होलिका दहन की पूजा फाल्गुन पूर्णिमा की शाम होलिका के ढेर की पूजा है, जिसके बाद मुहूर्त में उसे जलाया जाता है और उसकी आग में नई फ़सल की बालियाँ भूनी जाती हैं। संक्षेप में: पहले के दिनों में होलिका सजाएँ, शाम को इकट्ठा हों, जल, रोली, अक्षत, फूल और गुलाल से पूजा करें, कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करें, भद्रा उतरने पर आग जलाएँ, और सबको आग से सुरक्षित दूरी पर रखें।
आपके शहर का मुहूर्त, और भद्रा कब ख़त्म होती है यह दिखाने वाली तालिका, होलिका दहन की तिथि वाले पृष्ठ पर है; अगले दिन रंगों वाली होली होली के पृष्ठ पर। समय यहाँ नहीं लिखे गए, क्योंकि वे शहर और साल के साथ बदलते हैं।
पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें
होलिका के लिए (मोहल्ला या गाँव मिलकर जुटाता है):
- सूखी लकड़ी, गिरी हुई डालें और टहनियाँ
- उपले, और बहुत-से घरों में बच्चों के हाथ से बने गोबर के छोटे छल्ले, बड़कुल्ले या गुलरी, जिनकी मालाएँ बनती हैं
- कुछ जगहों पर बीच में गाड़ा जाने वाला अरंडी या किसी और पौधे का हरा डंडा, जिसे प्रह्लाद का प्रतीक माना जाता है
परिवार की थाली:
- जल से भरा लोटा
- रोली, हल्दी, अक्षत, फूल और गुलाल
- कच्चा सूत, पूरी एक लच्छी
- नारियल, बताशे या मिठाई, और साबुत मूँग या चने
- भूनने के लिए गेहूँ और जौ की नई बालियाँ, या हरे चने के बूटे
- घी का दीया और धूप
- कुछ घरों में दिन में लगाया गया उबटन, जो उतारकर आग में डालने के लिए रख लिया जाता है
पूजा का क्रम
- होलिका सजाना। बहुत-से कस्बों में होलाष्टक के पहले दिन, यानी पूर्णिमा से आठ दिन पहले, जगह तय करके डंडा गाड़ दिया जाता है, और रोज़ थोड़ा-थोड़ा ढेर बढ़ता है। पूर्णिमा की शाम देख लें कि होलिका खुली जगह पर है, बिजली के तारों, छतों, गाड़ियों और भूसे के ढेर से दूर।
- दिन की तैयारी। बहुत-से घरों में दिन में बच्चों और बड़ों को उबटन लगाया जाता है और उतरा हुआ उबटन आग के लिए रख लिया जाता है। सूरज ढलने से पहले थाली तैयार कर लें।
- होलिका के पास। शाम को मोहल्ले के परिवार इकट्ठा होते हैं। होलिका के सामने पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें या खड़े हों, और एक फूल व थोड़े अक्षत से गणेश जी का स्मरण करें।
- होलिका पूजन। होलिका पर जल छिड़कें। रोली, हल्दी, अक्षत, फूल, गुलाल, मूँग और बताशे चढ़ाएँ। नारियल और बड़कुल्लों की मालाएँ नीचे रखें। बहुत-से लोग यहाँ अपने शब्दों में प्रह्लाद और नरसिंह भगवान को याद करते हैं।
- सूत और परिक्रमा। कच्चे सूत का सिरा पकड़कर होलिका की परिक्रमा करें, घड़ी की सुई की दिशा में, और सूत को उस पर लिपटने दें; घर की रीति के अनुसार तीन या सात बार। परिक्रमा पूरी करते हुए लोटे से जल की पतली धार दें।
- कथा। मुहूर्त की प्रतीक्षा में कोई बड़ा-बूढ़ा प्रह्लाद और होलिका की होलिका दहन की कथा सुनाता है।
- आग जलाना। मुहूर्त में, भद्रा उतरने के बाद, प्रायः कोई बुज़ुर्ग या पुरोहित किसी घर से लाई लौ या दीये से होलिका जलाते हैं। कुछ गाँवों में आग पकड़ते ही बीच का हरा डंडा खींच लिया जाता है, प्रह्लाद के बच निकलने की याद में।
- नई बालियाँ भूनना। गेहूँ-जौ की बालियाँ या हरे चने लंबी लकड़ी पर बाँधकर आग के किनारे हल्का भूनें और प्रसाद की तरह बाँटें। घर की रीति हो तो उबटन आग में डालें।
- जलती होली की परिक्रमा। बहुत-से परिवार अच्छी दूरी रखते हुए जलती आग की एक बार फिर परिक्रमा करते हैं और घर के लिए प्रार्थना करते हैं।
- राख और अगली सुबह। कुछ परिवार अगली सुबह ठंडी हो चुकी थोड़ी राख घर लाते हैं और उसका तिलक लगाते हैं, जिसे बहुत-से लोग रक्षा का प्रतीक मानते हैं। उसी दिन रंगों की होली होती है।
समय कैसे देखें
मुहूर्त तीन बातों से तय होता है: पूर्णिमा तिथि, सूर्यास्त के बाद का प्रदोष काल, और भद्रा। परंपरा भद्रा के रहते आग जलाने से बचती है; भद्रा रात में देर तक चले तो नियम उसके पुच्छ भाग या किसी दूसरे समय की अनुमति देते हैं, और आपके शहर में कौन-सा नियम लगेगा, यह तिथि वाले पृष्ठ पर दिया है। शहरवार तालिका होलिका दहन की तिथि वाले पृष्ठ पर देखें; दिन के बाकी कामों के लिए मुहूर्त और चौघड़िया काम आते हैं।
आग से सावधानी
- होलिका खुली जगह पर सजाएँ, घरों, बिजली के तारों, खड़ी गाड़ियों, गैस सिलेंडरों और सूखे भूसे से दूर।
- प्लास्टिक, टायर, रबड़ या रंगी हुई लकड़ी न डालें; उनका धुआँ सेहत के लिए नुकसानदेह है।
- बच्चों और बुज़ुर्गों को लपटों से पीछे रखें; बालियाँ भूनते या परिक्रमा करते समय दुपट्टा, साड़ी का पल्लू और लंबे बाल बाँधकर रखें।
- पास में पानी या रेत की बाल्टियाँ रखें, और आग बैठ जाने तक वहीं रहें।
- आग में पटाखे या पूजा सामग्री के अलावा कुछ न फेंकें।
परिवारों के रीति-रिवाज
ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं। आपके घर की रीति सबसे पहले है।
- होलाष्टक के आठ दिनों में बहुत-से परिवार विवाह, गृह प्रवेश और दूसरे मांगलिक काम नहीं करते।
- कुछ परिवारों में नई बहू पहले साल ससुराल की होली जलती नहीं देखती और होली मायके में मनाती है।
- गाँवों में नई फ़सल की पहली भुनी बालियाँ फ़सल के आशीर्वाद की तरह ली जाती हैं।
- बहुत-से लोग फाल्गुन पूर्णिमा को पूजा तक व्रत रखते हैं; गर्भवती, बीमार और बुज़ुर्ग डॉक्टर की सलाह से खाएँ-पिएँ।
प्रांतों के अपने ढंग
- ब्रज (मथुरा, वृंदावन, बरसाना): होली कई दिन चलती है; बरसाना और नंदगाँव में लट्ठमार होली होती है, और फालैन गाँव में परंपरा से एक पंडा होलिका के अंगारों के बीच से निकलता है।
- उत्तर प्रदेश और बिहार: हर मोहल्ले के चौराहे पर होलिका जलती है और उसके आसपास फाग गाया जाता है; बिहार के कुछ इलाकों में इसे सम्मत कहते हैं।
- राजस्थान और गुजरात: महिलाएँ थाली लेकर मोहल्ले की होलिका पर जाती हैं और सब मिलकर सूत लपेटती हैं; गुजरात में खजूर, धाणी (भुनी ज्वार) और नारियल चढ़ाकर बाँटे जाते हैं।
- महाराष्ट्र और गोवा: होली या शिमगा, होली की अग्नि, भोग में पूरन पोली, और पाँच दिन बाद रंगपंचमी।
- दक्षिण भारत: उसी पूर्णिमा पर शिव और कामदेव की याद में कामदहन की अग्नि।
पूजा के बाद
भुनी बालियाँ और मिठाई बाँटें। रंगों वाले दिन के बारे में होली के पृष्ठ पर पढ़ें। लगभग एक सप्ताह बाद शीतला अष्टमी आती है, और इस मौसम की शिव जी की बड़ी रात महाशिवरात्रि है।