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व्रत कथा · जन्माष्टमी

जन्माष्टमी की कथा: श्रीकृष्ण जन्म की कहानी

जन्माष्टमी की कथा सरल शब्दों में: कंस और आकाशवाणी, मथुरा का कारागार, आधी रात को श्रीकृष्ण का जन्म, यमुना पार गोकुल की यात्रा और योगमाया की चेतावनी।

  • सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम
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यहाँ कथा हमारे अपने शब्दों में है, जैसे परिवारों में पूजा के समय सुनाई जाती है। क्षेत्र और घर के हिसाब से कथा के रूप बदलते हैं; कथा में कहीं चेतावनी आए तो वह कहानी का हिस्सा है, पढ़ने वाले के लिए डर की बात नहीं।

तिथि और मुहूर्त

तिथि और समय हमारे अपने पंचांग की गणना से हैं, और शहर के साथ बदलते हैं। यहाँ से देखें:

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जन्माष्टमी की कथा श्रीकृष्ण के जन्म की कहानी है: मथुरा के राजा कंस ने आकाशवाणी सुनी कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान उसका अंत करेगी, तो उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया; और उसी कारागार में आधी रात को श्रीकृष्ण जन्मे, जिन्हें वसुदेव उफनती यमुना पार करके गोकुल पहुँचा आए। यह कथा भादों के कृष्ण पक्ष की अष्टमी की रात, आधी रात की पूजा से पहले सुनाई जाती है।

व्रत का दिन, स्मार्त और वैष्णव तिथि, और आपके शहर का निशीथ काल जन्माष्टमी की तिथि वाले पृष्ठ पर है। यहाँ केवल कथा है, अपने शब्दों में।

श्रीकृष्ण जन्म की कथा

विवाह और आकाशवाणी

मथुरा में यदुवंशियों के राजा उग्रसेन थे, पर उनके बेटे कंस ने उन्हें बंदी बनाकर गद्दी अपने हाथ में ले ली थी। कंस को अगर किसी से सच्चा लगाव था, तो अपनी चचेरी बहन देवकी से। जब देवकी का विवाह यदुवंशी वसुदेव से हुआ, तो बहन को विदा करने के लिए रथ की लगाम कंस ने ख़ुद थामी।

रास्ते में आकाश से एक आवाज़ आई: "अरे मूर्ख, जिस बहन को तू इतने प्रेम से ले जा रहा है, उसी की आठवीं संतान तेरी मृत्यु का कारण बनेगी।" पल भर में कंस का प्रेम ग़ायब हो गया। उसने तलवार खींची और देवकी के बाल पकड़ लिए।

वसुदेव ने उसका हाथ थाम लिया। उन्होंने शांति से समझाया कि विवाह के दिन दुल्हन को मारना सदा के लिए कलंक होगा, और ख़तरा देवकी से नहीं है। फिर उन्होंने वचन दिया: "देवकी की हर संतान मैं अपने हाथों से तुम्हें सौंप दूँगा।" कंस जानता था कि वसुदेव कभी अपनी बात से नहीं फिरते। उसने तलवार नीचे कर ली।

कारागार

फिर भी पक्का करने के लिए कंस ने दोनों को मथुरा के कारागार में बंद करवा दिया और हर द्वार पर पहरा बिठा दिया। पहला बेटा हुआ तो वसुदेव ने अपना वचन निभाया और बच्चे को कंस के पास ले गए। एक-एक करके छह संतानें हुईं, और कंस ने छहों के प्राण ले लिए।

इस हिस्से को सहज मन से पढ़ें

यह कथा का सबसे भारी हिस्सा है, और घरों में इसे थोड़े में ही कहा जाता है। भागवत भी इसे नरम करती है: कहा गया है कि वे छह आत्माएँ एक पुराने शाप से बँधी थीं, जो इस छोटे-से जन्म से छूट गईं, और आगे की एक कथा में श्रीकृष्ण उन्हें माँ देवकी से मिलाने वापस ले आते हैं। कथा क्रूरता पर ठहरने को नहीं कहती; वह दिखाती है कि डर आदमी से क्या-क्या करवा लेता है, और उस रात की भूमिका बाँधती है जब यह डर आख़िरकार हार जाता है।

सातवीं संतान

जब देवकी सातवीं बार गर्भवती हुईं, तो भगवान विष्णु ने अपनी माया-शक्ति योगमाया को बुलाया। योगमाया ने वह गर्भ देवकी से खींचकर वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में रख दिया, जो गोकुल में ग्वालों के मुखिया नंद बाबा की छाया में सुरक्षित रहती थीं। कारागार में ख़बर फैली कि देवकी का गर्भ गिर गया। उधर गोकुल में रोहिणी ने बेटे को जन्म दिया, जिनका नाम बलराम पड़ा; उन्हें संकर्षण भी कहते हैं, यानी "जिन्हें खींचकर लाया गया"।

आठवीं संतान, आधी रात को

फिर देवकी आठवीं बार गर्भवती हुईं, और कहते हैं कि कारागार जैसे उजाले से भर गया। कंस ने पहरा दुगना कर दिया और दोनों को बेड़ियों में जकड़ दिया।

भादों के कृष्ण पक्ष की अष्टमी थी, चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में था, और ठीक आधी रात को बालक का जन्म हुआ। कथा कहती है कि वसुदेव और देवकी ने पहले उन्हें विष्णु के रूप में देखा, चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और कमल लिए। दोनों ने हाथ जोड़े, और देवकी की विनती पर वे साधारण नवजात शिशु बन गए। फिर उन्होंने वसुदेव को बताया कि आगे क्या करना है।

उसी क्षण पहरेदार गहरी नींद में सो गए। बेड़ियाँ खुल गईं, और कारागार के भारी दरवाज़े अपने-आप खुल गए। वसुदेव ने बालक को एक सूप या टोकरी में लिटाया, सिर पर रखा, और अँधेरी रात में बाहर निकल पड़े।

यमुना के पार

बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, और यमुना में बाढ़ आई हुई थी। वसुदेव पानी में उतरे। पानी सीने तक आया, फिर ठुड्डी तक। घर-घर में सुनाई जाने वाली बात यह है कि यमुना ऊपर उठकर बालक के चरण छूने आई और फिर उतर गई; और पीछे-पीछे शेषनाग चले आए, जिन्होंने अपने अनेक फनों से टोकरी पर छतरी तान दी, ताकि बच्चे पर एक बूँद भी न गिरे। यमुना ने रास्ता दे दिया।

गोकुल में नंद बाबा की पत्नी यशोदा ने उसी रात एक बेटी को जन्म दिया था, और पूरा घर सोया हुआ था। वसुदेव ने अपने बेटे को यशोदा के पास लिटाया, बच्ची को उठाया, और नदी पार करके वापस कारागार आ गए। दरवाज़े उनके पीछे बंद हो गए, बेड़ियाँ फिर जुड़ गईं, और बच्ची रोने लगी।

योगमाया की चेतावनी

रोने की आवाज़ से पहरेदार जागे और भागकर कंस को ख़बर दी। कंस तुरंत आया और देवकी की गोद से बच्ची छीन ली। देवकी गिड़गिड़ाईं कि यह तो बेटी है, इसे छोड़ दो। कंस ने बच्ची को पत्थर पर पटकने के लिए ऊपर उठाया।

बच्ची उसके हाथ से फिसलकर आकाश में उठ गई। वहाँ वह आठ भुजाओं में शस्त्र लिए, तेज से दमकती देवी योगमाया के रूप में प्रकट हुई और बोली, "तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है, और कहीं और सुरक्षित है।" इतना कहकर वह अंतर्धान हो गई। बहुत-सी कथाओं में आगे वह कई जगह पूजी जाती है, जिनमें विंध्यवासिनी देवी का नाम सबसे ज़्यादा लिया जाता है।

कंस सहम गया। उसने देवकी-वसुदेव को छोड़ दिया और उनसे क्षमा माँगी। पर उसका डर जल्दी लौट आया, और गोकुल की कथाएँ, यानी बालक के पीछे भेजे गए असुरों और उनके एक-एक करके हारने की कहानियाँ, यहीं से शुरू होती हैं।

कथा कब और कैसे सुनी जाती है

परिवार शाम को कथा शुरू करते हैं, जैसे-जैसे रात आधी रात की ओर बढ़ती है। बहुत-से घरों में कथा टुकड़ों में पढ़ी जाती है, ताकि जन्म वाला प्रसंग ठीक निशीथ काल में आए: दरवाज़े खुलते हैं, शंख बजता है, पालना झूलता है और घंटी बजती है। मथुरा-वृंदावन के मंदिरों में यह कथा झाँकियों के ज़रिए कही जाती है, और बच्चे अक्सर टोकरी और खिलौने वाले साँप के साथ यमुना पार करने का दृश्य खेलते हैं।

रात का पूरा क्रम, सामग्री और आधी रात का अभिषेक जन्माष्टमी पूजा विधि पृष्ठ पर है।

दूसरी कथाएँ और रूप

  • नंदोत्सव। अगली सुबह गोकुल में नंद बाबा को बेटा होने की ख़बर मिलती है और वे घर के दरवाज़े सबके लिए खोल देते हैं; उसी सुबह की ख़ुशी नंदोत्सव के रूप में मनाई जाती है। महाराष्ट्र में अगला दिन गोपालकाला है, दही हांडी का दिन।
  • दूसरे पुराण। हरिवंश और विष्णु पुराण में भी यही कथा है, थोड़े-थोड़े अंतर के साथ, जैसे योगमाया के नाम में और कंस से कही उनकी बात में; व्रत की किताबें प्रायः भागवत का ही अनुसरण करती हैं।
  • दक्षिण भारत में यह दिन गोकुलाष्टमी या श्री जयंती कहलाता है; कथा वही है, और घर के द्वार पर बालकृष्ण के छोटे-छोटे पैरों के निशान भीतर की ओर आते हुए बनाए जाते हैं।

आज यह कथा क्या कहती है

असल में जन्माष्टमी उस जन्म की कथा है जिसे डर रोक नहीं सका। बंद दरवाज़े, बेड़ियाँ और उफनती नदी, सब एक नवजात के आगे हार जाते हैं। ज़्यादातर घरों के लिए यह रात कंस की कम और उस बच्चे की ज़्यादा है: पालना, माखन, और ग्वालों के गाँव में बड़े होने वाले नटखट बालक की किलकारी।

श्रीकृष्ण के बचपन की आगे की कहानी गोवर्धन पूजा की कथा में है, जब वे गोकुल को बचाने के लिए पर्वत उठाते हैं। व्रत रखने वाले बहुत-से लोग एकादशी भी रखते हैं। जन्माष्टमी की रात अष्टमी कब लगती है, यह अपने शहर के पंचांग में देखें, और बहुत-से परिवार इस रात देर से निकलने वाले चाँद का इंतज़ार करते हैं, जिसका समय चंद्रोदय पृष्ठ पर है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जन्माष्टमी की कथा क्या है?

यह श्रीकृष्ण के जन्म की कथा है: कंस आकाशवाणी सुनता है कि देवकी की आठवीं संतान उसका अंत करेगी, और देवकी-वसुदेव को कारागार में डाल देता है। आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण जन्म लेते हैं, वसुदेव उन्हें यमुना पार गोकुल पहुँचाते हैं, और यशोदा की बेटी को ले आते हैं, जो कंस के हाथ से छूटकर योगमाया के रूप में प्रकट होती है।

श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव आधी रात को क्यों मनाया जाता है?

भागवत पुराण के अनुसार उनका जन्म कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात को, रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसीलिए जन्माष्टमी की मुख्य पूजा निशीथ काल यानी आधी रात के मुहूर्त में होती है।

बलराम का जन्म कैसे हुआ?

बलराम देवकी की सातवीं संतान थे। योगमाया ने उस गर्भ को देवकी से खींचकर वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में रख दिया, जो गोकुल में सुरक्षित रहती थीं। इसलिए बलराम का जन्म गोकुल में हुआ और वे कृष्ण के साथ ही पले-बढ़े।

इसे भी पढ़ें

स्रोत

  • श्रीमद्भागवत पुराण, दशम स्कंध (श्रीकृष्ण जन्म), जैसा व्रत पुस्तकों में संक्षेप में मिलता है
  • हरिवंश और विष्णु पुराण की कथाएँ, जैसी प्रायः सुनाई जाती हैं
  • ब्रज और उत्तर भारत के घरों की मौखिक परंपरा, जन्माष्टमी के जागरण में

यह पृष्ठ सतमार्ग ज्योतिष संपादकीय टीम ने लिखा है। कथाएँ हमारे अपने शब्दों में हैं; जहाँ परंपराएँ अलग हैं वहाँ यह कहते हैं। तिथि और समय हमारे पंचांग की गणना से हैं, लेख में नहीं लिखे जाते। हमारी पद्धति