अहोई अष्टमी की व्रत कथा उस माँ की है, जिसकी कुदाल से दीवाली से पहले जंगल में मिट्टी खोदते समय अनजाने में स्याहु यानी सेही का बच्चा मर गया, और जिसने बाद में सच्चे मन से अहोई माता का व्रत रखकर अपने घर की खुशियाँ वापस पाईं। बहुत-से घरों में इसी कथा का एक लंबा रूप भी सुनाया जाता है, जिसमें घर की सबसे छोटी बहू गाय की सेवा करती है, एक पक्षी के बच्चों को साँप से बचाती है और अंत में स्याहु माता का आशीर्वाद पाती है।
व्रत का दिन और आपके शहर में सूर्यास्त का समय अहोई अष्टमी की तिथि वाले पृष्ठ पर है। जिन घरों में व्रत चाँद देखकर खुलता है, वे शहरवार चंद्रोदय भी देख लेते हैं। यह पृष्ठ केवल कथा का है, हमारे अपने शब्दों में।
साहूकार की पत्नी और स्याहु का बच्चा
एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसकी पत्नी थी और सात बेटे थे। दीवाली आने में कुछ ही दिन बचे थे, और उस ज़माने में हर साल त्योहार से पहले घर ताज़ी मिट्टी से लीपा जाता था। साहूकार की पत्नी टोकरी और कुदाल लेकर गाँव के बाहर जंगल की ओर गई, जहाँ की मिट्टी मुलायम और साफ़ थी।
उसने एक टीले के पास जगह चुनी और खोदना शुरू किया। उसे पता नहीं था कि उस टीले के नीचे एक स्याहु की माँद है और उसके छोटे-छोटे बच्चे भीतर सो रहे हैं। कुदाल गहरी गई, और जब उसने उसे बाहर निकाला तो फाल पर खून लगा था। मिट्टी हटाकर देखा तो एक नन्हा बच्चा बेजान पड़ा था।
वह बहुत देर तक वहीं बैठी रही। उसका कोई बुरा इरादा नहीं था; वह तो बस त्योहार के लिए घर सँवारना चाहती थी। फिर भी एक छोटी-सी जान उसके हाथ से चली गई थी। भारी मन से वह मिट्टी की टोकरी उठाकर घर लौटी, और किसी से कुछ नहीं कहा।
साल भर के भीतर उसके अपने घर में दुख आ गया। एक-एक करके उसके बेटे बीमार पड़े और चल बसे। कथा में सातों बेटों के जाने की बात आती है, और माँ का दुख बिना किसी लाग-लपेट के कहा जाता है: उसने खाना-पीना छोड़ दिया, बाहर निकलना छोड़ दिया, और जिस घर को उसने इतने चाव से लीपा था, वह सूना हो गया।
आख़िर मोहल्ले की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियाँ उसके पास आकर बैठीं। उसने उन्हें जंगल वाले टीले की पूरी बात बता दी। सबसे बुज़ुर्ग स्त्री ने ध्यान से सुना और बोली — तूने जान-बूझकर कुछ नहीं किया, और उसका दुख भी भोग लिया। अब वह कर जो एक माँ कर सकती है। कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को अहोई माता का व्रत रख, जो सब बच्चों की रक्षा करने वाली माँ हैं। दीवार पर उनका चित्र बना, और उनके पास स्याहु और उसके बच्चों को भी बना, ताकि उस माँ को याद रखे जिसका बच्चा तुझसे छूटा। उससे क्षमा माँग, और हर बच्चे के लिए प्रार्थना कर।
साहूकार की पत्नी ने ठीक ऐसा ही किया। दिन भर व्रत रखा, गेरू से दीवार पर अहोई माता बनाईं, उनके पास स्याहु और बच्चे बनाए, और शाम को चित्र के आगे बैठकर रोते हुए प्रार्थना की। तारे निकलने की राह देखी, उन्हें अर्घ्य दिया, और तभी अन्न ग्रहण किया। फिर वह हर साल यही व्रत रखने लगी। कथा कहती है कि उसके बेटे उसे वापस मिले और घर फिर से भर गया।
कथा को शांत मन से समझें
यह लोककथा है, और लोककथाएँ अक्सर गहरे दुख और फिर लंबी वापसी के सहारे अपनी बात कहती हैं। इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं कि बच्चे माँ की किसी भूल से बीमार होते हैं, और किसी माँ को अपने घर की तकलीफ़ इस कथा से जोड़कर नहीं देखनी चाहिए। आज कथा सुनाने वाली दादी-नानी प्रायः दो सीधी बातें समझाती हैं: छोटे जीवों की परवाह भी माँ के प्रेम का हिस्सा है, और जो भूल ईमानदारी से मान ली जाए, उसका बोझ हल्का हो जाता है। व्रत एक प्रार्थना है, कोई सौदा नहीं। गर्भवती, दूध पिलाने वाली या बीमार माताएँ पानी या फल के साथ व्रत रखती हैं, और डॉक्टर की सलाह सबसे पहले है।
छोटी बहू और स्याहु माता
उत्तर प्रदेश और हरियाणा के बहुत-से घरों में कथा कुछ अलग ढंग से कही जाती है। इसमें साहूकार के सात बेटे, सात बहुएँ और एक बेटी है। दीवाली से पहले बेटी अपनी सातों भाभियों के साथ मिट्टी लेने गई, और उसी की खुरपी से स्याहु का बच्चा मरा। स्याहु माँ गुस्से में माँद से निकली और बोली — मैं तेरी कोख बाँध दूँगी, ताकि तू भी जाने कि बच्चा खोना क्या होता है।
ननद ने एक-एक करके अपनी भाभियों से विनती की कि कोई उसकी जगह यह श्राप ले ले। छह भाभियों ने मना कर दिया। सबसे छोटी भाभी का मन पसीज गया और उसने हाँ कर दी। उसके बाद उसके जो भी बच्चे होते, वे कुछ ही दिन जी पाते।
दुखी होकर उसने एक पंडित जी से उपाय पूछा। उन्होंने कहा कि सुरही गाय की सेवा कर, जो स्याहु माता की सखी है। छोटी बहू रोज़ भोर से पहले चुपचाप गाय का थान साफ़ कर आती, और किसी को पता न चलने देती कि यह कौन करता है। एक दिन सुरही ने उसे पकड़ लिया और पूछा कि तू क्या चाहती है। सारी बात सुनकर गाय उसे साथ लेकर सात समुंदर पार स्याहु माता के पास चल पड़ी।
रास्ते में दोनों एक पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठीं। ऊपर गरुड़ पंखनी का घोंसला था, और एक साँप उसके बच्चों को खाने के लिए चढ़ रहा था। छोटी बहू ने साँप को मार दिया। गरुड़ पंखनी लौटी तो घोंसले के पास खून देखकर समझी कि इसी स्त्री ने उसके बच्चों को मारा है, और उस पर चोंच मारने लगी। फिर नीचे मरा साँप दिखा तो वह लज्जित हुई, और आभार में उसने बहू और गाय दोनों को अपनी पीठ पर बिठाकर समुंदर पार पहुँचा दिया।
वहाँ स्याहु माता मिलीं। छोटी बहू ने उनकी भी सेवा की, उनके बाल सँवारे और उनका ख़याल रखा। जब स्याहु को पता चला कि इस बहू ने वह श्राप अपने सिर लिया था जो उसका था ही नहीं, तो उसका मन पिघल गया और उसने श्राप लौटा लिया। छोटी बहू सात बेटों और सात बहुओं के साथ घर लौटी, और उस दिन से पूरा घर अहोई का व्रत रखने लगा।
कथा के और रूप
- नाम का अर्थ। कुछ बड़े-बूढ़े कहते हैं कि "अहोई" शब्द "अनहोनी" से बना है, यानी जो नहीं होना चाहिए, और अहोई माता अनहोनी को टालने वाली हैं। यह लोक में चली आई व्याख्या है, कोई तय बात नहीं।
- तारों की जगह चाँद। कुछ घरों में कथा के अंत में माँ चाँद की प्रतीक्षा करती है, जो इस अष्टमी को देर से निकलता है, और व्रत तभी खुलता है।
- राधा कुंड। ब्रज में यही रात गोवर्धन के पास राधा कुंड में स्नान से जुड़ी है, और कुछ परिवार अहोई की कथा उसी परंपरा के साथ कहते हैं।
कथा कैसे सुनी जाती है
शाम को घर की माताएँ दीवार पर बने या छपे हुए अहोई माता के चित्र के सामने बैठती हैं, पास में जल से भरा कलश और पूजा की थाली रहती है। सबके हाथ में गेहूँ के सात या कुछ दाने होते हैं, और घर की सबसे बड़ी स्त्री कथा कहती हैं। बच्चे भी पास आकर बैठ जाते हैं, क्योंकि प्रार्थना उन्हीं के लिए है। कथा के बाद दाने सँभालकर रखे जाते हैं, और पहले तारे दिखने पर माँ उन्हें जल के साथ अर्घ्य में चढ़ाती है। पूजा का पूरा क्रम, सामग्री और चाँदी की स्याऊ माला का रिवाज अहोई अष्टमी पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आज यह कथा क्या कहती है
अब ज़्यादातर माताएँ यह व्रत अपनी सभी संतानों के लिए रखती हैं, बेटियों के लिए भी उतना ही जितना बेटों के लिए, और संतान की आस रखने वाली बहुत-सी महिलाएँ भी इसे रखती हैं। कथा आज भी मन को छूती है, क्योंकि यह जीवन की नाज़ुकी को सच्चाई से कहती है और उससे जुड़े पछतावे को नरमी से सँभालती है। चित्र में बनी छोटी-सी स्याहु याद दिलाती है कि माँ की दुआ अपने आँगन से आगे तक जाती है।
इससे चार दिन पहले करवा चौथ आती है, और पूर्वी उत्तर भारत में माताओं का दूसरा बड़ा व्रत जितिया है। शाम की पूजा का समय तय करना हो तो अपने शहर का चौघड़िया देख लें।