नवरात्रि की कथा माँ दुर्गा की कथा है — वह देवी जो सब देवताओं के मिले हुए तेज से प्रकट हुईं, जिन्होंने महिषासुर से नौ रातों तक युद्ध किया और दसवें दिन विजय पाई। इसके साथ नौ दिनों में हर दिन की अपनी देवी है — शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक नवदुर्गा — और हर देवी की एक छोटी कथा, जो उसी दिन कही जाती है।
तिथियाँ, आपके शहर में घटस्थापना का समय और अष्टमी-नवमी के दिन शारदीय नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि के पृष्ठों पर हैं। यह पृष्ठ केवल कथा का है, हमारे अपने शब्दों में।
नवरात्रि क्यों: माँ दुर्गा और महिषासुर
भैंसे के सिर वाले असुर महिषासुर ने बरसों तप करके वरदान पाया कि उसे न कोई देवता मार सकेगा, न कोई पुरुष। इसी भरोसे वह देवताओं को स्वर्ग से भगाकर इंद्र के सिंहासन पर जा बैठा।
हारे हुए देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुँचे। उनकी व्यथा सुनते-सुनते त्रिदेवों के मन में भारी क्रोध उमड़ा और उनके मुख से ऐसा तेज निकला कि आकाश भर गया। फिर हर देवता का तेज उसमें आकर मिलता गया, और उस प्रकाश-पुंज से एक तेजस्वी, शांत नारी प्रकट हुईं। महिषासुर के वरदान में किसी स्त्री का नाम ही नहीं था।
हर देवता ने उन्हें अपना कुछ दिया — शिव जी ने त्रिशूल, विष्णु जी ने चक्र, इंद्र ने वज्र, वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति। पर्वतराज हिमालय ने सवारी के लिए सिंह दिया। देवी ने अट्टहास किया तो तीनों लोक गूँज उठे।
महिषासुर ने पहले अपने सेनापति भेजे, फिर पूरी-पूरी सेनाएँ, और देवी सबको काटती चली गईं। आखिर वह स्वयं आया। लड़ते-लड़ते वह रूप बदलता रहा — कभी भैंसा, कभी सिंह, कभी तलवार लिए पुरुष, कभी हाथी, और फिर भैंसा। अंत में देवी ने उसे पैर से दबाया, और जब वह भैंसे के शरीर से निकलकर भागने लगा, त्रिशूल से उसका अंत कर दिया। देवताओं ने स्तुति की, और माँ ने वचन दिया कि जब भी तुम पुकारोगे, मैं आऊँगी। इसीलिए नौ रातें माँ की हैं और दसवाँ दिन विजयादशमी, विजय का दिन।
कथा को शांत मन से समझें
देवी की कथाएँ युद्ध से भरी हैं, और यह कह देना अच्छा है कि व्रत रखने वालों के लिए इनका अर्थ क्या है। महिषासुर वह अहंकार और हठ है जो बदलना नहीं चाहता; देवी वह शक्ति है जो तब जागती है जब भले लोग अकेले-अकेले नहीं, मिलकर खड़े होते हैं। किसी भक्त से डरने को नहीं कहा गया। माँ का सबसे उग्र रूप भी आख़िर माँ ही है।
श्रीराम का अकाल बोधन
एक और कथा ख़ास तौर पर शारदीय नवरात्रि की है। रावण से युद्ध से पहले श्रीराम देवी की पूजा करना चाहते थे। पर शरद ऋतु देवी की पूजा का समय नहीं थी, इसलिए उन्हें असमय जगाना पड़ा — इसे अकाल बोधन कहते हैं। श्रीराम ने पूजा के लिए एक सौ आठ नीलकमल जुटाए। आख़िरी कमल चढ़ाने की बारी आई तो एक कम निकला; देवी ने परीक्षा लेने के लिए उसे छिपा दिया था। लोग श्रीराम को कमलनयन कहते थे, सो उन्होंने बाण उठाया कि कमल की जगह अपना एक नेत्र ही अर्पित कर दें। देवी ने उनका हाथ थाम लिया, प्रकट हुईं और विजय का आशीर्वाद दिया। यह कथा बंगाल में और दुर्गा पूजा की परंपरा में बहुत प्रिय है, और वाल्मीकि रामायण के बजाय बाद की रामायणों से आई है।
वसंत की चैत्र नवरात्रि रामनवमी, यानी श्रीराम के जन्मदिन, पर पूरी होती है — इस तरह दोनों नवरात्रियाँ अपने-अपने ढंग से श्रीराम से जुड़ी हैं।
नवदुर्गा: नौ दिन, नौ रूप
पहला दिन: शैलपुत्री
शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। पिछले जन्म में वे दक्ष की पुत्री सती थीं, जिन्होंने पिता के यज्ञ में शिव जी का अपमान होने पर यज्ञ की अग्नि में देह त्याग दी थी। घर-परिवार में यह दुखद प्रसंग संक्षेप में ही कहा जाता है, क्योंकि कथा का असली भाव उनका लौटना है। वे पहाड़ों में फिर जन्मीं और समय आने पर फिर शिव जी को पाया। वे बैल पर सवार हैं, हाथ में त्रिशूल और कमल है। उनका दिन जड़ों और शुरुआत का दिन है, इसीलिए कलश इसी दिन स्थापित होता है।
दूसरा दिन: ब्रह्मचारिणी
ब्रह्मचारिणी तपस्या के वर्षों वाली पार्वती हैं। उन्हें शिव जी के सिवा कुछ नहीं चाहिए था, सो वे वन में चली गईं — पहले फल खाकर रहीं, फिर पत्ते खाकर, फिर पत्ते भी छोड़ दिए, और इसी से उनका नाम अपर्णा पड़ा। उनके हाथ में जपमाला और कमंडल है। उनकी कथा धीरज की कथा है: लक्ष्य ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं, लगातार लगन से मिलता है।
तीसरा दिन: चंद्रघंटा
चंद्रघंटा के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है। एक कथा कहती है कि विवाह के दिन जब शिव जी भूत-प्रेतों और गणों की अनोखी बारात लेकर पहुँचे और माता के परिवार वाले घबरा गए, तब पार्वती ने यह तेजस्वी रूप धरकर सबके सामने खड़े होकर माहौल शांत किया। उनके घंटे की ध्वनि से डर भागता है, ऐसा माना जाता है। वे बाघ पर सवार हैं, युद्ध को तत्पर, फिर भी चेहरे पर शांति है।
चौथा दिन: कूष्मांडा
कूष्मांडा वह देवी हैं जिन्होंने सृष्टि रची। आरंभ में केवल अंधकार था; देवी मुस्कुराईं, और उसी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड का अंड और सारा प्रकाश जन्मा। माना जाता है कि वे सूर्य के भीतर निवास करती हैं। उनकी आठ भुजाएँ हैं, और कुछ घरों में उन्हें कुम्हड़ा, यानी कूष्मांड, चढ़ाया जाता है; उनके नाम का एक अर्थ इसी से भी जोड़ा जाता है।
पाँचवाँ दिन: स्कंदमाता
स्कंदमाता स्कंद, यानी कार्तिकेय, की माँ हैं — देवताओं के वे युवा सेनापति जिन्होंने तारकासुर को हराया। वे कमल पर बैठी हैं और बालक स्कंद उनकी गोद में है। उनका दिन ममता और रक्षा का दिन है, और बहुत-सी माताएँ इसे विशेष भाव से मनाती हैं।
छठा दिन: कात्यायनी
कात्यायन ऋषि ने बरसों तप किया कि देवी उनकी पुत्री बनकर जन्म लें, और देवी उनके आश्रम में जन्मीं; इसीलिए कात्यायनी कहलाईं। कई कथाओं में इसी रूप में उन्होंने महिषासुर से युद्ध किया। भागवत में ब्रज की गोपियों ने श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए महीने भर कात्यायनी का व्रत किया था, और आज भी कुँवारी कन्याएँ अच्छे वर के लिए उनसे प्रार्थना करती हैं।
सातवाँ दिन: कालरात्रि
कालरात्रि नौ रूपों में सबसे श्याम और सबसे उग्र हैं — काला रंग, खुले केश, गधे की सवारी। उनकी कथा रक्तबीज से जुड़ी है, वह असुर जिसके रक्त की हर बूँद धरती पर गिरते ही नया असुर बन जाता था। देवी ने एक भी बूँद गिरने न दी, और वह परास्त हुआ। उन्हें शुभंकरी भी कहते हैं, यानी शुभ करने वाली, क्योंकि उनकी उग्रता केवल बुराई के विरुद्ध है।
आठवाँ दिन: महागौरी
लंबी तपस्या के बाद धूप, धूल और कठिनाई से पार्वती का रंग साँवला पड़ गया था। जब शिव जी ने उन्हें स्वीकार किया, तो गंगाजल से उन्हें नहलाया, और वे कुंद के फूल जैसी उजली हो गईं — महागौरी। वे सफ़ेद बैल पर सवार हैं और श्वेत वस्त्र पहनती हैं। उनका दिन दुर्गा अष्टमी है, जब बहुत-से घरों में कन्याओं को देवी मानकर पूजा जाता है।
नौवाँ दिन: सिद्धिदात्री
सिद्धिदात्री सिद्धियाँ देने वाली हैं। कहा जाता है कि स्वयं शिव जी को उनकी कृपा से सिद्धियाँ मिलीं, और उनका आधा शरीर देवी का हो गया — अर्धनारीश्वर। वे कमल पर विराजती हैं, और देवता, ऋषि और साधारण गृहस्थ सब उनकी पूजा करते हैं। उनका दिन महानवमी नौ रातों को पूरा करता है।
कथा कैसे सुनी जाती है
ज़्यादातर घरों में पूरी कथा एक साथ नहीं पढ़ी जाती। महिषासुर की कथा पहले दिन या हवन के समय कही जाती है, और हर दिन उस दिन की देवी की पूजा के बाद उन्हीं की कथा पढ़ी जाती है। बहुत-से घरों में रोज़ दुर्गा सप्तशती का एक या अधिक अध्याय पढ़ा या सुना जाता है, और कहीं बस आरती गाकर बच्चों को उस दिन की कथा सुना दी जाती है। घटस्थापना और रोज़ की पूजा का क्रम नवरात्रि पूजा विधि पृष्ठ पर है, और अष्टमी-नवमी के दिन दुर्गा अष्टमी और महानवमी पृष्ठों पर।
आज यह कथा क्या कहती है
नवरात्रि एक ऐसी शक्ति की कथा है जो एक साथ कोमल भी है और उग्र भी — ब्रह्मचारिणी का धीरज, स्कंदमाता की ममता, कालरात्रि का निडर अंधकार। नौ दिनों में परिवार उसी एक देवी के आगे बेटी, माँ और योद्धा, तीनों रूपों में सिर झुकाते हैं।
देवी का साप्ताहिक व्रत रखना हो तो संतोषी माता की कथा है, और पार्वती के पुत्र की कथा गणेश चतुर्थी की कथा में है। कलश या हवन के लिए समय चुनना हो तो चौघड़िया और मुहूर्त पृष्ठ देखें।