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व्रत कथा · दिवाली लक्ष्मी पूजा

दीवाली लक्ष्मी पूजा की कथा: दीपावली की रात की कहानियाँ

दीवाली लक्ष्मी पूजा की कथा सरल हिंदी में: समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी का प्रकट होना, साहूकार की बेटी और पीपल, एक जगमगाता घर, और श्रीराम की घर वापसी।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यहाँ कथा हमारे अपने शब्दों में है, जैसे परिवारों में पूजा के समय सुनाई जाती है। क्षेत्र और घर के हिसाब से कथा के रूप बदलते हैं; कथा में कहीं चेतावनी आए तो वह कहानी का हिस्सा है, पढ़ने वाले के लिए डर की बात नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

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दीवाली की लक्ष्मी पूजा की कथा कोई एक कहानी नहीं, बल्कि कार्तिक अमावस की रात सुनाई जाने वाली कुछ कहानियों का गुच्छा है: समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी का प्रकट होना, पीपल को जल देने वाली साहूकार की बेटी जो लक्ष्मी जी की सहेली बनी, और वह गरीब स्त्री जिसका घर उस रात पूरे नगर में अकेला रोशन था। इन सबके पीछे दीयों की सबसे पुरानी वजह है — श्रीराम का अयोध्या लौटना।

त्योहार का दिन और आपके शहर में लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त दीपावली की तिथि वाले पृष्ठ पर है। यह पृष्ठ केवल कथाओं का है, हमारे अपने शब्दों में।

समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी

एक समय देवताओं का तेज और सौभाग्य उनसे रूठ गया, और लक्ष्मी जी तीनों लोकों से ओझल हो गईं। जो खोया था उसे वापस पाने के लिए देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर को मथने का निश्चय किया। मंदराचल मथानी बना, वासुकि नाग रस्सी, और भगवान विष्णु ने कछुए का रूप लेकर पर्वत को अपनी पीठ पर टिकाया।

मंथन युगों तक चला। सबसे पहले भयंकर विष निकला, जिसे संसार की रक्षा के लिए शिव जी ने पी लिया। फिर एक-एक करके झाग में से अचरज भरी चीज़ें निकलने लगीं — कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, चंद्रमा। और फिर लहरें हटीं और खिले कमल पर बैठी, हाथों में कमल लिए, सोने-सी दमकती लक्ष्मी जी प्रकट हुईं। देवता देखते रह गए। दिशाओं के हाथियों ने सोने के घड़ों से उनका अभिषेक किया। लक्ष्मी जी ने सब पर दृष्टि डाली और भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी, और उसी क्षण संसार में फिर से सौभाग्य लौट आया।

बहुत-से घरों की मान्यता है कि यह कार्तिक अमावस को हुआ था, इसीलिए महीने की सबसे अँधेरी रात वह रात बन गई जब हर घर लक्ष्मी जी का स्वागत करता है।

साहूकार की बेटी और पीपल

एक नगर में एक गरीब साहूकार अपनी बेटी के साथ रहता था। बेटी रोज़ सुबह नगर के किनारे के पीपल को जल चढ़ाने जाती थी। उस पीपल में लक्ष्मी जी का वास था। लड़की की लगन देखकर एक दिन वे एक युवती के रूप में उसके सामने आईं और बोलीं — मेरी सहेली बनोगी?

लड़की ने विनम्रता से कहा कि पिताजी से पूछकर बताऊँगी। पिता सुनकर बहुत ख़ुश हुए और बोले, हाँ कह दे। इस तरह दोनों पक्की सहेलियाँ बन गईं।

कुछ दिन बाद लक्ष्मी जी ने उसे अपने घर बुलाया। सुंदर चौकी पर बिठाया, सोने की थाली में भोजन कराया और ओढ़ने को एक सुंदर दुशाला दिया। विदा करते समय लक्ष्मी जी बोलीं — अब मैं तुम्हारे घर आऊँगी। लड़की चिंता में घर लौटी। पिता के घर में था ही क्या; ऐसी सहेली का स्वागत कैसे होगा?

शाम को वह आँगन में उदास बैठी थी तो पिता ने कहा — घर अच्छे से बुहार ले, दीया जला दे, और भरोसा रख, जो चाहिए वह आ जाएगा। वह झाड़ू लगा ही रही थी कि ऊपर उड़ती एक चील ने आँगन में एक हार गिरा दिया — रानी का हार। लड़की उसे लेकर राजा के पास गई, राजा ने उसे इनाम दिया, और उसी से उसने अपनी सहेली के लिए अच्छा भोजन और साफ़ आसन तैयार किया।

लक्ष्मी जी आईं, और उनके साथ गणेश जी भी। लड़की ने लक्ष्मी जी को चौकी पर बैठने को कहा, तो वे मुस्कुराकर बोलीं — मैं हर किसी की चौकी पर नहीं बैठती, मैं वहीं रुकती हूँ जहाँ मन से बुलाया जाए। वे बैठीं, प्रेम से भोजन किया, और वहीं रह गईं। उस दिन से साहूकार के घर कभी कमी नहीं रही। जो घर यह कथा कहते हैं, वे बताते हैं कि इसीलिए दीवाली की रात लक्ष्मी जी और गणेश जी साथ पूजे जाते हैं, और मेहमान के आने से पहले घर साफ़ करके दीया जलाया जाता है।

अकेला जगमगाता घर

बहुत-से घरों में एक और कथा कही जाती है। एक बार रानी का हार एक कौआ उठा ले गया और उसे एक गरीब स्त्री की झोंपड़ी के पास गिरा दिया। राजा ने हार लौटाने वाले के लिए इनाम की घोषणा की। स्त्री हार लेकर पहुँची तो राजा ने कहा, जो माँगना हो माँग लो। उसने बस एक चीज़ माँगी — दीवाली की रात नगर में उसके घर के सिवा कोई घर दीया न जलाए।

राजा ने बात मान ली। अमावस की रात लक्ष्मी जी नगर में घूमीं तो हर घर अँधेरे में डूबा मिला, सिर्फ़ एक झोंपड़ी में दीया टिमटिमा रहा था। वे वहीं रुकीं, और स्त्री ने उनका स्वागत करके उन्हें ठहरने की विनती की। कुछ कथाओं में दिखाया जाता है कि जैसे ही लक्ष्मी जी आगे के दरवाज़े से भीतर आईं, दरिद्रता पीछे के रास्ते से निकल गई और फिर कभी नहीं लौटी। उस स्त्री का घर फला-फूला, और दीवाली की रात द्वार पर दीया रखना हर घर की रीत बन गई।

कथा को शांत मन से समझें

ये लोककथाएँ हैं, और इनमें कहीं लक्ष्मी जी के रूठ जाने की, तो कहीं दरिद्रता के आने की बात आती है। इनका अर्थ यह नहीं कि घर की रोज़ी-रोटी इस पर टिकी है कि घर कितना चमक रहा है, या कम दीयों वाला घर किसी तरह अभागा है। कथा सुनाने वाले बड़े-बूढ़े इनसे बस इतना कहना चाहते हैं कि साफ़, रोशन और खुले मन वाला घर रहने के लिए सबसे सुखद जगह है — मेहमान के लिए भी और देवी के लिए भी। प्रेम से जलाया एक दीया भी उतना ही स्वागत है जितने सौ दीये।

श्रीराम घर लौटे

लक्ष्मी जी की इन कथाओं के नीचे वह कारण है जो उत्तर भारत में दीयों के लिए सबसे पहले बताया जाता है। चौदह बरस के वनवास और लंका के युद्ध के बाद श्रीराम, सीता जी और लक्ष्मण जी अमावस की रात अयोध्या लौटे। अयोध्या के लोग इतने समय से राह देख रहे थे कि सुबह तक रुक न सके; उन्होंने घर-घर के दीये भरे और सड़कों, छतों और सरयू के घाटों को दीयों से सजा दिया, ताकि लौटने वालों को घर का रास्ता दिखे। दीयों की वही पंक्ति, दीप-आवली, इस पर्व को नाम देती है।

कथा कैसे सुनी जाती है

ये कथाएँ दीवाली की शाम, प्रायः गणेश-लक्ष्मी पूजन के बाद, आरती से पहले या बाद में, पूजा के पास बैठे परिवार के बीच सुनाई जाती हैं। अक्सर कोई औपचारिक पाठ नहीं होता: दादी एक कथा कहती हैं, कोई दूसरी जोड़ देता है, और बच्चे राम जी के लौटने वाली कहानी फिर से सुनने की ज़िद करते हैं। लक्ष्मी-गणेश पूजा का पूरा क्रम, सामग्री और बही-खाता पूजन की रीति दीवाली लक्ष्मी पूजा विधि पृष्ठ पर है।

आज ये कथाएँ क्या कहती हैं

दीवाली अब हिंदू घरों से बहुत आगे तक मनाई जाती है, और ये कथाएँ भी उसके साथ दूर-दूर तक पहुँचती हैं। इन सबमें एक ही सीधी बात है: सबसे अँधेरी रात में रोशनी, मेहमान के लिए तैयार किया घर, और वह सौभाग्य जो वहीं आता है जहाँ उसका स्वागत हो। बहुत-से परिवारों के लिए रात का सबसे प्यारा हिस्सा आज भी पूजा के बाद साथ बैठना है — हाथों-हाथ घूमती मिठाई और द्वार पर टिमटिमाते दीये।

इससे दो दिन पहले धनतेरस आता है, और अगली सुबह गोवर्धन पूजा होती है। शाम की योजना के लिए मुहूर्त पृष्ठ, अपने शहर का चौघड़िया, और नई बही खोलने से पहले बहुत-से व्यापारी जो होरा देखते हैं, वह भी देख लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दीवाली की लक्ष्मी पूजा में कौन-सी कथा सुनी जाती है?

कोई एक तय कथा नहीं है। उत्तर भारत के बहुत-से घरों में साहूकार की बेटी की कथा सुनाई जाती है, जो पीपल को जल देती थी और लक्ष्मी जी की सहेली बनी। कुछ घर समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी के प्रकट होने की, या उस गरीब स्त्री की कथा कहते हैं जिसका घर अमावस की रात अकेला जगमगा रहा था। दीयों का कारण श्रीराम की अयोध्या वापसी बताई जाती है।

दीवाली पर दीये क्यों जलाए जाते हैं?

उत्तर भारत में दीये उस रात की याद हैं जब अयोध्यावासियों ने वनवास से लौटते श्रीराम, सीता जी और लक्ष्मण जी के लिए अमावस के अँधेरे में राह रोशन की थी। लक्ष्मी जी की कथाएँ एक और कारण जोड़ती हैं: मान्यता है कि इस रात वे साफ़-सुथरे, रोशन घरों में आती हैं।

लक्ष्मी जी के साथ उल्लू क्यों जुड़ा है?

बहुत-सी परंपराओं में उल्लू लक्ष्मी जी का वाहन है। लोक में कहा जाता है कि वह अँधेरे में भी साफ़ देखता है, जैसे दीवाली की अमावस की रात; पर मुख्य कथाओं में उल्लू का कोई प्रसंग नहीं आता।

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स्रोत

  • उत्तर भारत की लोक-परंपरा, जैसी दीवाली की लक्ष्मी पूजा में कही जाती है
  • समुद्र मंथन के पौराणिक प्रसंग और श्रीराम की अयोध्या वापसी की रामायण परंपरा, जैसे त्योहार पुस्तकों में संक्षेप में मिलते हैं
  • उत्तर भारत की व्रत कथा पुस्तकें (साहूकार की बेटी और पीपल; अकेला जगमगाता घर), यहाँ हमारे अपने शब्दों में

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति