शीतला अष्टमी की जो कथा घर-घर में सुनाई जाती है, वह शीतला माता की है, जो एक बूढ़ी माई के रूप में गाँव आईं, रसोइयों के गरम पानी और गरम खाने से झुलस गईं, और जिन्हें केवल एक गरीब कुम्हारिन ने ठंडा पानी पिलाकर रात का बासी खाना खिलाया। इसीलिए बसौड़ा के दिन बहुत-से घरों में चूल्हा नहीं जलता और माता को एक दिन पहले बना ठंडा भोजन चढ़ाया जाता है।
यह दिन होली के बाद आने वाले कृष्ण पक्ष की अष्टमी है। आपके शहर में यह किस दिन है और तिथि कैसे तय होती है, यह शीतला अष्टमी की तिथि वाले पृष्ठ पर है, और सूर्योदय की तिथि पंचांग में देखें। यहाँ केवल कथा है, हमारे अपने शब्दों में।
गाँव में आई बूढ़ी माई
बहुत पुरानी बात है। जाड़ा जाने को था, और शीतला माता के मन में आया कि देखूँ, किसी गाँव के लोग मुझे कैसे याद करते हैं। उन्होंने अपना तेजस्वी रूप छोड़ा और एक बहुत बूढ़ी, दुबली, कमर झुकी माई बनकर हाथ में छोटी-सी पोटली लिए धरती पर उतरीं। वह अष्टमी की सुबह थी।
माई धीरे-धीरे गाँव की गली में चलीं। हर घर में चूल्हा धधक रहा था। औरतें पूरियाँ तल रही थीं, चावल उबाल रही थीं, नहाने का पानी गरम कर रही थीं; किसी के पास किसी अजनबी के लिए समय न था। माई घरों के नीचे से गुज़रीं तो एक ने खिड़की से चावल का उबलता माँड़ बाहर फेंक दिया, दूसरी ने गरम पानी का भगोना गली में उलट दिया, तीसरी ने बिना देखे गरम तवे की जली रोटियाँ बाहर डाल दीं। सब कुछ माई पर गिरा। उनके शरीर पर फफोले उठ आए, और वे दर्द से कराह उठीं।
माई घर-घर जाकर थोड़ा ठंडा पानी और बैठने की जगह माँगती रहीं। एक ने कहा, अभी काम में लगी हूँ। दूसरी बोली, आँगन अभी लीपा है, यहाँ मत बैठो। तीसरी ने दरवाज़ा ही बंद कर लिया। चूल्हों की आँच जैसे गली भर उनके पीछे-पीछे चल रही थी।
गाँव के आख़िरी छोर पर एक कुम्हार की झोपड़ी थी। कुम्हारिन ने उस सुबह चूल्हा नहीं जलाया था; घर में जो खाने को था, वह रात का बचा हुआ था। उसने माई को लड़खड़ाते देखा तो दौड़कर बाहर आई।
उसने माई को छाँव में बिठाया, मटके से ठंडा पानी लाकर धीरे-धीरे उनके सिर और बाँहों पर डाला, और अपनी धोती के पल्लू से हवा की। फिर बोली, "माई, मेरे घर गरम खाने को कुछ नहीं है, बस कल का बचा खाना है।" और उसने माई के आगे थोड़ी रबड़ी, ठंडा भात और दही, और रात की ज्वार की रोटी रख दी।
माई ने खाया, पानी पिया, और उनके शरीर की जलन शांत हो गई। तब कुम्हारिन ने एक अनोखी बात देखी: माई के बालों के नीचे, जहाँ उसने पानी डाला था, सिर के पीछे जैसे एक आँख थी। वह चौंक गई, और माई मुस्कुरा दीं।
अगले ही पल बूढ़ी माई नहीं थीं। उनकी जगह गधे पर बैठी शीतला माता थीं, हाथ में झाड़ू, सूप और ठंडे जल का कलश, आसपास नीम की पत्तियाँ। माता ने कुम्हारिन और उसके घर को आशीर्वाद दिया। कुम्हारिन ने केवल एक बात माँगी: जो कोई इस दिन आपको ठंडा भोजन चढ़ाकर याद करे, उसके घर में सबका स्वास्थ्य बना रहे।
कथा को शांत मन से समझें
बहुत-सी कथाओं में आगे यह भी आता है कि बाकी गाँव में लोग बीमार पड़ गए, या घरों में आग लग गई, और तब गाँव वाले कुम्हारिन के पास गए यह जानने कि भूल कैसे सुधारी जाए। लोककथाएँ अपनी बात पक्की करने के लिए ऐसे बड़े मोड़ ले आती हैं। इसका मतलब यह नहीं कि अष्टमी को खाना बनाने से किसी को बीमारी होगी। कथा की असली बात उसके दो हिस्सों में है: भरी गली में कोई एक बूढ़ी अजनबी के लिए नहीं रुका, और गाँव के आख़िरी छोर पर सबसे गरीब औरत रुक गई। माता उसी में मिलीं जिसे पानी की ज़रूरत थी।
शीतला माता और बीमारी
सदियों तक चेचक और दानों वाले बुख़ार में लोग शीतला माता से प्रार्थना करते रहे, क्योंकि मौसम के इस बदलाव पर ये रोग आम थे; ठंडा पानी, झाड़ू, नीम और आग से आराम, ये सब बीमार की देखभाल का ही हिस्सा थे। यह साफ़ कहना ठीक है कि चेचक अब टीकों से दुनिया से मिट चुकी है, और आज कोई भी बीमारी हो, उसका इलाज डॉक्टर, दवा और टीके से होता है। व्रत अब माता की भक्ति, सफ़ाई, ठंडे भोजन और बच्चों की सेहत पर ध्यान का दिन है।
कथा के और रूप
- दो देवरानी-जेठानी। कुछ घरों में यह कथा एक ही परिवार की दो बहुओं की कही जाती है: जेठानी अष्टमी को गरम खाना बनाती है और उसके घर में परेशानी आती है, देवरानी बासी भोग लगाती है और सुखी रहती है, और फिर जेठानी उससे यह रीति सीखती है।
- राजा की बहू। एक और रूप में राजा के घर के बच्चे बीमार रहते थे, जब तक एक बहू ने बसौड़ा रखकर यह रीति महल में नहीं चलाई।
- गुजरात की शीतला सातम। गुजरात में यह दिन शीतला सातम कहलाता है, जो गुजराती पंचांग से श्रावण कृष्ण सप्तमी है, रांधण छठ के अगले दिन, जब अगले दिन का खाना पहले से बना लिया जाता है।
कथा कैसे सुनी जाती है
अष्टमी की सुबह-सुबह औरतें पिछली शाम बने खाने की थाली लेकर गाँव या मोहल्ले के शीतला माता के थान पर जाती हैं, या घर पर ही पूजा करती हैं। जल, हल्दी और रोली चढ़ाने के बाद सब साथ बैठती हैं और कोई बड़ी-बूढ़ी बूढ़ी माई और कुम्हारिन की कथा सुनाती है। पूजा का पूरा क्रम शीतला अष्टमी पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आज यह कथा क्या कहती है
बसौड़ा रसोई और रसोई करने वाली, दोनों को एक दिन की छुट्टी देता है, गर्मी आते ही खाना सादा रखता है, और घर को झाड़ने-धोने की याद दिलाता है। और सबसे बढ़कर वही सवाल पूछता है जो कथा पूछती है: हमारी अपनी गली में किसे छाँव में बैठने की जगह और एक लोटा ठंडे पानी की ज़रूरत है?
यह पर्व होलिका दहन के लगभग एक सप्ताह बाद आता है, और साल में आगे माताएँ बच्चों के लिए एक और अष्टमी रखती हैं, अहोई अष्टमी। मंदिर जाना हो और भीड़ से बचकर अच्छा समय चाहिए, तो अपने शहर का चौघड़िया देखें।