पर देख सकते हैं। कुछ माताएँ अच्छे समय में पूजा शुरू करना पसंद करती हैं; उसके लिए अपने शहर का चौघड़िया है। जगमगाते शहरों में पहले तारे धुँधले दिखते हैं, इसलिए ज़्यादातर माताएँ सूर्यास्त का समय और आसमान, दोनों देखकर ही तय करती हैं।
परिवारों के रीति-रिवाज
ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; आपके घर की अपनी रीति सबसे पहले है।
- कथा की याद में बहुत-से घरों में माँ इस दिन मिट्टी खोदने, क्यारी गोड़ने और धरती में कुदाल-खुरपी चलाने से बचती है।
- अहोई के कलश का जल सँभालकर रखा जाता है, और कुछ घरों में दीवाली के दिन घर में छिड़का जाता है या बच्चों को दिया जाता है।
- स्याऊ माला प्रायः अहोई अष्टमी से दीवाली तक पहनी जाती है, फिर उतारकर कपड़े में लपेटकर अगले साल तक रख दी जाती है।
- कुछ घरों में अष्टमी के सम्मान में हर पकवान आठ-आठ बनता है।
- व्रत बेटियों के लिए भी उतना ही रखा जाता है जितना बेटों के लिए, और संतान की आस रखने वाली महिलाएँ भी इसे रखती हैं।
- गर्भवती या दूध पिलाने वाली माताएँ, और मधुमेह वाली या बीमार महिलाएँ पानी, दूध या फल के साथ व्रत रखती हैं और देर रात तक नहीं रुकतीं।
प्रांतों के अपने ढंग
- उत्तर प्रदेश और दिल्ली: दीवार पर गेरू का चित्र आम है, व्रत तारों से खुलता है, और बहुत-से घरों में करवा चौथ वाला करवा ही अहोई का कलश बनता है।
- हरियाणा और पंजाब: छपे हुए अहोई चित्र ज़्यादा चलते हैं, और सास को बायना देना शाम का अहम हिस्सा है।
- ब्रज: इस रात बहुत-से दंपती गोवर्धन के पास राधा कुंड में स्नान करते हैं, संतान की कामना से या संतान के लिए आभार में।
- राजस्थान और मध्य प्रदेश: पूजा लगभग ऐसी ही होती है, चित्र और भोग में स्थानीय फ़र्क़ के साथ; कुछ घरों में व्रत चंद्रोदय पर खुलता है।
पूजा के बाद
भोग पहले बच्चों में बाँटें। दीवार पर बनी अहोई माता को दीवाली तक रहने दें; बहुत-से घर उसे अपने आप फीका पड़ने देते हैं। इस मौसम का अगला पर्व धनतेरस है और उसके बाद दीवाली। आश्विन में जितिया रखने वाली माताओं को उसकी कथा भाव में मिलती-जुलती लगेगी, और इसी पखवाड़े में पत्नियों का व्रत करवा चौथ आता है।