महाशिवरात्रि दिन भर के उपवास और रात भर की पूजा का पर्व है, जिसमें रात के चारों पहर में शिवलिंग का अभिषेक करके बेलपत्र चढ़ाए जाते हैं, और आधी रात के पास का निशीथ काल इसका केंद्र होता है। थोड़े में कहें तो: सुबह संकल्प लें, दिन भर व्रत रखें, सूर्यास्त के बाद पहले पहर की पूजा करें, जप-भजन के साथ जागें, निशीथ काल में मुख्य अभिषेक करें और अगली सुबह पारण करके व्रत खोलें।
शिवरात्रि की रात, निशीथ काल और आपके शहर का पारण समय महाशिवरात्रि की तिथि वाले पृष्ठ पर है। यही पूजा छोटे रूप में हर महीने मासिक शिवरात्रि पर होती है। समय यहाँ दोबारा नहीं लिखे गए, क्योंकि वे शहर और साल के साथ बदलते हैं।
पूजा सामग्री: क्या-क्या तैयार रखें
- शिवलिंग: पत्थर या धातु का छोटा शिवलिंग, पारद शिवलिंग, या रात भर के लिए मिट्टी या बालू से बनाया पार्थिव लिंग
- शिवलिंग रखने को थाली या परात, जिससे चढ़ाया जल बह सके
- साफ़ जल, और घर में हो तो गंगाजल
- पंचामृत के लिए कच्चा दूध, दही, शहद, घी और शक्कर, पाँच अलग कटोरियों में; साथ में थोड़ा अलग दूध
- बेलपत्र, धुले हुए, डंठल समेत
- धतूरा (फूल या फल), आक यानी मदार के फूल और मौसम के सफ़ेद फूल
- भस्म या विभूति, और सफ़ेद चंदन
- अक्षत, जनेऊ और शिवलिंग के लिए छोटा-सा वस्त्र
- घी का दीया, धूप, आरती के लिए कपूर
- भोग के लिए फल और मिठाई; उत्तर में इस मौसम में बेर ख़ूब चढ़ता है, साथ में ठंडाई या दूध की मिठाई
- जप के लिए रुद्राक्ष की माला, अगर आप रखते हों
इनमें कुछ भी ख़ास होना ज़रूरी नहीं। एक बेलपत्र और एक लोटा जल भी शिवरात्रि की पूरी भेंट है; कथा भी यही कहती है।
पूजा का क्रम
- सुबह स्नान और संकल्प। नहाकर पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठें। दाएँ हाथ में थोड़ा जल लेकर अपने शब्दों में कहें कि आप भगवान शिव के लिए शिवरात्रि का व्रत और रात्रि पूजा कर रहे हैं, फिर जल धरती पर छोड़ दें।
- दिन भर। जैसा व्रत तय किया है वैसा रखें (नीचे देखें)। बहुत-से लोग सुबह या दोपहर में शिव मंदिर जाकर जल चढ़ाते हैं; ज्योतिर्लिंग मंदिरों में कतारें बहुत जल्दी लगने लगती हैं।
- स्थान तैयार करें। सूर्यास्त से पहले पूजा का कोना साफ़ करें, शिवलिंग को थाली में स्थापित करें, और पाँचों कटोरियाँ, बेलपत्र और दीया पास रख लें। चाहें तो रात शुरू होने से पहले एक बार और नहा लें।
- पहला पहर, सूर्यास्त के बाद। दीया जलाएँ, पहले गणेश जी का स्मरण करें। फिर शिवलिंग पर जल और उसके बाद दूध चढ़ाएँ। चंदन और भस्म लगाएँ, अक्षत, फूल और बेलपत्र अर्पित करें, और हर अर्पण के साथ ॐ नमः शिवाय बोलते रहें। धूप जलाकर भोग लगाएँ।
- दूसरा पहर। अभिषेक दोहराएँ, इस बार दही विशेष रूप से चढ़ाएँ। बहुत-से घरों में इसी समय, जब सब जागे और साथ बैठे हों, महाशिवरात्रि व्रत कथा पढ़ी जाती है।
- तीसरा पहर, निशीथ काल। यह रात का मध्य है। अब सबसे पूरा अभिषेक करें: पहले जल, फिर एक-एक करके दूध, दही, शहद, घी और शक्कर, या इन्हें मिलाकर बना पंचामृत, और अंत में फिर शुद्ध जल। शिवलिंग को पोंछकर चंदन और भस्म लगाएँ, जनेऊ और वस्त्र चढ़ाएँ, बेलपत्र (बहुत-से घरों में ग्यारह या एक सौ आठ), धतूरा और फूल अर्पित करें। जितना हो सके जप करें और "ॐ जय शिव ओंकारा" आरती गाएँ।
- चौथा पहर, भोर की ओर। आख़िरी, हल्का अभिषेक, प्रायः शहद या जल-दूध से, और छोटी-सी आरती। कुछ घरों में रात के इस हिस्से में रुद्राष्टक या शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ होता है।
- जागरण। पहरों के बीच परिवार भजन, जप, पाठ और मौन के साथ जागता है। घंटों एक जगह बैठे रहना ज़रूरी नहीं; बहुत-से लोगों की रात में मंदिर जाना और लौटना भी शामिल होता है।
- सुबह पारण। नहाकर छोटी पूजा करें, शिव जी को भोग लगाएँ, घर की रीति हो तो किसी पुरोहित या ज़रूरतमंद को कुछ दें, फिर व्रत खोलें।
पूरी रात जागना संभव न हो तो निशीथ काल में एक पूरी पूजा करके आराम कर लें। बहुत-से घरों में यही एक पूजा रात का केंद्र होती है।
समय कैसे देखें
तीन समय काम के हैं। पहला शाम का, जब सूर्यास्त के बाद पहला पहर शुरू होता है; जो परिवार अच्छे समय में पूजा शुरू करना चाहते हैं, वे अपने शहर का चौघड़िया देख लें। दूसरा निशीथ काल, यानी रात के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, जो स्थानीय आधी रात के आसपास पड़ता है; मुख्य अभिषेक इसी में होता है, और तिथि वाला पृष्ठ हर शहर के लिए इसे बताता है। तीसरा अगली सुबह का पारण। चारों पहर कुछ और नहीं, सूर्यास्त से सूर्योदय तक की रात के चार बराबर हिस्से हैं, इसलिए मौसम और शहर के साथ उनकी लंबाई बदलती है। चतुर्दशी कब लगती और कब उतरती है, यह पंचांग में दिखता है।
परिवारों के रीति-रिवाज
ये रिवाज हैं, शर्तें नहीं; आपके घर की अपनी रीति सबसे पहले है।
- ज़्यादातर लोग फलाहारी व्रत रखते हैं: फल, दूध, मखाना, साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू का आटा और सेंधा नमक। कुछ भक्त अगली सुबह तक निर्जल रहते हैं।
- बेलपत्र चिकनी तरफ़ से शिवलिंग पर रखा जाता है, और कटे-फटे या कीड़े लगे पत्ते अलग कर दिए जाते हैं।
- शिवलिंग पर केतकी के फूल और हल्दी परंपरा से नहीं चढ़ाए जाते, और तुलसी प्रायः विष्णु जी के लिए रखी जाती है।
- बहुत-से घरों में अभिषेक का बहता जल लाँघा नहीं जाता, और शिवलिंग की परिक्रमा जलधारी तक जाकर लौट आती है।
- उत्तर में कहीं-कहीं शाम को ठंडाई बनती है, कुछ जगह भांग वाली भी; ज़्यादातर घर इसे सादा ही रखते हैं।
- गर्भवती महिलाएँ, बीमार और बुज़ुर्ग पानी, फल और दूध के साथ हल्का व्रत रखते हैं, या बिना व्रत के केवल पूजा करते हैं। डॉक्टर की सलाह सबसे पहले।
प्रांतों के अपने ढंग
- उत्तर भारत में जलाभिषेक की लंबी कतारें, शिव की बारात और पुराने शिव मंदिरों पर मेले लगते हैं।
- महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण में महीने का नाम फागुन की जगह माघ है, पर रात वही है; वहाँ के ज्योतिर्लिंग मंदिरों में भारी भीड़ उमड़ती है।
- कश्मीरी पंडित हेरथ मनाते हैं, जिसमें वटुक नाम से घड़ों की पूजा होती है और रीतें कई दिन चलती हैं।
- नेपाल में पशुपतिनाथ पर साधुओं और यात्रियों का बड़ा जमावड़ा होता है।
पूजा के बाद
प्रसाद और फल बाँटें। अभिषेक का दूध-जल अक्सर किसी पेड़ या पौधे की जड़ में डाल दिया जाता है। हर पखवाड़े आने वाला शिव का व्रत प्रदोष है, और शिवरात्रि रखने वाले बहुत-से लोग सोमवार का सोलह सोमवार व्रत भी रखते हैं।