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व्रत कथा · होलिका दहन

होलिका दहन की कथा: प्रह्लाद, होलिका और नरसिंह

होलिका दहन की कथा सरल हिंदी में: हिरण्यकशिपु का वरदान, प्रह्लाद की भक्ति, होलिका की आग से बचाने वाली चादर, नरसिंह अवतार, और कामदहन की कथा।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यहाँ कथा हमारे अपने शब्दों में है, जैसे परिवारों में पूजा के समय सुनाई जाती है। क्षेत्र और घर के हिसाब से कथा के रूप बदलते हैं; कथा में कहीं चेतावनी आए तो वह कहानी का हिस्सा है, पढ़ने वाले के लिए डर की बात नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

इस पृष्ठ पर

होलिका दहन की कथा भक्त प्रह्लाद की है, जो पिता के लाख कहने पर भी विष्णु का नाम लेना नहीं छोड़ता था, और उसकी बुआ होलिका की, जो यह सोचकर उसे गोद में लेकर आग में बैठी कि आग उसे छू नहीं सकती, पर ख़ुद जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित निकल आया। फाल्गुन पूर्णिमा की शाम जलने वाली होली उसी रात की याद है, और कथा कुछ दिन बाद नरसिंह भगवान पर पूरी होती है।

आपके शहर में होलिका दहन किस दिन है और मुहूर्त क्या है, भद्रा कब ख़त्म होती है, यह सब शहरवार तालिका के साथ होलिका दहन की तिथि वाले पृष्ठ पर है; अगले दिन रंगों की होली होली के पृष्ठ पर। यहाँ केवल कथा है, हमारे अपने शब्दों में।

प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु

बहुत पहले हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नाम के दो दैत्य भाई इतने बलवान हो गए कि तीनों लोक उनसे काँपने लगे। जब विष्णु ने वराह रूप लेकर हिरण्याक्ष का अंत किया, तो हिरण्यकशिपु का शोक विष्णु से गहरी दुश्मनी में बदल गया।

वह पहाड़ों में जाकर बरसों कठोर तप करता रहा, जब तक ब्रह्मा जी वर देने न आ गए। उसने ऐसी मृत्यु माँगी जो कोई दे ही न सके: न मनुष्य मारे न पशु, न दिन में न रात में, न घर के भीतर न बाहर, न धरती पर न आकाश में, और न किसी अस्त्र-शस्त्र से। ब्रह्मा जी ने वर दे दिया। अब उसने अपने को अमर समझा और घोषणा कर दी कि भगवान केवल वही है; सारे मंदिर, सारी पूजा अब उसी की होगी।

जब वह तप में था, तब उसकी रानी कयाधु को नारद मुनि ने अपने आश्रम में शरण दी थी। गर्भ में पल रहे बच्चे ने वहीं नारद जी से विष्णु की कथाएँ सुनीं। वही बच्चा प्रह्लाद था। वह बड़ा होकर सरल, हँसमुख बालक बना, जिसका मन बस विष्णु में लगा था, और कोई कितना भी समझाए, वह बदलता नहीं था।

पिता ने उसे दरबार के गुरुओं शंड और अमर्क के पास राजनीति पढ़ने और विष्णु को भूलने भेजा। घर लौटने पर पिता ने पूछा कि क्या सीखा, तो प्रह्लाद बोला कि सबसे अच्छी बात जो उसने जानी, वह है हरि का स्मरण। राजा आग-बबूला हो गया। पहले उसने समझाया, फिर धमकाया, और फिर, कथा कहती है, बेटे को मरवाने का हुक्म दे दिया: पहाड़ से गिराया गया, हाथियों के आगे डाला गया, विष दिया गया, साँपों के बीच छोड़ा गया। हर बार प्रह्लाद शांत बैठकर विष्णु का नाम लेता रहा, और हर बार बच निकला।

होलिका और अग्नि

आख़िर राजा ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका के पास आग से बचने का साधन था: कुछ कथाओं में ब्रह्मा जी की दी हुई एक चादर, कुछ में एक वरदान। योजना सीधी थी। लकड़ियों का बड़ा ढेर लगेगा, होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर उस पर बैठेगी, और आग लगा दी जाएगी। होलिका बच जाएगी, बालक नहीं।

फाल्गुन की पूर्णिमा को चिता तैयार हुई। होलिका प्रह्लाद को लेकर बैठ गई, लकड़ियों में आग लगाई गई और लपटें उठने लगीं। प्रह्लाद न रोया, न छटपटाया। उसने आँखें बंद कीं और विष्णु को याद किया।

कथा कहती है कि तभी ज़ोर की हवा चली, और वह चादर होलिका के कंधों से उड़कर प्रह्लाद के चारों ओर लिपट गई। जो वरदान भले के लिए मिला था, वह किसी क्रूर काम में अपने धारण करने वाले की रक्षा नहीं कर सकता था। होलिका आग में जल गई, और जब लपटें बैठीं तो प्रह्लाद राख के बीच से हरि का नाम लेता हुआ सकुशल बाहर आ गया।

डरे-सहमे खड़े नगर के लोग ख़ुशी से चिल्ला उठे। उसी रात की आग होलिका दहन में जलाई जाती है।

नरसिंह अवतार

हिरण्यकशिपु का क्रोध और बढ़ गया। एक शाम अपने महल के दरबार की चौखट पर उसने प्रह्लाद से पूछा, "कहाँ है तेरा विष्णु? क्या इस खंभे में है?" प्रह्लाद ने कहा कि विष्णु हर जगह हैं, इस खंभे में भी। राजा ने गदा से खंभे पर प्रहार किया।

खंभा फट गया, और उसमें से नरसिंह प्रकट हुए, न पूरे मनुष्य न पूरे पशु, मनुष्य का शरीर और सिंह का मुख। वह गोधूलि का समय था, न दिन न रात। वे राजा को उठाकर चौखट पर ले गए, न भीतर न बाहर, अपनी जाँघों पर रखा, न धरती न आकाश, और अपने नाख़ूनों से, जो कोई अस्त्र नहीं थे, उसका अंत कर दिया। वरदान की हर शर्त पूरी रही।

प्रह्लाद निडर होकर नरसिंह के सामने खड़ा रहा और प्रार्थना से उनका क्रोध शांत किया। समय आने पर वह राजा बना और न्याय से राज किया।

कथा को शांत मन से समझें

इस कथा में बहुत हिंसा है: एक पिता जो अपने ही बच्चे को मारना चाहता है, एक बुआ जो इसमें साथ देती है, और दो मौतें। जो घर बच्चों को यह कथा सुनाते हैं, वे प्रायः प्रह्लाद को मारने के प्रयास थोड़े में कहते हैं और उसकी शांति पर ज़्यादा रुकते हैं। यह किसी को जलाने की कथा नहीं है, और होलिका दहन की चिता लकड़ी और उपलों की होती है। कथा यही कहती है कि घमंड और क्रूरता कितने भी सुरक्षित दिखें, टिकते नहीं, और शांत भरोसा उनसे बड़ा है।

फाल्गुन पूर्णिमा की और कथाएँ

  • राधा और कृष्ण। ब्रज में अगले दिन के रंग कृष्ण के हैं। कहते हैं, नन्हे कन्हैया ने यशोदा मैया से शिकायत की कि राधा गोरी क्यों हैं और मैं साँवला क्यों। मैया हँसकर बोलीं, जाओ, राधा के मुँह पर जो रंग चाहो लगा दो। उसी से शुरू हुई गोपियों के साथ रंगों की ठिठोली आज बरसाना, नंदगाँव, मथुरा और वृंदावन में याद की जाती है।
  • कामदहन। तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में फाल्गुन पूर्णिमा शिव और कामदेव की कथा से जुड़ी है। सती के जाने के बाद शिव जी गहरी समाधि में थे; देवताओं ने कामदेव को भेजा कि उनकी समाधि टूटे और वे पार्वती से विवाह करें। कामदेव ने फूलों का बाण चलाया, और शिव जी ने तीसरा नेत्र खोलकर उन्हें भस्म कर दिया। कामदेव की पत्नी रति विलाप करने लगीं, तो शिव जी का मन पिघला और उन्होंने कामदेव को बिना शरीर के, अनंग रूप में फिर जीवन दिया। इस रात वहाँ कामदेव के नाम की अग्नि जलती है, और कुछ गाँवों में रति के विलाप के गीत गाए जाते हैं।
  • ढुंढी। कुछ पुरानी कथाओं में यह आग ढुंढी नाम की राक्षसी को भगाने के लिए जलाई जाती है, जो बच्चों को सताती थी; इसीलिए लड़के शोर मचाते और खेलते हुए उसे भगाते हैं।

कथा कैसे सुनी जाती है

शाम को मोहल्ले के परिवार होलिका के आसपास इकट्ठा होते हैं, औरतें कच्चा सूत लपेटती हैं और पूजा करती हैं, और आग जलने से पहले यह कथा सुनाई जाती है। मुहूर्त की प्रतीक्षा में दादा-दादी बच्चों को प्रह्लाद की कहानी सुनाते हैं। पूजा का पूरा क्रम होलिका दहन पूजा विधि पृष्ठ पर है।

आज यह कथा क्या कहती है

होलिका दहन वह रात है जब पूरा मोहल्ला अपनी पुरानी लकड़ी, आपसी मनमुटाव और जाड़े की ठंड एक ही आग में जला देता है, और उसी आग में नई फ़सल की पहली बालियाँ भूनता है। अगली सुबह वही गली रंगों से खेलती है। लगभग एक सप्ताह बाद उत्तर भारत के बहुत-से घर शीतला अष्टमी मनाते हैं, और इससे पहले शिव जी की बड़ी रात महाशिवरात्रि आ चुकी होती है। दहन का समय पूर्णिमा और भद्रा से तय होता है; दिन के बाकी कामों के लिए मुहूर्त और चौघड़िया देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

होलिका दहन की कहानी क्या है?

दैत्यराज हिरण्यकशिपु चाहता था कि सब उसी को भगवान मानें, पर उसका बेटा प्रह्लाद केवल विष्णु का नाम लेता था। बेटे को डिगाने और मारने के सारे प्रयास विफल हुए, तो राजा की बहन होलिका, जिसके पास आग से बचाने वाली चादर या वरदान था, प्रह्लाद को गोद में लेकर जलती चिता पर बैठी। चादर उड़कर प्रह्लाद पर आ गई, और होलिका जल गई।

होलिका कौन थी?

होलिका हिरण्यकशिपु की बहन थी। ज़्यादातर कथाओं में उसके पास एक चादर थी, या उसे वरदान मिला था, कि आग उसे नहीं जलाएगी, और उसने भाई की योजना में साथ दिया। फाल्गुन पूर्णिमा की अग्नि उसी के नाम पर होलिका कहलाती है।

कामदहन क्या है?

दक्षिण भारत के कई हिस्सों में फाल्गुन पूर्णिमा पर शिव जी द्वारा तीसरे नेत्र से कामदेव को भस्म करने की कथा याद की जाती है, और रति के विलाप के बाद कामदेव के बिना शरीर के अनंग रूप में लौटने की। उत्तर के होलिका दहन की रात ही वहाँ कामदहन की अग्नि जलती है।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • भागवत पुराण और विष्णु पुराण (प्रह्लाद और नरसिंह की कथा), जैसा व्रत-पुस्तकों में मिलता है
  • होलिका पूजन पर उत्तर भारत में कही जाने वाली कथा
  • शिव पुराण (कामदेव और शिव) और तमिलनाडु, कर्नाटक व आंध्र प्रदेश की लोक परंपरा, यहाँ अपने शब्दों में

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति