गोवर्धन पूजा में गिरिराज गोवर्धन और गिरधारी कृष्ण की पूजा होती है — आँगन में गोबर से छोटा-सा गोवर्धन बनाकर, उसकी परिक्रमा करके, अन्नकूट का भोग लगाकर और गायों का आदर करके। संक्षेप में: नहा-धोकर आँगन लीपें, गोबर या मिट्टी से गोवर्धन बनाएँ, रोली, चावल, फूल और दीये से पूजें, अन्नकूट चढ़ाएँ, परिवार के साथ परिक्रमा करें, फिर गायों को खिलाएँ, सजाएँ और प्रसाद बाँटें।
यह पूजा प्रायः दीपावली की अगली सुबह होती है; दिन और तिथि का नियम गोवर्धन पूजा की तिथि वाले पृष्ठ पर है। यहाँ उसे नहीं दोहराया गया, क्योंकि तिथि हर साल बदलती है।
सामग्री: क्या तैयार रखें
- ताज़ा गोबर, या साफ़ मिट्टी, गोवर्धन बनाने के लिए; पहले आँगन बुहारने-धोने को झाड़ू और पानी
- पर्वत सजाने को छोटी टहनियाँ, दूब, रुई या फूल, और उसी गोबर से बनी छोटी-छोटी गायें, बछड़े और ग्वाले
- रोली, हल्दी, अक्षत, कलावा, फूल और माला
- घी का दीया, धूपबत्ती, और गोवर्धन की नाभि में रखने को एक छोटा मिट्टी का दीया
- दूध, दही, शहद, बताशे, और लोटे में थोड़ा गंगाजल या साफ़ पानी
- अन्नकूट के पकवान (नीचे देखें), ऊपर तुलसी दल रखकर
- दीपावली की बची खील और बताशे, जो बहुत-से घरों में फिर चढ़ाए जाते हैं
- गायों के लिए गुड़, हरा चारा या रोटियाँ, और उनके लिए माला व तिलक
- चाहें तो गिरिराज के पास गिरधारी कृष्ण की तस्वीर या छोटी मूर्ति
इनमें से कुछ भी ख़ास नहीं होना चाहिए। आँगन न हो या गोबर न मिले, तो थाली में मिट्टी या पकवानों का छोटा-सा ढेर और कान्हा की तस्वीर भी पूरी पूजा है।
पूजा का क्रम
- सुबह की सफ़ाई और स्नान। जहाँ गोवर्धन बनेगा, वह जगह बुहारकर धो लें या गोबर से लीप दें। स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें, और रसोई अन्नकूट के लिए तैयार रखें।
- गोवर्धन बनाएँ। साफ़ ज़मीन पर गोबर से गोवर्धन बनाएँ। उत्तर भारत के बहुत-से घरों में यह पीठ के बल लेटे गोवर्धन महाराज का रूप होता है — हाथ, पैर, चेहरा, और नाभि की जगह गड्ढा। कुछ घरों में चोटी वाला सीधा पर्वत बनता है। चारों ओर छोटी गायें, बछड़े, ग्वाले, कुआँ, मथानी, कभी-कभी छोटा-सा घर भी। पेड़ों की तरह दूब, रुई और टहनियाँ खोंस दें।
- सजावट। गोवर्धन पर फूल चढ़ाएँ, रोली-हल्दी लगाएँ और नाभि में छोटा दीया या कटोरी रखें। बहुत-से परिवार पूजा के समय नाभि में दूध, दही और शहद डालते हैं।
- पूजन। दीया और धूप जलाएँ। पहले गणेश जी का स्मरण करें। फिर गोवर्धन को जल, रोली, अक्षत, कलावा, फूल, खील और बताशे चढ़ाएँ, और अपने शब्दों में घर-परिवार, पशुधन और फ़सल के लिए प्रार्थना करें। गिरधारी की मूर्ति रखी हो तो साथ में उनका भी पूजन करें।
- अन्नकूट का भोग। बने हुए पकवान गोवर्धन के सामने रखें, हर एक पर तुलसी दल। मंदिरों में भोग का ऊँचा ढेर लगता है; घर में कुछ कटोरियाँ घेरे में रख देना काफ़ी है। बहुत-से घरों में इसी समय गोवर्धन की कथा सुनी जाती है।
- परिक्रमा। पूरा परिवार गोवर्धन की परिक्रमा करता है, प्रायः सात बार। बहुत-से लोग चलते-चलते लोटे से दूध या पानी की पतली धार गिराते हैं और जौ या चावल के दाने बिखेरते हैं। दीया अक्सर बच्चे लेकर चलते हैं।
- गौ-पूजन। गाय-बैलों को नहलाएँ, माला पहनाएँ, तिलक लगाएँ, रोटी, गुड़ और हरा चारा खिलाएँ और उनके पैर छुएँ। घर में गाय न हो तो बहुत-से परिवार गली की किसी गाय को या गौशाला में जाकर खिलाते हैं।
- आरती और प्रसाद। गोवर्धन और कान्हा की आरती करें, फिर अन्नकूट परिवार, पड़ोसियों, काम करने वालों और जो भी आए, सबमें बाँटें।
अन्नकूट में आम तौर पर क्या बनता है
अन्नकूट का अर्थ है अन्न का पहाड़। ब्रज में इसकी पहचान है अन्नकूट की सब्ज़ी — मौसम की जितनी सब्ज़ियाँ मिलें, सब एक साथ: मूली, बैंगन, कद्दू, फली, आलू, पालक, गोभी। साथ में कढ़ी, चावल, बाजरा या बाजरे की खिचड़ी, पूरियाँ, और जितनी मिठाइयाँ बन सकें। ज़्यादातर घरों में प्याज़-लहसुन नहीं डाला जाता। मंदिर छप्पन भोग का प्रयास करते हैं; घर में जो बन पाए वही भोग है, कोई गिनती नहीं करता।
समय कैसे देखें
पूजा दीपावली के बाद की प्रतिपदा को होती है, और शास्त्र इसके दो समय बताते हैं: प्रातः काल, यानी सुबह का शुरुआती हिस्सा, और सायाह्न, यानी सूर्यास्त से पहले दिन का आख़िरी हिस्सा। हर साल ये दोनों समय गोवर्धन पूजा की तिथि वाले पृष्ठ पर निकाले जाते हैं; ज़रूरी यह है कि उस समय प्रतिपदा चल रही हो। प्रतिपदा कब शुरू होकर कब ख़त्म होती है, यह अपने शहर के पंचांग में देखें। अच्छे समय में शुरुआत पसंद करने वाले परिवार दिन का चौघड़िया देख लेते हैं। कुछ परिवार सुबह वाले समय में पूजा करते हैं, कुछ शाम ढलने से पहले; अपने घर की रीत मानें।
घरों में निभाई जाने वाली रीतें
ये रीतें हैं, शर्तें नहीं; आपके घर का अपना तरीका सबसे पहले है।
- बहुत-से घरों में गोवर्धन अगले दिन तक आँगन में रहता है, और भाई दूज या उसके बाद सूखा गोबर उपले बनाकर जलाया जाता है या खेत में डाल दिया जाता है।
- किसान परिवारों में इस दिन गाय-बैलों से काम नहीं लिया जाता।
- कुछ घरों में परिक्रमा के समय महिलाएँ ब्रजभाषा में गोवर्धन के गीत गाती हैं।
- बहुत-से परिवार भोग लगने के बाद ही भोजन करते हैं, और अन्नकूट ही दिन का मुख्य भोजन होता है।
- कुछ घरों में इसी दिन हल, बैलगाड़ी और औज़ारों की भी छोटी-सी पूजा होती है।
अलग-अलग प्रदेशों में
- ब्रज (मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन): श्रद्धालु असली गिरिराज की पूरी परिक्रमा करते हैं, जो लंबा रास्ता है और बहुत-से लोग नंगे पाँव करते हैं; मंदिरों में अन्नकूट के विशाल ढेर सजते हैं।
- हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश: लेटे हुए गोवर्धन महाराज का रूप आम है, और पशुधन इस दिन के केंद्र में है।
- गुजरात: यही दिन बेसतु वरस, गुजराती नया साल है। परिवार मंदिर जाते हैं, बड़ों से मिलते हैं, "साल मुबारक" कहकर बधाई देते हैं, और बहुत-से व्यापारी नए बही-खाते शुरू करते हैं। स्वामिनारायण और पुष्टिमार्गीय मंदिरों में अन्नकूट सजता है।
- महाराष्ट्र: यह दिन बलि प्रतिपदा या दिवाली पाडवा है। पत्नियाँ पति की आरती उतारती हैं, पति-पत्नी उपहार देते हैं, और किसान परिवारों में राजा बलि का चित्र या आकृति बनाकर पूजा होती है।
पूजा के बाद
अन्नकूट खुले हाथ बाँटें; इस दिन का सार यही बाँटना है। अगली सुबह भाई दूज है, और पिछली शाम दीपावली थी।