छठ पूजा सूरज देव और छठी मैया की चार दिन की उपासना है, जिसमें व्रती पूरी शुद्धता रखती हैं, लगभग छत्तीस घंटे निर्जला उपवास करती हैं, और पानी में खड़े होकर पहले डूबते सूरज को और फिर उगते सूरज को अर्घ्य देती हैं। संक्षेप में: पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन खरना, षष्ठी की शाम संध्या अर्घ्य, और अगली भोर उषा अर्घ्य, जिसके बाद प्रसाद से पारण।
चारों दिन और आपके शहर का सूर्योदय-सूर्यास्त छठ पूजा की तिथि वाले पृष्ठ पर है, और चैत वाला छठ चैती छठ के पृष्ठ पर। यहाँ उन्हें नहीं दोहराया गया, क्योंकि ये हर साल और हर शहर में बदलते हैं।
पहले सेहत की बात
छठ का व्रत लंबा और निर्जला है, और अक्सर भोर की ठंड में पानी में खड़े रहना होता है। गर्भवती महिलाएँ, शुगर, दिल या किडनी की बीमारी वाले, और बुज़ुर्ग व्रती पानी, फल या एक बार के भोजन के साथ हल्का व्रत रखते हैं, और डॉक्टर की सलाह सबसे पहले है। बहुत-से घरों में परिवार का कोई और सदस्य व्रत उठा लेता है या मिल-बाँटकर करता है; छठी मैया के गीत किसी से अपने शरीर को कष्ट देने को नहीं कहते। जो व्रत नहीं रख पाते, वे प्रसाद बनाकर, दउरा उठाकर और घाट पर सेवा करके पूरे मन से पर्व में शामिल होते हैं।
सामग्री: क्या तैयार रखें
- प्रसाद ले जाने को बाँस के सूप और गहरा दउरा; बहुत-से घरों में पीतल का सूप भी
- ठेकुआ के लिए गेहूँ का आटा, गुड़ या चीनी, घी, थोड़ा नारियल और सौंफ
- गुड़ से बने कसार या चावल के आटे के लड्डू
- मौसम के फल: केले (बहुत-से घरों में पूरी घौद), गन्ना, पानी वाला नारियल, मौसमी, संतरा, सेब, सिंघाड़ा, शकरकंद, पत्तों वाली मूली, जड़ समेत हल्दी और अदरक के पौधे
- खरना की खीर (रसिया) के लिए चावल और गुड़, और रोटी के लिए गेहूँ
- मिट्टी के दीये, घी, रुई की बत्ती, धूप
- अर्घ्य के लिए लोटे में दूध और जल, अक्सर ताँबे या पीतल का लोटा
- सिंदूर, सूप पर लगाने को पिठार या सिंदूर, नया सूती कपड़ा, और व्रती के लिए नए कपड़े (प्रायः सादी साड़ी या धोती, बहुत-से घरों में बिना सिली)
- कोसी भरने वाले परिवारों के लिए: पाँच या उससे ज़्यादा गन्ने, मिट्टी की कोसी (घड़ा या हाथी वाला दीपदान), और मिट्टी का नया चूल्हा
सबसे ज़रूरी है कि सब कुछ साफ़ हो और पर्व के लिए अलग रखा हो। बहुत-से घर कुछ नया नहीं लाते, बस सूप और बर्तन धो-सुखाकर सँभाल लेते हैं।
चारों दिन का क्रम
- पर्व से पहले। घर की पूरी सफ़ाई होती है, और बहुत-से घरों में प्रसाद का गेहूँ धोकर छत पर सुखाया जाता है, कोई पास बैठकर चिड़ियाँ उड़ाता रहता है। टोले के लोग मिलकर घाट या पोखर साफ़ करते हैं।
- पहला दिन, नहाय-खाय। व्रती स्नान करती हैं, हो सके तो नदी में, और साफ़ कपड़े पहनती हैं। शुद्धता से एक बार का भोजन बनता है — प्रायः भात, चने की दाल और कद्दू यानी लौकी की सब्ज़ी, घी और सेंधा नमक में, बिना प्याज़-लहसुन। पहले व्रती खाती हैं, फिर घर के लोग।
- दूसरा दिन, खरना। व्रती दिन भर उपवास रखती हैं। शाम को नए या अच्छी तरह लीपे चूल्हे पर, आम की लकड़ी से, खरना का प्रसाद बनता है: गुड़ वाली चावल की खीर (रसिया) और गेहूँ की रोटी, कहीं-कहीं केले के साथ। व्रती छठी मैया को भोग लगाकर एकांत में, शांति से प्रसाद ग्रहण करती हैं, और फिर घर के लोग प्रसाद पाते हैं। इसी के बाद निर्जला व्रत शुरू होता है।
- तीसरा दिन, प्रसाद की तैयारी। घर में ठेकुआ और कसार बनते हैं, अक्सर पूरा परिवार मिलकर, औरतें गीत गाती हुई। सूपों में ठेकुआ, फल, नारियल, गन्ना, हल्दी और अदरक सजाए जाते हैं, हर सूप में एक दीया, और सारे सूप दउरा में रखे जाते हैं।
- तीसरा दिन, संध्या अर्घ्य। दोपहर ढलते परिवार घाट की ओर चलता है; घर के पुरुष अक्सर दउरा सिर पर उठाते हैं, बहुत-से नंगे पाँव। व्रती कमर तक पानी में उतरकर डूबते सूरज की ओर मुँह करके सूप थामती हैं, और घर का कोई सदस्य सूप पर दूध या जल की धार गिराकर अर्घ्य दिलाता है। एक-एक करके हर सूप का अर्घ्य होता है, और किनारे पर परिवार गीत गाता है।
- उसी रात कोसी भरना। जिन घरों में मन्नत हो, वहाँ आँगन में कोसी सजती है: गन्ने के डंठल ऊपर से बाँधकर मंडप, नीचे कोसी का घड़ा, चारों ओर जलते दीये, पास में सूप, और देर रात तक गीत।
- चौथा दिन, उषा अर्घ्य। भोर से पहले परिवार फिर घाट पहुँचता है, और कई घर किनारे पर फिर कोसी सजाते हैं। व्रती पूरब की ओर मुँह करके पानी में खड़ी होकर सूरज के उगने की प्रतीक्षा करती हैं। सूरज निकलते ही शाम की तरह अर्घ्य दिया जाता है।
- पारण। व्रती प्रार्थना करती हैं, बड़ों का आशीर्वाद लेती हैं और छोटों को देती हैं, घाट पर प्रसाद बाँटती हैं, और घर आकर पानी, थोड़ा अदरक, ठेकुआ या शरबत से व्रत खोलती हैं, फिर हल्का भोजन।
समय कैसे देखें
दो घड़ियाँ मायने रखती हैं: षष्ठी का सूर्यास्त और सप्तमी का सूर्योदय, और दोनों शहर-शहर में कई मिनट बदल जाते हैं। अपने शहर के पंचांग में उस दिन का सूर्योदय और सूर्यास्त दिया है, और अच्छी घड़ी में घाट के लिए निकलना पसंद करने वाले परिवार चौघड़िया देख लेते हैं। घाट इतनी देर पहले पहुँचें कि सूरज के क्षितिज छूने से पहले पानी में ठीक जगह मिल जाए।
घरों में निभाई जाने वाली रीतें
ये रीतें हैं, शर्तें नहीं; आपके घर का अपना तरीका सबसे पहले है।
- चारों दिन घर में प्याज़, लहसुन और सादा नमक नहीं; जहाँ नमक चाहिए वहाँ सेंधा नमक, और खरना पर बिल्कुल नहीं।
- भोग लगने से पहले प्रसाद चखा नहीं जाता, और सूखते गेहूँ को कोई लाँघता नहीं।
- बहुत-सी व्रती चारों दिन ज़मीन पर चटाई बिछाकर सोती हैं।
- प्रसाद अलग चूल्हे पर, छठ के लिए अलग रखे बर्तनों में बनता है।
- जो व्रत नहीं रखते, वे भी घर की शुद्धता निभाते हैं और व्रतियों की सेवा करते हैं; बड़े-बूढ़े बच्चों को सूप से छुआकर आशीर्वाद देते हैं।
- मन्नत मानने वाले कुछ व्रती घाट तक दंड देते हुए, यानी ज़मीन पर लेट-लेटकर जाते हैं; ज़्यादातर ऐसा नहीं करते, और किसी से इसकी अपेक्षा नहीं है।
घाट पर सावधानी
भोर का ठंडा पानी और भीड़ भरे घाट थोड़ी सावधानी माँगते हैं। जहाँ किनारा पक्का हो और पानी उथला, वहीं खड़े हों, घर का कोई सदस्य पास रहे, और दो अर्घ्य के बीच बाहर आकर शरीर गरम कर लें। बच्चों को किनारे पर रखें, दीयों को साड़ी के आँचल से दूर रखें, और स्वयंसेवकों व प्रशासन की लगाई बाड़ के भीतर ही रहें। बहुत-से परिवार अब छत पर या आँगन में बने छोटे कुंड में छठ करते हैं, और वहाँ दिया अर्घ्य भी पूरा है।
अलग-अलग जगहों पर
- बिहार और झारखंड: गंगा के घाट और हर पोखर परिवारों से भर जाते हैं; मैथिली, मगही और भोजपुरी गीतों से शाम गूँजती है।
- पूर्वी उत्तर प्रदेश: बनारस और पूर्वांचल के शहरों में गंगा घाटों पर लगभग इसी तरह छठ होता है।
- नेपाल का तराई: मधेश क्षेत्र में छठ बड़ा पर्व है।
- घर से दूर बसे परिवार: दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों में पूरबिया परिवार पार्कों और सोसाइटियों में कृत्रिम तालाब बनाते हैं, और वहाँ का छठ अब बहुत बड़ा हो गया है।
- चैती छठ: वही चार दिन, चैत की षष्ठी पर, वसंत में; कम घरों में, अक्सर मन्नत पूरी करने के लिए। गर्मी में निर्जला व्रत और कठिन होता है, इसलिए ऊपर लिखी सावधानी और भी ज़रूरी है।
पूजा के बाद
ठेकुआ और फल पड़ोसियों में और जो भी आए उसमें बाँटें; छठ का प्रसाद तो दूर-दूर तक जाता ही है। चारों दिन के पीछे की कहानियाँ छठ की कथा में हैं, और संतान के लिए बिहार का दूसरा व्रत जितिया है।