तुलसी विवाह घर पर होने वाला एक छोटा-सा ब्याह है, जिसमें तुलसी के पौधे को दुल्हन की तरह सजाकर गन्ने के मंडप के नीचे शालिग्राम या कान्हा के रूप में भगवान विष्णु से उसका विवाह कराया जाता है। संक्षेप में: तुलसी का चौरा साफ़ करके सजाएँ, गन्ने का मंडप खड़ा करें, तुलसी को दुल्हन बनाएँ, पास में दूल्हे को विराजमान करें, पूजा और कन्यादान करें, पौधे के चारों ओर फेरे लें, फिर गीत, आरती और प्रसाद।
आपके शहर के लिए दिन, और परिवार देवउठनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक कोई भी दिन क्यों चुनते हैं — यह तुलसी विवाह की तिथि वाले पृष्ठ पर है। यहाँ समय नहीं लिखा गया, क्योंकि वह साल और जगह के साथ बदलता है।
पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें
- गमले में लगा तुलसी का पौधा या आँगन का तुलसी चौरा, धोकर या नया रंगकर
- मंडप के लिए चार या ज़्यादा गन्ने, और बाँधने के लिए धागा या कपड़े की पट्टी
- दुल्हन के लिए लाल चुनरी या छोटा लाल कपड़ा, और दूल्हे के लिए पीला कपड़ा या छोटी धोती
- तुलसी का श्रृंगार: छोटी चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, छोटा मंगलसूत्र या काले मोतियों का धागा, कुछ घरों में कंघी और शीशा
- दूल्हा: शालिग्राम, या कान्हा अथवा विष्णु जी की छोटी मूर्ति या चित्र, छोटी थाली या चौकी पर
- रोली, हल्दी, अक्षत, फूल, दोनों के लिए फूलमाला, और मौली
- घी के दीये और धूप; मंडप के चारों ओर कुछ छोटे दीये
- मौसमी चीज़ें: आँवला, गन्ने के टुकड़े, सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर, अमरूद
- ब्याह की मिठाई: बताशे, लड्डू या घर की बनी कोई भी मिठाई
- दूल्हा-दुल्हन पर बरसाने के लिए चावल की थाली, और अगर घर में अंतरपट की रीति हो तो बीच में पकड़ने के लिए एक कपड़ा
- घर की रीति हो तो आम के पत्तों वाला जल का कलश
यह सब वही हो सकता है जो घर में पहले से है। लाल सूती दुपट्टा भी उतनी ही अच्छी चुनरी है, और कान्हा का एक चित्र भी पूरा दूल्हा है।
पूजा का क्रम
- सुबह की तैयारी। तुलसी को जल दें, चौरे के आसपास सफ़ाई करें, और चौरा धोएँ या रंगें। सामने रंगोली या अल्पना बनाएँ। जो व्रत रखते हैं, वे दिन भर फल और दूध लें; गर्भवती, बीमार और बुज़ुर्ग लोग डॉक्टर की राय के बिना व्रत न रखें।
- मंडप खड़ा करें। शाम होते-होते तुलसी के चारों ओर गन्ने खड़े करें और पौधे के ऊपर उनके सिरे बाँध दें। चाहें तो मंडप पर छोटी माला या आम के पत्ते लटका दें।
- दुल्हन का श्रृंगार। पौधे या गमले पर लाल चुनरी ओढ़ाएँ। गमले या किसी डाली पर चूड़ियाँ पहनाएँ, थोड़ा सिंदूर और बिंदी लगाएँ, और मंगलसूत्र रखें। घर की स्त्रियाँ अक्सर यह सब गीत गाते हुए मिलकर करती हैं।
- दूल्हे को विराजमान करें। शालिग्राम को जल से (या घर की रीति हो तो पंचामृत से) धीरे से नहलाएँ, पोंछें, पीला कपड़ा ओढ़ाएँ और तुलसी की दाहिनी ओर छोटी थाली में रखें। कान्हा का चित्र हो तो उसे भी इसी तरह रखें।
- दीये और गणेश जी। साँझ होते ही दीये जलाएँ। पहले गणेश जी को रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएँ।
- वर-वधू की पूजा। तुलसी और दूल्हे दोनों को हल्दी, रोली, अक्षत, फूल और माला चढ़ाएँ, फिर मौसमी चीज़ें और मिठाई का भोग लगाएँ।
- कथा सुनें। सब साथ बैठकर तुलसी विवाह की कथा सुनें — वृंदा और शालिग्राम की कथा।
- कन्यादान। तुलसी के माता-पिता बने दंपती हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर दूल्हे के चरणों में रखें, और अपने शब्दों में तुलसी का हाथ उन्हें सौंपें। फिर दूल्हे का पीला कपड़ा मौली से दुल्हन की चुनरी से बाँध दिया जाता है — यही गठबंधन है।
- फेरे। जो दूल्हे की ओर से बैठा है, या जिसने शालिग्राम उठाया है, वह उसे लेकर तुलसी के सात फेरे लगाता है, और परिवार ब्याह के गीत गाता है। कुछ घरों में पूरा परिवार साथ फेरे लेता है।
- अक्षत की वर्षा। मराठी घरों में दूल्हा-दुल्हन के बीच कपड़ा पकड़कर मंगलाष्टक गाए जाते हैं, फिर कपड़ा हटाया जाता है और सब जोड़े पर अक्षत बरसाते हैं। दूसरी जगहों पर फेरों के बाद चावल और फूल बरसाए जाते हैं।
- आरती और प्रसाद। घर में जो आरती गाई जाती है वह गाएँ, दोनों को दीया दिखाएँ, और मिठाई व मौसमी चीज़ें ब्याह के प्रसाद के रूप में बाँटें।
समय कैसे देखें
तुलसी विवाह शाम का संस्कार है, जो प्रायः सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में शुरू होता है। जो परिवार फेरों के लिए अच्छा समय देखना चाहें, वे अपने शहर का शाम का चौघड़िया देख लें; बहुत-से लोग राहु काल में शुरुआत करने से बचते हैं। एकादशी, द्वादशी या आगे के दिनों में से चुनाव की बात तिथि वाले पृष्ठ पर समझाई गई है। तुलसी विवाह को ब्याह के मौसम की शुरुआत माना जाता है, इसलिए शादी की तारीखों के लिए परिवार इसके बाद मुहूर्त पृष्ठ देखते हैं।
परिवारों के रीति-रिवाज
ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; आपके घर की अपनी रीति सबसे पहले है।
- बहुत-से घरों में ब्याह की चुनरी कुछ दिनों तक तुलसी पर ही रहने दी जाती है।
- जिन दंपतियों की बेटी नहीं है, वे अक्सर कन्यादान करते हैं और इसे बड़ा सौभाग्य मानते हैं।
- ब्याह की चूड़ियाँ और श्रृंगार का सामान प्रायः घर की किसी सुहागिन या पड़ोसन को दे दिया जाता है।
- बहुत-से घरों में पूरे कार्तिक तुलसी पर हर शाम दीया जलता है, जो कार्तिक पूर्णिमा पर पूरा होता है।
- कुछ परिवार मौसम का पहला ब्याह तुलसी के ब्याह के बाद ही तय करते हैं।
- बहुत-से घरों में ब्याह के दिन तुलसी दल नहीं तोड़े जाते।
प्रांतों के अपने ढंग
- महाराष्ट्र और गोवा: द्वादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक किसी भी शाम, अंतरपट, मंगलाष्टक और अक्षत की वर्षा के साथ; तुलसी वृंदावन नए रंग से रंगा जाता है।
- गुजरात और सौराष्ट्र: मंदिरों में धूमधाम से ब्याह, कहीं-कहीं दूल्हे की बारात के साथ, और श्रीकृष्ण दूल्हे के रूप में।
- उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश: अक्सर देवउठनी एकादशी की शाम ही, उसी गन्ने के मंडप के नीचे जिसमें भगवान को जगाया गया।
- राजस्थान: आँगन में स्त्रियाँ ब्याह के गीत गाती हैं, और कुछ परिवारों में यह मौका बेटी के ब्याह जैसा मनाया जाता है।
- कर्नाटक और आंध्र प्रदेश: क्षीराब्धि द्वादशी, जब तुलसी के पास आँवले की टहनी रखकर उनके साथ विष्णु जी की पूजा होती है।
पूजा के बाद
प्रसाद पड़ोसियों में बाँटें और गन्ने आने वाले दिनों में खाने के लिए रख लें। तुलसी विवाह देवउठनी एकादशी पर भगवान के जागने के बाद आता है, और ब्याह व गृह प्रवेश का मौसम शुरू होते ही बहुत-से परिवार सत्यनारायण कथा भी करवाते हैं।