त्योहार · 2026
होली 2026 — बुधवार, 4 मार्च 2026
होली रंगों का पर्व है, जो होलिका दहन के अगले दिन वसंत के स्वागत, रिश्तों को नया करने और राधा-कृष्ण की याद में खेली जाती है।
2026 में
बुधवार, 4 मार्च 2026
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 06:43 / 18:22
- होलिका दहन: 3 मार्च 2026
नियम: होलिका दहन का अगला दिन (पूर्णिमांत में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) — रंगों का दिन।
2027 में
सोमवार, 22 मार्च 2027
- सूर्योदय / सूर्यास्त
- 06:23 / 18:33
- होलिका दहन: 21 मार्च 2027
नियम: होलिका दहन का अगला दिन (पूर्णिमांत में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) — रंगों का दिन।
समय नई दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त से। दूसरे शहरों में मुहूर्त कुछ मिनट खिसकते हैं, और कभी-कभी तिथि एक दिन। पूरा त्योहार कैलेंडर
होली क्या है
रंगों का पर्व होली होलिका दहन के अगले दिन, पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को मनाई जाती है। यह सबसे प्रिय हिंदू त्योहारों में है: गलियाँ गुलाल और रंगीन पानी से सराबोर लोगों से भर जाती हैं, जो दोस्तों, परिवार और अनजानों पर भी रंग डालते हैं। इसे धुलेंडी, धूलिवंदन या रंगवाली होली भी कहते हैं, और यह वसंत के पूरे रंग में आने का उत्सव है।
रंगों का सबसे गहरा नाता श्रीकृष्ण से है। कथा है कि साँवले कृष्ण को चिंता थी कि गोरी राधा उन्हें अपनाएँगी या नहीं; माँ यशोदा ने हँसी में कहा कि वे राधा के चेहरे पर अपनी पसंद का रंग लगा दें। यही ठिठोली ब्रज में परंपरा बन गई। होली में पिछली रात की प्रह्लाद कथा भी जुड़ी है: अग्नि के बाद नया दिन उल्लास से शुरू होता है।
होली का सामाजिक अर्थ भी उतना ही बड़ा है जितना धार्मिक। एक दिन के लिए उम्र, जाति और पद की दीवारें ढीली पड़ जाती हैं; लोग पड़ोसियों के घर जाते हैं और पुराने गिले-शिकवे भुलाकर गले मिलते हैं। बहुत-से घरों में दिन का अंत स्नान, नए कपड़ों और मिठाई लेकर रिश्तेदारों से मिलने के साथ होता है। यह नवीनता का पर्व है, ऋतु की भी और उन रिश्तों की भी जो सालभर समाज को जोड़े रखते हैं।
कैसे मनाया जाता है
- सूखे गुलाल और रंगीन पानी से होली खेलना, कई जगह सुबह से लेकर दोपहर तक।
- दोस्तों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों से मिलना और अभिवादन में थोड़ा रंग लगाना।
- गुझिया, मालपुआ, दही भल्ले और ठंडाई बनाना।
- सामूहिक बैठकों में ढोलक के साथ फाग और होली के गीत गाना।
- रंग खेलने के बाद स्नान कर नए कपड़े पहनना और शाम को बड़ों से मिलने जाना।
- प्राकृतिक या त्वचा के लिए सुरक्षित रंग चुनना, जिन्हें अब कई परिवार पसंद करते हैं।
तिथि कैसे तय होती है
होली होलिका दहन के अगले दिन खेली जाती है। उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत पंचांग में यह चैत्र कृष्ण प्रतिपदा है, यानी फाल्गुन पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष का पहला दिन। हमारा पंचांग पहले पूर्णिमा, प्रदोष काल और भद्रा के आधार पर होलिका दहन तय करता है, और उसका अगला दिन होली होता है। भद्रा के कारण होलिका दहन खिसके, तो होली भी उसी के साथ खिसकती है।
क्षेत्रीय अंतर
मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगाँव वाले ब्रज क्षेत्र में होली एक सप्ताह से अधिक चलती है, जिसमें लट्ठमार होली और फूलों वाली होली शामिल हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में पूर्णिमा ही दोल यात्रा या दोल पूर्णिमा है, जब राधा-कृष्ण को झूले में बिठाकर रंग खेला जाता है, इसलिए वहाँ रंगों का दिन उत्तर भारत से एक दिन पहले पड़ सकता है। महाराष्ट्र में पाँच दिन बाद रंगपंचमी भी मनाई जाती है, और अमांत पंचांग में फाल्गुन पूर्णिमा के अगले दिन को फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा गिना जाता है।
तिथियाँ और समय हमारा अपना इंजन गणना करता है (सूर्योदय, तिथि और काल नई दिल्ली के लिए, लाहिड़ी अयनांश)। दूसरे शहर में, या किसी दूसरी परंपरा के पंचांग में, तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने कुल पुरोहित की परंपरा मानें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
होली पूर्णिमा को होती है या अगले दिन?
होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की शाम होता है और रंगों वाली होली अगले दिन। बंगाल और ओडिशा में दोल पूर्णिमा के रंग पूर्णिमा के दिन ही खेले जाते हैं।
होली को रंगों का त्योहार क्यों कहते हैं?
परंपरा रंगों को ब्रज के कृष्ण और राधा से जोड़ती है, जहाँ कृष्ण ने ठिठोली में राधा के चेहरे पर रंग लगाया था। गुलाल और रंगीन पानी की यही रीति आगे चलकर वसंत का उत्सव बन गई।
होली की तारीख़ हर साल क्यों बदलती है?
होली चांद्र पंचांग पर निर्भर है, क्योंकि यह फाल्गुन पूर्णिमा और होलिका दहन के बाद आती है, इसलिए अंग्रेज़ी कैलेंडर में इसकी तारीख़ हर साल बदलती है। इस वर्ष की तारीख़ ऊपर दी गई है।