भाई दूज की कथा यमुना जी और उनके भाई यमराज की है। बहन के बार-बार बुलाने पर यमराज आख़िरकार कार्तिक शुक्ल द्वितीया को उनके घर पहुँचे, और यमुना ने तिलक, आरती और अपने हाथ से बने भोजन से उनका ऐसा सत्कार किया कि उसी दिन से भाई इस दिन बहन के घर जाते हैं।
यह दिन प्रायः दीपावली के दो दिन बाद आता है; आपके शहर के लिए द्वितीया कैसे तय होती है, यह भाई दूज की तिथि वाले पृष्ठ पर है। यहाँ केवल कथा है, हमारे अपने शब्दों में।
यमराज और यमुना की कथा
सूर्यदेव और उनकी पत्नी संज्ञा की दो संतानें थीं — बेटा यम और बेटी यमुना। दोनों साथ खेलकर बड़े हुए और एक-दूसरे पर जान देते थे। बड़े होने पर दोनों की राहें अलग हो गईं। यम मृत्यु के देवता और धर्म के रखवाले बने, जिन्हें हर जीवन का हिसाब देखना था। यमुना नदी बनकर धरती पर उतरीं और ब्रज के वनों और चरागाहों से होकर बहने लगीं।
यमुना को भाई की बहुत याद आती। वे बार-बार संदेसा भेजतीं — भैया, कभी मेरे घर आओ, मेरे हाथ का खाना खाओ। यमराज हर बार प्यार भरा उत्तर भेजते, आने का वचन देते, और हर बार काम उन्हें रोक लेता। कहीं न कहीं हर पल किसी की साँस पूरी हो रही थी, और उसे लेने कोई तो चाहिए था। ऐसे ही बरस पर बरस बीत गए।
एक दिन यमराज को बहन का ध्यान आया और मन में ग्लानि हुई — उसने इतनी बार बुलाया, और मेरे पास हर बार कोई बहाना रहा। उन्होंने सारा काम एक ओर रखा, और कार्तिक की अमावस के दूसरे दिन, बिना ख़बर किए, बहन के द्वार जा पहुँचे।
द्वार पर भाई को देखकर यमुना को अपनी आँखों पर भरोसा न हुआ। फिर उन्होंने एक पल भी नहीं गँवाया। भाई के पाँव धुलाए, साफ़ आसन पर बिठाया, माथे पर रोली-चावल का टीका लगाया और दीया घुमाकर आरती उतारी। फिर रसोई में जाकर वह सब बनाया जो भाई को बचपन से पसंद था, और अपने हाथों से परोसकर पास बैठी रहीं। जब तक भाई ने खा नहीं लिया, उन्होंने ख़ुद एक कौर नहीं छुआ।
तीनों लोकों में यमराज जहाँ भी जाते, लोग डर से काँपते। यहाँ उन्हें केवल प्रेम मिला। उनका मन भर आया, और भोजन के बाद उन्होंने कहा — बहन, जो चाहो माँग लो।
यमुना ने सोचा, और न धन माँगा, न अपने लिए कुछ। उन्होंने कहा — भैया, हर साल इसी दिन मेरे घर आया करो। और एक बात और: इस दिन जो भाई बहन के घर जाए, उससे टीका करवाए और उसके हाथ का भोजन करे, उसे अकाल मृत्यु का भय न रहे; और जो भाई-बहन इस दिन साथ मेरे जल में स्नान करें, उन पर तुम्हारी कृपा रहे।
यमराज ने ख़ुशी-ख़ुशी दोनों वर दिए, बहन को वस्त्र और गहने भेंट किए, और हल्के मन से अपने लोक लौटे। कथा कहती है कि तभी से यह दिन यम द्वितीया कहलाया, और भाई इस दिन बहनों के घर जाने लगे।
कथा को शांत मन से समझें
यमराज मृत्यु के देवता हैं, इसलिए कथा में लंबी उम्र और अकाल मृत्यु से बचने की बात आती है। यह स्नेह की कथा है, कोई चेतावनी नहीं; किसी भाई का जीवन इस पर नहीं टिका कि वह उस दिन बहन के घर पहुँच पाया या नहीं। आज बहुत-से भाई दूर रहते हैं, और बहनें वीडियो पर टीका कर लेती हैं, मिठाई भेज देती हैं, या घर पर ही भाई के नाम से पूजा कर लेती हैं। परंपरा ने दूरी का रास्ता हमेशा निकाला है।
कथा के और रूप
- कृष्ण और सुभद्रा। उत्तर भारत में बहुत-से घरों में कहा जाता है कि नरकासुर का वध करने के बाद श्रीकृष्ण इसी दिन बहन सुभद्रा से मिलने गए। सुभद्रा ने दीयों, फूलों और मिठाई से उनका स्वागत किया और माथे पर तिलक लगाया।
- बंगाल का भाई फोंटा। बहनें भाई के माथे पर चंदन, काजल और दही से फोंटा लगाती हैं और एक छोटी पारंपरिक तुकबंदी कहती हैं, जिसका भाव है कि यम के द्वार भाई के लिए बंद रहें। बहुत-सी बहनें फोंटा होने तक कुछ नहीं खातीं।
- महाराष्ट्र और गोवा में भाऊबीज, गुजरात में भाई बीज। बहन भाई की आरती उतारती है, कहीं-कहीं रंगोली के पास बिठाकर, और मीठा खिलाती है; भोजन में अक्सर बासुंदी-पूरी या श्रीखंड होता है।
- नेपाल में भाई टीका। तिहार के पाँचवें दिन बहनें भाइयों को सात रंगों का टीका लगाती हैं, जल्दी न मुरझाने वाले मखमली फूलों की माला पहनाती हैं, और उनके चारों ओर तेल की रेखा खींचती हैं — इस प्रार्थना के साथ कि भाई इन फूलों की तरह सदा ताज़ा रहे।
चित्रगुप्त पूजा
चित्रगुप्त जी यमराज के दरबार के लेखाकार हैं, जो हर जीवन का लेखा-जोखा रखते हैं। बहुत-से कायस्थ परिवार उन्हें अपना पूर्वज मानते हैं और इसी दिन चित्रगुप्त पूजा करते हैं। उनकी तस्वीर के सामने कलम, दवात, कॉपियाँ और बही-खाते रखे जाते हैं और उनके प्रकट होने की छोटी-सी कथा पढ़ी जाती है। बहुत-से घरों में पूजा पूरी होने तक कोई कुछ नहीं लिखता, और पूजा के बाद घर के लोग एक पन्ने पर छोटी-सी प्रार्थना, अपना नाम और आय-व्यय लिखकर अर्पित करते हैं। चित्रगुप्त जी की कथा अपने आप में अलग कथा है, इसलिए यहाँ संक्षेप में।
कथा कैसे सुनी जाती है
ज़्यादातर घरों में कथा सुबह, भाइयों के आने से पहले, थाली सजाते-सजाते सुना दी जाती है — अक्सर माँ या दादी घर की बेटियों को सुनाती हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ परिवारों में महिलाएँ पहले ज़मीन पर आटे या गोबर से यम और यमुना की सादी-सी आकृति बनाती हैं, उसकी पूजा करती हैं और उसके चारों ओर बैठकर कथा कहती हैं। मथुरा में श्रद्धालु यमुना स्नान से पहले घाटों पर यह कथा सुनते हैं।
थाली की सामग्री, टीके का क्रम और भोजन की बातें भाई दूज पूजा विधि पृष्ठ पर हैं।
आज यह कथा क्या कहती है
यह कथा किसी अनुष्ठान से ज़्यादा एक मुलाक़ात की है। यमुना कुछ बड़ा नहीं माँगतीं — बस यह कि भाई घर आए और साथ बैठकर खाए। शहरों और देशों में बिखरे परिवारों के लिए भाई दूज आज भी ठीक इसी के लिए एक दिन अलग रखता है, और टीका जितना आशीर्वाद है, उतना ही स्वागत भी।
भाई-बहन का दूसरा पर्व रक्षा बंधन है, और भाई दूज से एक दिन पहले गोवर्धन पूजा होती है। टीके के लिए अच्छा समय देखना हो तो अपने शहर का चौघड़िया देखें; बहुत-से परिवार राहुकाल भी टालते हैं।