मुख्य सामग्री पर जाएँ
सतमार्ग ज्योतिषSatmarg Astro

त्योहार · 2026

होलिका दहन 2026 — मंगलवार, 3 मार्च 2026

होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की शाम जलाई जाने वाली पवित्र अग्नि है, जो प्रह्लाद की कथा की याद दिलाती है और होली के पर्व का आरंभ करती है।

2026 में

मंगलवार, 3 मार्च 2026

तिथि
पूर्णिमा: 2 मार्च, 17:56 – 3 मार्च, 17:07
चांद्र मास
फाल्गुन
सूर्योदय / सूर्यास्त
06:44 / 18:22
मुहूर्त और काल
होलिका दहन मुहूर्त18:22 – 20:50
भद्रा (वर्जित)2 मार्च, 17:56 – 05:28

नियम: फाल्गुन पूर्णिमा जो प्रदोष काल में हो, भद्रा (विष्टि करण) के बाहर। इस वर्ष पहली संध्या में भद्रा आधी रात के बाद तक है, और अगले दिन पूर्णिमा सूर्योदय के बाद साढ़े तीन प्रहर तक है तथा प्रतिपदा वृद्धिगामी है — इसलिए उस संध्या के प्रदोष में दहन।

2027 में

रविवार, 21 मार्च 2027

तिथि
पूर्णिमा: 21 मार्च, 18:21 – 22 मार्च, 16:13
चांद्र मास
फाल्गुन
सूर्योदय / सूर्यास्त
06:24 / 18:32
मुहूर्त और काल
प्रदोष काल18:32 – 20:54
भद्रा (वर्जित)18:21 – 22 मार्च, 05:15

नियम: फाल्गुन पूर्णिमा जो प्रदोष काल में हो, भद्रा (विष्टि करण) के बाहर। इस वर्ष भद्रा आधी रात के बाद तक है और अगले दिन का अपवाद लागू नहीं — इसलिए प्रदोष में दहन; अनेक आचार्य भद्रा पुच्छ का समय लेते हैं।

समय नई दिल्ली के सूर्योदय-सूर्यास्त से। दूसरे शहरों में मुहूर्त कुछ मिनट खिसकते हैं, और कभी-कभी तिथि एक दिन। पूरा त्योहार कैलेंडर

होलिका दहन क्या है

होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की शाम जलाई जाने वाली पवित्र अग्नि है। यह हिंदू चांद्र वर्ष की अंतिम पूर्णिमा है और होली की पहली रात भी, यानी रंगों वाले दिन से पहले की शाम। गाँवों और कस्बों में कई दिन पहले से किसी चौराहे या खुले मैदान में लकड़ी, उपलों और सूखी टहनियों से होलिका सजाई जाती है, और सूर्यास्त के बाद पूरा समुदाय उसे जलाने के लिए इकट्ठा होता है।

इस पर्व का नाम दैत्यराज हिरण्यकशिपु की बहन होलिका से जुड़ा है। अपने पुत्र प्रह्लाद की विष्णु-भक्ति से क्रोधित राजा ने होलिका को, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान बताया जाता है, प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठने को कहा। कथा के अनुसार होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बाहर आ गए। यह अग्नि अहंकार और क्रूरता पर आस्था और अच्छाई की जीत का प्रतीक मानी जाती है।

गाँवों में यह अग्नि फ़सल से जुड़ा अनुष्ठान भी है। किसान नए गेहूँ और जौ की बालियाँ तथा हरे चने आग में भूनकर प्रसाद के रूप में बाँटते हैं, मानो नई फ़सल का पहला अंश अर्पित कर रहे हों। परिवार अग्नि की परिक्रमा करते हैं और कई लोग उसकी थोड़ी राख घर ले जाते हैं। श्रद्धालुओं के लिए समय का बड़ा महत्व है, इसीलिए दहन पूर्णिमा, प्रदोष काल और भद्रा से बचाव के नियमों से तय होता है।

कैसे मनाया जाता है

  • कई दिनों तक लकड़ी, उपलों और सूखी टहनियों से होलिका तैयार करना।
  • दहन से पहले रोली, अक्षत, फूल, कच्चा सूत, हल्दी और नारियल से होलिका का पूजन।
  • परिक्रमा करते हुए होलिका पर कच्चा सूत लपेटना, प्रायः तीन या सात बार।
  • सूर्यास्त के बाद, भद्रा से बचते हुए, मुहूर्त में अग्नि प्रज्वलित करना।
  • नए गेहूँ या जौ की बालियाँ आग में भूनकर बाँटना।
  • कुछ घरों में दिन में उबटन लगाना और उतरे हुए उबटन को होलिका की आग में डालना।
  • अग्नि की थोड़ी राख घर लाना, जिसे बहुत-से लोग रक्षा का प्रतीक मानते हैं।

तिथि कैसे तय होती है

होलिका दहन के लिए तीन बातें एक साथ चाहिए: फाल्गुन पूर्णिमा, प्रदोष काल और भद्रा (विष्टि करण) का न होना, क्योंकि परंपरा भद्रा को दहन के लिए उपयुक्त नहीं मानती। यहाँ प्रदोष का अर्थ है सूर्यास्त से रात के पहले पाँचवें भाग तक का समय। हमारा पंचांग वह शाम लेता है जब प्रदोष में पूर्णिमा हो, फिर भद्रा की जाँच करता है। यदि भद्रा प्रदोष को ढक ले पर आधी रात से पहले समाप्त हो जाए, तो दहन भद्रा समाप्त होने के बाद, मध्यरात्रि से पहले होता है। यदि भद्रा मध्यरात्रि के बाद तक रहे, और अगले दिन पूर्णिमा सूर्योदय के बाद साढ़े तीन प्रहर तक रहे तथा प्रतिपदा पूर्णिमा से लंबी हो (वृद्धि), तो अगली शाम का प्रदोष लिया जाता है। अन्यथा दहन प्रदोष में ही होता है; इसे भद्रा पुच्छ की स्थिति कहते हैं, जब भद्रा का अंतिम भाग स्वीकार्य माना जाता है।

क्षेत्रीय अंतर

होलिका दहन का सबसे बड़ा रूप उत्तर और मध्य भारत में दिखता है, जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और मथुरा-वृंदावन का ब्रज क्षेत्र, जहाँ उत्सव कई दिनों तक चलता है। महाराष्ट्र और गोवा में यह अग्नि होळी या शिमगा कहलाती है, और दक्षिण के कुछ हिस्सों में इसी पूर्णिमा को काम दहनम् के रूप में मनाया जाता है, जो शिव द्वारा कामदेव को भस्म करने की स्मृति है। बंगाल और ओडिशा में यह पूर्णिमा दोल पूर्णिमा है, जिसका केंद्र अग्नि नहीं बल्कि श्रीकृष्ण हैं, हालाँकि वहाँ कुछ समुदाय एक शाम पहले अलाव जलाते हैं।

तिथियाँ और समय हमारा अपना इंजन गणना करता है (सूर्योदय, तिथि और काल नई दिल्ली के लिए, लाहिड़ी अयनांश)। दूसरे शहर में, या किसी दूसरी परंपरा के पंचांग में, तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने कुल पुरोहित की परंपरा मानें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

होलिका दहन भद्रा में क्यों नहीं किया जाता?

परंपरा भद्रा यानी विष्टि करण को इस अग्नि के लिए उपयुक्त नहीं मानती, इसलिए जहाँ तक संभव हो दहन का समय भद्रा से बचाकर रखा जाता है। भद्रा देर रात तक रहे तो तय नियमों से निर्णय होता है कि प्रतीक्षा करें, अगली शाम दहन करें या भद्रा पुच्छ में; इस वर्ष का समय ऊपर दिया गया है।

क्या होलिका दहन होली से एक दिन पहले होता है?

हाँ। होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की शाम होता है और रंगों वाली होली अगले दिन खेली जाती है।

होलिका दहन की कथा क्या है?

यह विष्णु-भक्त प्रह्लाद की कथा है, जिन्हें उनके पिता हिरण्यकशिपु ने बुआ होलिका की गोद में बिठाकर आग में जलाना चाहा। मान्यता है कि होलिका जल गई और प्रह्लाद को आँच तक नहीं आई, इसलिए यह अग्नि क्रूरता पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।