तुलसी विवाह की कथा बताती है कि असुर राजा जालंधर की पतिव्रता पत्नी वृंदा तुलसी का पौधा कैसे बनीं, और हर साल उनका विवाह शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु से क्यों होता है। यह कथा अटूट निष्ठा की है, एक दुखदायी छल की, दुख में निकले श्राप की, और उस वचन की, जिसने उस दुख को ब्याह के उत्सव में बदल दिया।
तुलसी विवाह किस दिन है, और परिवार इसे देवउठनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक कभी भी क्यों करते हैं — यह तुलसी विवाह की तिथि वाले पृष्ठ पर है। यह पृष्ठ केवल कथा का है, हमारे अपने शब्दों में।
वृंदा और जालंधर की कथा
एक बार क्रोध में भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोला। उसकी आग संसार को भस्म न कर दे, इसलिए उसे समुद्र में डाल दिया गया। उसी आग से, जहाँ नदी समुद्र में मिलती है, एक बालक जन्मा। समुद्र ने उसे पाला-पोसा, और जल ने उसे धारण किया था, इसलिए उसका नाम जालंधर पड़ा। बड़ा होकर वह असुरों का प्रतापी राजा बना।
जालंधर का विवाह असुर कुल की कन्या वृंदा से हुआ, जो बचपन से भगवान विष्णु की भक्त थीं। वृंदा कोमल स्वभाव की, समझदार और पति के प्रति पूरी तरह समर्पित थीं। कहा जाता था कि जब तक उनकी पतिनिष्ठा अटूट है, तीनों लोकों में कोई जालंधर को नहीं हरा सकता। वृंदा की भक्ति ही जालंधर का कवच थी।
इसी कवच के बल पर जालंधर घमंडी हो गया। उसने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया, और आगे चलकर माता पार्वती पर भी बुरी नज़र डाली और स्वयं शिव जी से युद्ध छेड़ दिया। युद्ध चलता रहा, चलता रहा, पर शिव जी उसे परास्त न कर सके — क्योंकि घर में वृंदा पति के लिए पूजा में बैठी थीं, उनका मन पति पर टिका था।
देवता भगवान विष्णु के पास गए। भगवान वृंदा को भली-भाँति जानते थे; वे उनकी अपनी भक्त थीं। पर संसार दुख में था। तब भगवान ने जालंधर का रूप धरा और वृंदा के महल पहुँचे। वृंदा ने देखा कि पति युद्ध से लौट आए हैं; वे खुशी से उठीं, पैर छुए और पूजा छोड़ दी। उसी क्षण उनका संकल्प टूट गया, और रणभूमि में जालंधर की रक्षा हट गई। शिव जी का वार हुआ, और जालंधर मारा गया।
वृंदा को जल्दी ही समझ आ गया कि सामने खड़े व्यक्ति उनके पति नहीं हैं। जब उन्होंने पहचाना कि यह कौन है, तो उनके दुख और क्रोध की कोई सीमा न रही। उन्होंने भगवान से कहा — तुमने मेरे साथ पत्थर जैसा व्यवहार किया है, तो तुम पत्थर हो जाओ। कुछ कथाओं में वे यह भी कहती हैं कि तुम्हें भी एक दिन पत्नी का वियोग सहना पड़ेगा, जिसे कथा कहने वाले राम और सीता के वियोग से जोड़ते हैं।
भगवान ने उनका वचन स्वीकार किया। वे गंडकी नदी में मिलने वाला काला पत्थर, शालिग्राम, बन गए। लक्ष्मी जी और देवता व्याकुल होकर वृंदा से श्राप हल्का करने की विनती करने लगे, और बहुत-सी कथाओं में वृंदा मान गईं, ताकि भगवान अपने एक अंश से ही शालिग्राम बनें, पूरे नहीं। फिर पति के बिना जीना न चाहते हुए वृंदा ने अग्नि में अपना शरीर त्याग दिया।
उस राख से, या जहाँ वे थीं उस जगह से, एक छोटा-सा सुगंधित पौधा उगा। भगवान ने उसका नाम तुलसी रखा और आशीर्वाद दिया — तुलसी दल के बिना मेरी कोई पूजा पूरी नहीं होगी, जिस घर में मेरा स्मरण होगा वहाँ तुम सदा मेरे साथ रहोगी, और शालिग्राम रूप में मेरा विवाह तुमसे होगा। तब से हर साल कार्तिक के शुक्ल पक्ष में, चार महीने की निद्रा से भगवान के जागने के बाद, यह विवाह रचाया जाता है।
कथा को शांत मन से समझें
इस कथा में कठिन बातें हैं — युद्ध, स्वयं भगवान का छल, पीड़ा में निकला श्राप, और एक स्त्री की मृत्यु। यह कथा छल को अच्छा नहीं बताती, और न ही किसी से वृंदा जैसा अंत अपनाने को कहती है। जो लोग इसे सबसे प्रेम से सुनाते हैं, वे अक्सर कहते हैं कि यह कथा वृंदा का सम्मान है, भगवान की चाल का नहीं; उनकी निष्ठा इतनी बड़ी थी कि तीनों लोकों के स्वामी को उनके वचन के आगे झुकना पड़ा, और वे आज तक उसे निभा रहे हैं। तुलसी विवाह इस कथा को सुधार की ओर ले जाता है: जिसके साथ अन्याय हुआ, उसे सबसे ऊँचा सम्मान मिलता है, और अन्याय करने वाला हर साल सबके सामने उससे ब्याह रचाता है। दुखी विधवा का आग में उतरना पुरानी कथा के समय की बात है; आज के परिवार इसे भक्ति की छवि के रूप में पढ़ते हैं, किसी रीति के रूप में नहीं।
कथा के और रूप
- शंखचूड़ और तुलसी। एक दूसरी पुराण-कथा में असुर का नाम शंखचूड़ है और उसकी पत्नी का नाम शुरू से तुलसी है; कथा का ढाँचा लगभग वही है, और शंख व शालिग्राम दोनों का संबंध इसी से जोड़ा जाता है।
- गंडकी नदी। कुछ कथाओं में वृंदा तुलसी के साथ गंडकी नदी भी बनीं, इसीलिए शालिग्राम उसी नदी में मिलते हैं।
- कान्हा दूल्हा। गुजरात और महाराष्ट्र के बहुत-से घरों में दूल्हा श्रीकृष्ण होते हैं, और विवाह को कान्हा और तुलसी के ब्याह के रूप में कहा जाता है।
कथा कैसे सुनी जाती है
कथा प्रायः विवाह वाली शाम ही, फेरों से पहले सुनाई जाती है, जब परिवार गन्ने के मंडप के नीचे सजे तुलसी चौरे के चारों ओर बैठा होता है। स्त्रियाँ इसे उन्हीं सीधे-सादे बोलों में कहती हैं जो उन्होंने अपनी दादी-नानी से सुने थे, और बच्चे हर साल वही सवाल पूछते हैं — पत्थर क्यों, पौधा क्यों। विवाह का पूरा क्रम, सामग्री और कन्यादान की बात तुलसी विवाह पूजा विधि पृष्ठ पर है।
आज यह कथा क्या कहती है
बहुत-से घरों के लिए तुलसी विवाह एक छोटा-सा, खुशियों भरा ब्याह है — लाल चुनरी ओढ़े पौधा, गमले पर चूड़ियाँ, मिठाई, गीत और सजे-धजे बच्चे। नीचे बहती कथा इस खुशी को गहराई देती है। वह कहती है कि निष्ठा में बड़ी शक्ति है, कि देवताओं से भी हिसाब माँगा जा सकता है, और कि अन्याय का उत्तर भुलाकर नहीं, सम्मान देकर भी दिया जा सकता है। आँगन की तुलसी, जिसे हर सुबह जल और हर शाम दीया मिलता है, यह याद साल भर चुपचाप सँजोए रहती है।
तुलसी विवाह देवउठनी एकादशी पर भगवान के जागने के बाद आता है, और इन्हीं उत्सव भरे दिनों में बहुत-से परिवार सत्यनारायण कथा भी करवाते हैं। विवाह के लिए शाम का समय चुनना हो तो अपने शहर का चौघड़िया देखें, और अब खुलने वाले ब्याह के मौसम के लिए मुहूर्त पृष्ठ।